
ये सब लोकतंत्र के नाम पर ठगी नहीं तो क्या है। और कुछ ही नेताओं की वंश परम्परा के कारण भारत के लोग बंधुआ मजदुर की तरह बंधे हुए नही हैं। वोट देना ही देना है नहीं दोगे तब भी कोई न कोई चुना जाएगा । मतलब न चाहते हुए भी कोई न कोई चुना जाएगा ।
फ़िर, आम आदमी को खाने को सूखी रोटी मिले न मिले पर इन्हें रसमलाई खिलानी पड़ेगी इनके मरने तक सारे नाज नखरे उठाने पड़ेंगे । मरने के बाद ,
फ़िर इनके बच्चे तैयार हो जायेंगे । ये सिलसिला थमता नहीं दिख रहा ।
अभी तो वह खर्च अलग हैं तो ये अपनी सनक पूरी करने के लिए करते हैं जैसे मायावती हाथी बनवा रहीं हैं
हिंग लगे न फिटकरी रोंग चोखा हम भी लोकतंत्र के बंधुआ मजदूर करते रहेंगे।
क्या कर लोगे इनका भैये क्य कर लोगे, पेड़ लगाया नीम का, आम की रखे आस!
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