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Wednesday, April 28, 2010

एक बच्चे के मासूम सवाल

“ये रिशवत खाने वाले”क्या रोटी नहीं खाते ? (क्योंकि वह रिशवत

समेत सभी आर्थिक भ्रष्टाचार को पेट भरने की चीज समझता है) ।

अगला सवाल.........?

जब इन्हें पता है कि रिशवत खाकर जेल होनी है; तो इन्हें डर क्यों

नहीं लगता ?(वह समझता है कि पकड़े तो सभी ने जाना हैं, फिर भी

ये खाते रहते हैं)।

फिर से प्रश्न.........?

कि ये इतनी रिशवत क्यों खाते हैं ? कि पेट भरने के बाद भी वह इतनी

ज्यादा हो; कि सबको दिखे।

इन सबका उत्तर क्या हो सकता हैं ? मैं सोच में पड़ गया ! सोच में ये

निचोड़ निकला कि भगवान् ने संसार में कुछ प्राणी ऐसे बनाये हैं कि

जिनका पेट तो भर जाता हैं; पर नीयत नहीं भरती ऐसा ही एक प्राणी हैं “कुत्ता”

जो चाहे कितना ही खा ले पर नीयत नहीं भरती, वह पिटता है, दुत्कारा

जाता है, भगाया जाता है पर फिर भी खाने या "अन्य" लोभ का त्याग

नहीं कर पाता।

“विशेषकर आवारा कुत्ता”

कहते हैं रोटी खाने से बुद्धि और शारीर का विकास होता हैं, तो; क्या वास्तव

में ये रिशवत खाने वाले रोटी नहीं खाते होंगे ?

Friday, April 23, 2010

“जुआ” किसी का नहीं हुआ

(अगर हमारे क्रिकेट खिलाडियों में वास्तव में नैतिकता है और उन्हें देश-धर्म-समाज से कुछ भी सहानुभूति है तो उन्हें इन लोगों के आपसी दांव-पेचों में "मोहरा" नहीं बनना चाहिए)।
वैसे
तो सभी खेलों में प्रतिस्पर्धात्मक भाव व हार जीत का निर्णय होता है। एक दूसरे को हराने की होड़ अगर खेलों में न हो तो खेल का औचित्य ही समाप्त हो जायेगा । यह होड़ जब तक बिना “अर्थ के लालच” के हो तब तक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कही जा सकती है, जहाँ से इसमें आर्थिक हित और लालच जुड़ जाये यही स्वस्थ प्रतिस्पर्धा "जुआ" बन जाती है; और जुआ अनैतिक ही होता है, खेलने वालों के लिए भी, खिलाने वालों के लिए भी, और देखने वालों के लिए भी; यही आज क्रिकेट में होने लगा है। "यह" अनैतिक होने लगा है; क्योंकि इसे जुए का रूप दे दिया गया है, जिसे व्यापार की तरह पेश किया जा रहा है, क्योंकि विज्ञापन का युग है; जिसमें झूठ को ही स्थापित किया जाता है।
क्रिकेट एक हाई प्रोफईल जुआ बन गया है और देश के साधारण लोगों को मूर्ख बना रहा है; "जो पैसे वाले हैं उन्हें"। साधारण जनता इसके खिलाडियों को महानता का दर्जा दे रही है; क्योंकि विज्ञापन का युग है, खेल और खिलाडियों की खरीद-बेच हो रही है; क्योंकि विज्ञापन का युग है, अरबपति और अरबों कमा रहे हैं; क्योंकि विज्ञापन का युग है, अनैतिकता को नैतिक बता रहे हैं; क्योंकि विज्ञापन का युग है ।
अगर यही सब चलता रहा तो कुछ समय बाद देख लेना, इस क्रिकेट के कारण हत्याएं भी होने लगेंगी। क्योंकि ये अब केवल जुआ बन गया है जुए में हारना कोई नहीं चाहता सब जीतना कहते हैं। हरने में धन की हानि होती है; जो व्यापारी या जुआरी को सहन नहीं होती ।
वर्तमान में जो विवाद चल रहा है उसमे देखते जाओ अभी और कौन-कौन लपेट में आता है पर ये सभी वे लोग हैं जिन्हें न अपने देश धर्म व समाज से कुछ लेना है न इस सबसे इन्हें सहानुभूति है और यही सब गुण जुआरी में होते हैं , चाहे वह खेलने वाला हो या केवल दांव लगाने वाला । हमारे क्रिकेट खिलाडियों में वास्तव में नैतिकता है और उन्हें देश-धर्म-समाज से कुछ भी सहानुभूति है तो उन्हें इन लोगों के आपसी दांव-पेचों में "मोहरा" नहीं बनना चाहिए। इन्हें ये समझ लेना चाहिए कि अनैतिकता से कमाया धन बुराई ही पैदा करता है । कहीं इस धन के लालच में ये अपनी "प्राप्त की हुयी प्रतिष्ठा" न खो दें।

Thursday, April 22, 2010

क्या होगा भारत का अगर ये नियम बन जाएँ ?

कि ; पति-पत्नी में से एक ही व्यक्ति को नौकरी का अधिकार दिया जाये ।
कि ; पति-पत्नी या मां-बेटे में से केवल एक को ही नेतागिरी मिलेगी ।
कि ; सरकारी कर्मचारियों से नियुक्ति के समय ही एक करार पर सहमती लेकर ;कि हड़ताल नहीं करेंगे नौकरी दी जाये।
कि ; देश में अधिकारियों के सम्बन्धियों के नाम से चल रहे एन.जी.ओ'ज को बंद कर दिया जाये ।
की ; दस लाख से ऊपर की संपत्ति-जमापूंजी को सरकारी पूंजी घोषित कर दिया जाये । (उद्योग पतियों की नहीं)
कि ; किसी भी सरकारी कार्य के अपने लक्ष्य तक न पहुँचने पर सम्बंधित अधिकारी को दोषी मान कर दण्डित किया जाये ।
कि ; शराब निर्माता कंपनियों के लिए उतनी ही मात्रा में दुग्ध उत्पादन और गौ पालन अनिवार्य कर दिया जाये ।
कि ; पानी का व्यवसाय करने वाली कम्पनियों के लिए वृक्षारोपण और तालाब बनाने अनिवार्य कर दिए जाएँ
कि ; विज्ञापनों में झूठ प्रदर्शित करने पर उन सभी के विरुद्ध सख्त(धोखाधड़ी की) कार्रवाही की जाये; जो उसे दिखाने और उसमें दिखने वाले हैं ।
कि ; क्रिकेट की कमाई पर शराब की तरह "कर" लगाया जाये ; क्योंकि ये भी नशे का सा असर करने लगा है।
और भी कई नियम हो सकते हैं जो भारत की दशा बदल सकते हैं।

बेचारा थरूर ! कांग्रेस का असली चेहरा छुपा नहीं पाया ; या....

एक बार फिर कांग्रेस अपना वास्तविक चेहरा दिखने से नहीं रोक पाई । ऐसा सैकड़ों बार हो चुका है; पर क्योंकि वह (कु)संस्कार बन चुका है और देश की अधिकतर आबादी इस “कांग्रेस-कल्चर” में ढल चुकी है इसलिए किसी को भी सही-गलत का भान नहीं होता ।
वरना ; कांग्रेस तो अपने जन्म से ही अपना असली चेहरा छुपाने का संस्कार लेकर पली-बढ़ी। इसे बनाया ही इसलिए गया था एक अंग्रेज द्वारा ; कि दिखने में ये भारतीय लगे और स्वार्थ सिद्ध हो अंग्रेजों का । आज तक वही हो रहा है ; पहले इसके पास दिखाने के लिए गांधीजी का चेहरा था; स्वार्थ सिद्ध करा नेहरू जी ने, अब वे नहीं रहे तो इन्होंने उनके चरित्र गढ़ लिए उनके नाम से ही फायदा उठाने का तरीका इजाद कर लिया ; पर स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं थरूर व अन्य सभी इसके नेता । ये इतने शातिर हो गए हैं अपने स्वार्थों के लिए, कि नया चेहरा (दिखाने के लिए ) महिमामंडित करने के लिए और जनता में उसका प्रभाव बनाने के लिए झुकने में कहीं रीढ़ की हड्डी आड़े न आये इसलिए अपनी रीढ़ की हड्डी को ही निष्क्रिय कर देते हैं ताकि हमेशा झुकी ही रहे। अवरोध न बने ।
और इनका ये कल्चर संस्कार बन चुका है। देश के नागरिकों को अब ये अटपटा नहीं लगता ।
थरूर तो "बेचारा" इसलिए है, कि कांग्रेस में जितने भी ; और कांग्रेस में ही क्यों सभी पार्टियों(क्योंकि सभी भी कमोबेश वही कल्चर छ गया है) में जितने भी हैं कोई भी ऐसा है जो अपने पद और प्रभाव का दुरूपयोग करके लाभ उठाने की प्रवृत्ति न रखता हो ? नीचे ग्राम स्तर से लेकर ऊपर तक कोई भी ऐसा है ? शायद नहीं । और ये लाभ; किसी गरीब को नहीं; किसी लाचार को नहीं बल्कि उनको पहुँचाया जाता है जो अथाह दौलत के मालिक हैं। गरीब पर जो अहसान किया जाता है; वह उसके लिए लाभ नहीं अपितु उसकी आवश्यकता होती है। जिसकी एवज में ये उसे जीवन भर के लिए वोट देने को अपना गुलाम बना लेते हैं ।
तो क्या थरूर बेचारा नहीं है कि वह असली चेहरा छुपाने की कला नहीं सीख पाया या उसका साथ बड़े नेताओं द्वारा नहीं दिया गया। जिस कारण वह देश की जनता को खुली आँखों जिन्दा मक्खी निगलवाने की कोशिश कर रहा था क्योंकि उसने कांग्रेस की ट्रेनिंग नहीं ली थी ; इसलिए ।