चलो दिलदार चलो
चाँद के पार (मंगल पर) चलो
हम हैं तैयार चलो ,
मिल गए चलने को साथ
कुछ मित्र,
और हैं तैयार चलो
लगते भी हैं काफी होशियार चलो
चलो दिलदार चलो
चाँद के पार (मंगल पर) चलो।
मेरी पोस्ट ....... दुनिया ख़त्म........ पर आयीं टिप्पणियों से पता लगा कि चाँद के पार चलने को सभी तैयार हैं। सुनील रावत जी काजल कुमार जी, प्रदीप कान्त जी और पं.डी. के. शर्मा वत्स जी को तो साथ लेजाना मुश्किल है, क्योंकि उड़नतश्तरी में दो की जगह ही खाली है , उसे उड़नतश्तरी वाले बिना बोली लगाये नही देने के , तो मैं सोच रहा हूँ कि अविनाश जी (वाचश्पति) को साथ लेजाया जाए, क्यों कि इनका सुझाव बहुत अच्छा है कि "पानी यहाँ से क्या लेजाना , रास्ते में चाँद पड़ेगा वहां से लेलेंगे"
बहुत अच्छा लगा ऐसे ही नए सुझाव वाले व्यक्ति को साथ लेजाना लाभकारी है।
अविनाश जी, रस्ते में सेटेलाईट भी मिलेंगे उनका मुहं उधर को ही करते चलेंगे ताकि ब्लोगिंग कर सकें। और भी मजेदार सुझावों का इन्तजार रहेगा। दुनिया के ख़त्म होने का इन्तजार.. ओह नहीं .. ! माफ़ करना (दुनिया कभी ख़त्म न हो) मंगल पर जाने की तैयारी करते हैं।
ताजा प्रविष्ठियां
Wednesday, September 30, 2009
Monday, September 28, 2009
ब्लॉगवाणी बंद ...... क्यों ?
ब्लॉगवाणी हम को पीछे छोड़ कर आगे चला गया .... विश्वास नहीं होता उसमे लिखा है "आगे जाने का समय आ गया"। बड़ा दुःख हुआ । हम तो अभी शुरू ही हुए थे । पता नहीं क्या हुआ क्यों हुआ ? अच्छा एग्रीगेटर था। खैर... जो हुआ- होना होगा ।
Sunday, September 27, 2009
अगर २०१२ में दुनिया ख़त्म होगी तो......
कैसे-कैसे समाचार और आशंकाएं संसार में व्याप्त हैं
एक तरफ़ दुनिया ख़त्म होने की आशंका है ,तो दूसरी तरफ़
एक तरफ़ दुनिया ख़त्म होने की आशंका है ,तो दूसरी तरफ़
मंगल पर शुरू होने की आशा भी है।
अब अगर २०१२ में दुनिया ख़त्म होगी तो चिंता नहीं मंगल
अब अगर २०१२ में दुनिया ख़त्म होगी तो चिंता नहीं मंगल पर चले जायेंगे। कुछ दिन का पानी व ऑक्सीजन का कोटा
लेजाना पड़ेगा। फ़िर आदत पड़ जायेगी ,खाने के लिए नवरात्रे
मान कर उपवास कर लेंगे।
ठीक है न ।
ठीक है न ।
मास्टरजी की नेतागिरी
मास्टरजी भई मास्टरजी , कैसे होगी अब नेतागिरी।अब तो स्कूल में जाना पड़ेगा , बच्चों को पढ़ाना पड़ेगा।
काम की रोटी खानी पड़ेगी , सम्मान का जीवन जीना पड़ेगा ........ ।
बचपन में एक गाना गाते हुए हम बच्चे खेलते थे,
“पोसमपा भई पोसमपा , डाकिये ने क्या किया ।
सौ रूपये की घड़ी चुरायी ,अब तो जेल में जाना पड़ेगा
बचपन में एक गाना गाते हुए हम बच्चे खेलते थे,
“पोसमपा भई पोसमपा , डाकिये ने क्या किया ।
सौ रूपये की घड़ी चुरायी ,अब तो जेल में जाना पड़ेगा
जेल की रोटी खानी पड़ेगी ,जेल का पानी पीना पड़ेगा" ..... इत्यादि-इत्यादि । और भी आगे जाने क्या-क्या था इस गाने में ,
आज अपने जिले (अल्मोड़ा) के शिक्षा अधिकारी के द्वारा किए जा रहे सुधारवादी कार्यों को देख कर वही गाना याद आ गया । बस शब्द बदल गए । इन शिक्षा अधिकारी महोदय ने वास्तव में अपने अधिकारों-कर्तव्यों को जाना है। नाम से भी टी.एस.अधिकारी ने कुछ ही दिन में जिले के सरकारी शैक्षणिक माहौल में नई उर्जा भर दी है । इनके इन कार्यों से जो कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक थे उनमें तो उत्साह है लेकिन जो कर्तव्यों से विमुख थे और नेतागिरी के दम पर केवल अपने अधिकारों की बात करते थे
जिनके कारण कर्तव्यनिष्ठ शिक्षकों का सम्मान भी आम जनता में कम होता जा रहा था , उनके कस-बल जरुर ढीले पड़ गए हैं। वे अपने आकाओं (विधायकों-सांसदों) के कान भरने
आज अपने जिले (अल्मोड़ा) के शिक्षा अधिकारी के द्वारा किए जा रहे सुधारवादी कार्यों को देख कर वही गाना याद आ गया । बस शब्द बदल गए । इन शिक्षा अधिकारी महोदय ने वास्तव में अपने अधिकारों-कर्तव्यों को जाना है। नाम से भी टी.एस.अधिकारी ने कुछ ही दिन में जिले के सरकारी शैक्षणिक माहौल में नई उर्जा भर दी है । इनके इन कार्यों से जो कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक थे उनमें तो उत्साह है लेकिन जो कर्तव्यों से विमुख थे और नेतागिरी के दम पर केवल अपने अधिकारों की बात करते थे
जिनके कारण कर्तव्यनिष्ठ शिक्षकों का सम्मान भी आम जनता में कम होता जा रहा था , उनके कस-बल जरुर ढीले पड़ गए हैं। वे अपने आकाओं (विधायकों-सांसदों) के कान भरने
लगे होंगे लेकिन , अगर ऐसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी पर कोई दबाव बनाया गया तो जनता उन नेताओं को भी कभी माफ़ नहीं करेगी।
Wednesday, September 23, 2009
Friday, September 18, 2009
नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली ……
केन्द्र सरकार की दिखावे को ही सही अतिव्ययता को मितव्ययता में बदलने की कोशिश का स्वागत होना चाहिए , क्या पता दिखावे के फैशन की तरह यह भी फैशन (चलन) बन जाए ।
वरना आजादी के बाद तो बिल्ली ने इतने चूहे खाए हैं कि अब ये अगर पूरे पचास साल तक मितव्ययता बरतें, लगातार , तब इनपर विश्वाश होगा । वरना तो, ऐसा ही लग रहा है कि अब चूहे खाने मुश्किल होगये हैं इसलिए ये दिखावा करना पड़ रहा है।
लेकिन पार्टी के बड़े नेता बेशक अपने खर्च कम कर देंगे , पर उनका क्या होगा जो राजनीति में आते ही अय्याशी के लिए हैं । उन अधिकारीयों का क्या होगा जिनके खून में कई पीढियों के लिए फिजूलखर्ची समां गई है।
इनके साथ ही एक चिंता और सता रही है कि उन पाँच सितारा होटलों-रिसौर्टों, बड़ी-बड़ी हवाई कम्पनियों व इनसे जुड़े पेशेवर कर्मचारियों का क्या होगा ? अगर ये मितव्ययता वाला फैशन चल पड़ा तो जिन अय्याशो के दम पर ये सब टिके हुए हैं बेकार हो जायेंगे ।
वरना आजादी के बाद तो बिल्ली ने इतने चूहे खाए हैं कि अब ये अगर पूरे पचास साल तक मितव्ययता बरतें, लगातार , तब इनपर विश्वाश होगा । वरना तो, ऐसा ही लग रहा है कि अब चूहे खाने मुश्किल होगये हैं इसलिए ये दिखावा करना पड़ रहा है।
लेकिन पार्टी के बड़े नेता बेशक अपने खर्च कम कर देंगे , पर उनका क्या होगा जो राजनीति में आते ही अय्याशी के लिए हैं । उन अधिकारीयों का क्या होगा जिनके खून में कई पीढियों के लिए फिजूलखर्ची समां गई है।
इनके साथ ही एक चिंता और सता रही है कि उन पाँच सितारा होटलों-रिसौर्टों, बड़ी-बड़ी हवाई कम्पनियों व इनसे जुड़े पेशेवर कर्मचारियों का क्या होगा ? अगर ये मितव्ययता वाला फैशन चल पड़ा तो जिन अय्याशो के दम पर ये सब टिके हुए हैं बेकार हो जायेंगे ।
आंखों देखी गुंडा गर्दी
"उ.प्र.पुलिस व परिवहन निगम के चालकों की"
स्थान … दिल्ली का आनंद विहार बस अड्डा__ हमारी उत्तराखंड परिवहन निगम की बस भर चुकी थी, चलने का समय पन्द्रह मिनट पहले हो गया था लेकिन चालक बाहर ही दिखाई दे रहा था।
यात्री बार-बार बस को चलाने को कह रहे थे चालक उन्हें समझाता कि बाहर तो जाम लगा है मैं गाड़ी चला कर ले कहाँ जाऊं, आख़िर यात्रियों की जिद से हमारा चालक तो अपनी जगह पर बैठ गया गाड़ी मोड़ कर बहार निकलने वाले रास्ते पर ले आया पर जब वहां पर खड़े-खड़े बहुत देर हो गई तो हम कुछ लोग उतर कर देखने चले गए कि मामला क्या है , और जब कुछ आगे जाकर देखा कि उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की तीस-चालीस बसें इस तरह से सटा के अड़ा के खड़ी कर रखीं हैं कि जैसे हड़ताल कर दी हो और अभी उनके पीछे से उस रास्ते से बसें आ रहीं थीं, जिस रास्ते से बसों को बाहर निकलना होता है , और चालक; कुछ आपस में हँसी-मजाक और कुछ अपनी-अपनी बसें आगे पीछे करने को उलझे हुए थे। कोई-कोई चालक तो बस ग़लत दिशा में खड़ी कर के स्वयं लापता था । वहां न बस अड्डे के प्रबंधकों का कोई इंतजाम था न दिल्ली पुलिस का , कुछ ठीक ठाक चालकों से मालूम हुआ कि पुलिस होती तो ये उनकी भी नहीं सुनते , वह इस प्रकार की स्थिति देख कर मुहं छुपा कर खिसक लेते हैं दिल्ली सरकार और बस अड्डे के प्रबंधन का हाल तो वैसे ही दिखाई देता है इतनी गन्दगी जैसे महीनों से सफाई न की हो इतनी टूट-फुट जैसे सालों से कोई देख ही न रहा हो।
तो साहब वहां से लगभग एक घंटा देरी से निकले और चल पड़े , लेकिन गाजियाबाद से पहले कुछ पुलिस वालों ने इकट्ठे ऐसे हाथ दिए जैसे उन्हें डर हो कि चालक बस भगा कर न ले जाए। खैर बस के रुकते ही चार-पॉँच खाकी वर्दी धारियों ने इस तरह से धड़ा धड़ अन्दर घुस कर लोगों के सामानों पर हाथ लगा-लगा कर पूछना शुरू कर दिया कि जैसे धावा बोलना या छापा मरना होता है या अपराधियों पर मनोवैज्ञानिक डर बैठाने के लिए ऐसा किया जाता है।“ये अटैची किसकी है… खोल, अरे…. सुना नहीं ये ब्रीफकेश किसका है… खोलता क्यों नहीं… खोल इसे फटाफट, ये बैग किसका है… क्या भर रक्खा है इसमे….दिखा” इस तरह से बस में बठे सभी यात्रियों के सामानों की जाँच की गई और मिला क्या एक यात्री के बैग से एक बोतल शराब की, बस, पुलिस वालों की बांछें खिल गयीं। वह उसे लेकर उतरे साथ ही जिसकी वह बोतल थी उसे उतरने के लिए कह कर “आजा भई आजा” उसे लेकर चले गए जब दस मिनट हो गए तो मैंने भी जाकर देखा कि वो आबकारी विभाग की चौकी थी करीब आठ-दस पुलिस वाले उस आदमी से बहस करने में लगे थे कि “तुझे पता नहीं शराब लेजाना गैरकानूनी है”पुलिस वाले अपने संस्कार भूल जाते हैं आम आदमी से बात करते समय , वह आदमी उस पुलिस वाले से उम्र में बड़ा होगा ,बोला, जनाब एक बोतल ही तो है हम तो जब भी जाते हैं एकाध बोतल ले ही जाते हैं ,फ़िर हमें पता ही नहीं कि शराब ले जाने पर पाबन्दी है , पुलिस वाले का कहना था “एक ही बोतल है मत बोल… तुझे पता नहीं बन्दूक की एक ही गोली आदमी की जान लेलेती है” मेरे साथ और भी दो-तीन लोग वहां पर आ गए थे जब हम में से कोई बोला कि एक बोतल ले जाने पर कब से पाबन्दी लग गई तो वह खा जाने वाले अंदाज में घूरते हुए बोला कि “तू क्या कोई हमारा अफ़्शर है….
चल यहाँ से बस में बैठ” न बोलने की तमीज न शक्ल से ही शरीफ पता नहीं पुलिस वाले थे या कोई…… क्योंकि पिछले दस पन्द्रह साल में पुलिस वाले कमसेकम बोलने की तमीज तो सीख गए हैं, और पिछले इतने ही समय से मैंने ऐसी चैकिंग भी नहीं देखी ।
तो साहब काफी बहस-मुबाहस के बाद आख़िर जिनकी वह बोतल थी उन महाशय ने उनसे बोतल ली और वहीं पीछे की तरफ़ उसे खोल कर शराब फैंक दी , जिसकी कि उन महोदय ने जिद कर रखी थी कि बोतल छोड़ कर नहीं जाऊँगा या तो फैंक कर जाऊँगा या लेकर जाऊँगा। पुलिस वालों के मुह लटक गए कि न माया मिली न रम (बोतल) । मेरी समझ में नहीं आता कि आम आदमी कहाँ जाए नेताओं में गुंडे बदमाश, पुलिस तो पहले ही अपने गुंडा धर्म के लिए जानी जाती है इस तरह की गुंडा गर्दी के लिए क्या कुछ हो सकता है ? सरकारें अपनी बेशर्मी कब छोडेंगी या उन्हें अपनी शक्तियां कब याद आएँगी ? क्यों आम आदमी के मन में सरकारे अपनी जोकरों वाली छवि बना रहीं हैं
स्थान … दिल्ली का आनंद विहार बस अड्डा__ हमारी उत्तराखंड परिवहन निगम की बस भर चुकी थी, चलने का समय पन्द्रह मिनट पहले हो गया था लेकिन चालक बाहर ही दिखाई दे रहा था।
यात्री बार-बार बस को चलाने को कह रहे थे चालक उन्हें समझाता कि बाहर तो जाम लगा है मैं गाड़ी चला कर ले कहाँ जाऊं, आख़िर यात्रियों की जिद से हमारा चालक तो अपनी जगह पर बैठ गया गाड़ी मोड़ कर बहार निकलने वाले रास्ते पर ले आया पर जब वहां पर खड़े-खड़े बहुत देर हो गई तो हम कुछ लोग उतर कर देखने चले गए कि मामला क्या है , और जब कुछ आगे जाकर देखा कि उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की तीस-चालीस बसें इस तरह से सटा के अड़ा के खड़ी कर रखीं हैं कि जैसे हड़ताल कर दी हो और अभी उनके पीछे से उस रास्ते से बसें आ रहीं थीं, जिस रास्ते से बसों को बाहर निकलना होता है , और चालक; कुछ आपस में हँसी-मजाक और कुछ अपनी-अपनी बसें आगे पीछे करने को उलझे हुए थे। कोई-कोई चालक तो बस ग़लत दिशा में खड़ी कर के स्वयं लापता था । वहां न बस अड्डे के प्रबंधकों का कोई इंतजाम था न दिल्ली पुलिस का , कुछ ठीक ठाक चालकों से मालूम हुआ कि पुलिस होती तो ये उनकी भी नहीं सुनते , वह इस प्रकार की स्थिति देख कर मुहं छुपा कर खिसक लेते हैं दिल्ली सरकार और बस अड्डे के प्रबंधन का हाल तो वैसे ही दिखाई देता है इतनी गन्दगी जैसे महीनों से सफाई न की हो इतनी टूट-फुट जैसे सालों से कोई देख ही न रहा हो।
तो साहब वहां से लगभग एक घंटा देरी से निकले और चल पड़े , लेकिन गाजियाबाद से पहले कुछ पुलिस वालों ने इकट्ठे ऐसे हाथ दिए जैसे उन्हें डर हो कि चालक बस भगा कर न ले जाए। खैर बस के रुकते ही चार-पॉँच खाकी वर्दी धारियों ने इस तरह से धड़ा धड़ अन्दर घुस कर लोगों के सामानों पर हाथ लगा-लगा कर पूछना शुरू कर दिया कि जैसे धावा बोलना या छापा मरना होता है या अपराधियों पर मनोवैज्ञानिक डर बैठाने के लिए ऐसा किया जाता है।“ये अटैची किसकी है… खोल, अरे…. सुना नहीं ये ब्रीफकेश किसका है… खोलता क्यों नहीं… खोल इसे फटाफट, ये बैग किसका है… क्या भर रक्खा है इसमे….दिखा” इस तरह से बस में बठे सभी यात्रियों के सामानों की जाँच की गई और मिला क्या एक यात्री के बैग से एक बोतल शराब की, बस, पुलिस वालों की बांछें खिल गयीं। वह उसे लेकर उतरे साथ ही जिसकी वह बोतल थी उसे उतरने के लिए कह कर “आजा भई आजा” उसे लेकर चले गए जब दस मिनट हो गए तो मैंने भी जाकर देखा कि वो आबकारी विभाग की चौकी थी करीब आठ-दस पुलिस वाले उस आदमी से बहस करने में लगे थे कि “तुझे पता नहीं शराब लेजाना गैरकानूनी है”पुलिस वाले अपने संस्कार भूल जाते हैं आम आदमी से बात करते समय , वह आदमी उस पुलिस वाले से उम्र में बड़ा होगा ,बोला, जनाब एक बोतल ही तो है हम तो जब भी जाते हैं एकाध बोतल ले ही जाते हैं ,फ़िर हमें पता ही नहीं कि शराब ले जाने पर पाबन्दी है , पुलिस वाले का कहना था “एक ही बोतल है मत बोल… तुझे पता नहीं बन्दूक की एक ही गोली आदमी की जान लेलेती है” मेरे साथ और भी दो-तीन लोग वहां पर आ गए थे जब हम में से कोई बोला कि एक बोतल ले जाने पर कब से पाबन्दी लग गई तो वह खा जाने वाले अंदाज में घूरते हुए बोला कि “तू क्या कोई हमारा अफ़्शर है….
चल यहाँ से बस में बैठ” न बोलने की तमीज न शक्ल से ही शरीफ पता नहीं पुलिस वाले थे या कोई…… क्योंकि पिछले दस पन्द्रह साल में पुलिस वाले कमसेकम बोलने की तमीज तो सीख गए हैं, और पिछले इतने ही समय से मैंने ऐसी चैकिंग भी नहीं देखी ।
तो साहब काफी बहस-मुबाहस के बाद आख़िर जिनकी वह बोतल थी उन महाशय ने उनसे बोतल ली और वहीं पीछे की तरफ़ उसे खोल कर शराब फैंक दी , जिसकी कि उन महोदय ने जिद कर रखी थी कि बोतल छोड़ कर नहीं जाऊँगा या तो फैंक कर जाऊँगा या लेकर जाऊँगा। पुलिस वालों के मुह लटक गए कि न माया मिली न रम (बोतल) । मेरी समझ में नहीं आता कि आम आदमी कहाँ जाए नेताओं में गुंडे बदमाश, पुलिस तो पहले ही अपने गुंडा धर्म के लिए जानी जाती है इस तरह की गुंडा गर्दी के लिए क्या कुछ हो सकता है ? सरकारें अपनी बेशर्मी कब छोडेंगी या उन्हें अपनी शक्तियां कब याद आएँगी ? क्यों आम आदमी के मन में सरकारे अपनी जोकरों वाली छवि बना रहीं हैं
Sunday, September 13, 2009
नेताओं से नैतिकता की अपेक्षा क्यों...?
हम आजकल नेताओं से नैतिकता की अपेक्षा करने लगे हैं।
वो भी उस पार्टी के नेताओं से जिसका भारत पर सबसे अधिक प्रभाव व सबसे अधिक राज रहा है। जाहिर है, कि अनैतिकता फैलाने में भी सबसे अधिक योगदान उसी पार्टी का होगा, उसके नेताओं का होगा। अब आज क्यों हमारे बुद्धिजीवी, हमारे न्यूज चैनल उन नेताओं से ये अपेक्षा करते हैं कि वे नैतिकता दिखाएँ ?
इस देश की जनता नैतिकता दिखाने वालों को तुच्छ समझती है , जो स्वयं अय्याशी नहीं कर सकता वह आम आदमी का क्या भला करेगा, जब स्वयं अय्याशी करेगा तब कमसेकम आम आदमी के लिए दो रोटी की सोचेगा , जो ख़ुद ही दो रोटी पर गुजारा करता होगा वह आम आदमी को क्या देगा, आम आदमी के हिस्से तो आधी रोटी भी नहीं आनी ।
नैतिकता वो भी नेताओं से , जिन्होंने स्वयं कमाया है , कोई जनता की कमाई थोड़े ही अय्याशी पर लुटा रहे थे जनता की कमाई तो सरकार लुटाती है, तब इन्हें (न्यूज चैनलों व बुद्धिजीवियों को) नहीं समझ आता कि क्या कहें। क्योंकि इन्हें विज्ञापनी बजट में हिस्सा मिल जाता है ।
नेताओं की बात छोड़ दें तो कई अन्यों की इसी तरह की अनैतिकता के दायरे में आने वाली बातों को ये (न्यूज चैनल ) खूब प्रसारित करते है ,क्रिकेटरों की एक-एक करोड़ की कारें , करोड़ों के बनते मकान व उनके अन्य खर्च , जो अय्याशी की श्रेणी में आते हैं ,
और कमसेकम इन खिलाड़ियों के लिए तो बिल्कुल ही अनैतिक हैं क्योंकि ये आम आदमी के बीच से और आम आदमी के कारण करोड़ों कमा रहे हैं, अगर आम आदमी इनके खेल और विज्ञापन न देखे तो इनका क्या होगा। लेकिन इन लोगों (न्यूज चैनलों को) नहीं दीखता , जब हमारी सरकारें अपने सांसदों-विधायकों-अधिकारीयों-कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने को निर्लज्जता से नियम बनाते हैं
क्या वो अनैतिकता नहीं है ? आम आदमी के लिए तो सौ रूपये रोज वो भी साल में केवल सौ दिन ,मतलब ,साल में दस हजार मात्र। इसमें अनैतिकता नहीं दिखती। नेताओं के पीछे पड़े रहते हैं। बड़े आदमी नेता बनते हैं जिन्होंने जिंदगी पंचसितारा होटलों में ही काटी है, वह हमें लगती है अय्याशी, उनके लिए तो जिंदगी की जरुरत है जैसे हमें जीने के लिए रोटी चाहिए –उन्हें जीने के लिए पंचसितारा होटल चाहिए। नैतिकता-अनैतिकता पर बहस करनी थी तो तब करते जब इन जैसे उद्योगपतियों को या पैसे वालों को राजनीतिक पार्टियाँ अपने हित में सांसद या विधायक बनाती हैं , अब इस बात पर गाल बजा कर कोई फायदा नहीं अगर यही लोग या इनकी कम्पनियां तुम्हें विज्ञापन दे देंगी तो सब एकदम चुप हो जाओगे । बाकी रहा आम आदमी, उसके लिए तो ठीक ही है ,जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय। अब तो राजनीति में लोग आते ही अनैतिकता के लिए हैं । नैतिकता स्थापित करने का ठेका अगर नेताओं को दे दोगे तो काम चलना मुश्किल होगा ।
वो भी उस पार्टी के नेताओं से जिसका भारत पर सबसे अधिक प्रभाव व सबसे अधिक राज रहा है। जाहिर है, कि अनैतिकता फैलाने में भी सबसे अधिक योगदान उसी पार्टी का होगा, उसके नेताओं का होगा। अब आज क्यों हमारे बुद्धिजीवी, हमारे न्यूज चैनल उन नेताओं से ये अपेक्षा करते हैं कि वे नैतिकता दिखाएँ ?
इस देश की जनता नैतिकता दिखाने वालों को तुच्छ समझती है , जो स्वयं अय्याशी नहीं कर सकता वह आम आदमी का क्या भला करेगा, जब स्वयं अय्याशी करेगा तब कमसेकम आम आदमी के लिए दो रोटी की सोचेगा , जो ख़ुद ही दो रोटी पर गुजारा करता होगा वह आम आदमी को क्या देगा, आम आदमी के हिस्से तो आधी रोटी भी नहीं आनी ।
नैतिकता वो भी नेताओं से , जिन्होंने स्वयं कमाया है , कोई जनता की कमाई थोड़े ही अय्याशी पर लुटा रहे थे जनता की कमाई तो सरकार लुटाती है, तब इन्हें (न्यूज चैनलों व बुद्धिजीवियों को) नहीं समझ आता कि क्या कहें। क्योंकि इन्हें विज्ञापनी बजट में हिस्सा मिल जाता है ।
नेताओं की बात छोड़ दें तो कई अन्यों की इसी तरह की अनैतिकता के दायरे में आने वाली बातों को ये (न्यूज चैनल ) खूब प्रसारित करते है ,क्रिकेटरों की एक-एक करोड़ की कारें , करोड़ों के बनते मकान व उनके अन्य खर्च , जो अय्याशी की श्रेणी में आते हैं ,
और कमसेकम इन खिलाड़ियों के लिए तो बिल्कुल ही अनैतिक हैं क्योंकि ये आम आदमी के बीच से और आम आदमी के कारण करोड़ों कमा रहे हैं, अगर आम आदमी इनके खेल और विज्ञापन न देखे तो इनका क्या होगा। लेकिन इन लोगों (न्यूज चैनलों को) नहीं दीखता , जब हमारी सरकारें अपने सांसदों-विधायकों-अधिकारीयों-कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने को निर्लज्जता से नियम बनाते हैं
क्या वो अनैतिकता नहीं है ? आम आदमी के लिए तो सौ रूपये रोज वो भी साल में केवल सौ दिन ,मतलब ,साल में दस हजार मात्र। इसमें अनैतिकता नहीं दिखती। नेताओं के पीछे पड़े रहते हैं। बड़े आदमी नेता बनते हैं जिन्होंने जिंदगी पंचसितारा होटलों में ही काटी है, वह हमें लगती है अय्याशी, उनके लिए तो जिंदगी की जरुरत है जैसे हमें जीने के लिए रोटी चाहिए –उन्हें जीने के लिए पंचसितारा होटल चाहिए। नैतिकता-अनैतिकता पर बहस करनी थी तो तब करते जब इन जैसे उद्योगपतियों को या पैसे वालों को राजनीतिक पार्टियाँ अपने हित में सांसद या विधायक बनाती हैं , अब इस बात पर गाल बजा कर कोई फायदा नहीं अगर यही लोग या इनकी कम्पनियां तुम्हें विज्ञापन दे देंगी तो सब एकदम चुप हो जाओगे । बाकी रहा आम आदमी, उसके लिए तो ठीक ही है ,जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय। अब तो राजनीति में लोग आते ही अनैतिकता के लिए हैं । नैतिकता स्थापित करने का ठेका अगर नेताओं को दे दोगे तो काम चलना मुश्किल होगा ।
Monday, September 7, 2009
धौनी की कमाई
बाजारवाद का कमाल है वरना कौन पूछ रहा है ।
धौनी की कमाई सब देख रहे हैं खर्चे कोई नहीं देखता। जबकि अभी कमाई का आंकड़ा हाफ सेंचुरी भी पूरा नहीं हो पाया। सेंचुरी के लिए तो अभी पूरे इक्यावन करोड़ और चाहिए।
ये तो ऑन रिकॉर्ड आंकड़े हैं ऑफ रिकॉर्ड , क्या पता पूरी सेंचुरी हो।
लेकिन जनाब इतने में भी पूरा कहाँ पड़ता है। अब हाफ सेंचुरी वाले आंकड़े को ही ले लें तो इसमें से कई करोड़ तो आयकर में ही चला जाता होगा, बचे कुछ करोड़ों में से अभी उनका मकान निर्माणाधीन हैं,जाने कितने करोड़ का बजट होगा,अब आम आदमी की तरह का मकान तो होगा नहीं, न जाने कितने विशेषज्ञ होंगे जिनकी फीसें ही करोड़ों में होगी। फ़िर मकान बनते-बनते बजट लगभग दोगुना हो जाता है। पहले की बात और थी आम आदमी की तरह थे एक कमरे के मकान में भी गुजारा हो जाता था। तो अपने नाम के अनुरूप पूरा stendard देखना पड़ता है। फ़िर अन्य खर्चे भी हैं गाड़ी भी एक करोड़ की खरीदनी जरुरी है। मोटर बायिकें तो कई चाहिए , क्या होता है उनंचास करोड़ से, जैसी हेसियत-वैसा खर्चा, ये भी कम ही पड़ता है चिंता में घुले रहते हैं जब खेल नहीं पाएंगे तब क्या होगा कौन देगा। इन सारी बातों को कोई नहीं देखता-कमाई सब देखते है, इस कमाई के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं तुम्हें क्या पता। इस पैसे के लिए कितना झूठ जीना पड़ता है । विज्ञापनों के लिए , अपनी आत्मा तक को नजरअंदाज करना पड़ता है जब बेकार वस्तु का विज्ञापन करना पड़ता है जिससे बेचारे देश के भोले लोगों को कोई फायदा नहीं, उल्टा नुक्सान ही होता होगा। फ़िर ये अकेले धौनी की बात नहीं है जितने भी क्रिकेट के कारण इस देश में "भागवान" बने हैं सबकी बात है । बाजारवाद का कमाल है वरना कौन पूछ रहा है।
धौनी की कमाई सब देख रहे हैं खर्चे कोई नहीं देखता। जबकि अभी कमाई का आंकड़ा हाफ सेंचुरी भी पूरा नहीं हो पाया। सेंचुरी के लिए तो अभी पूरे इक्यावन करोड़ और चाहिए।
ये तो ऑन रिकॉर्ड आंकड़े हैं ऑफ रिकॉर्ड , क्या पता पूरी सेंचुरी हो।
लेकिन जनाब इतने में भी पूरा कहाँ पड़ता है। अब हाफ सेंचुरी वाले आंकड़े को ही ले लें तो इसमें से कई करोड़ तो आयकर में ही चला जाता होगा, बचे कुछ करोड़ों में से अभी उनका मकान निर्माणाधीन हैं,जाने कितने करोड़ का बजट होगा,अब आम आदमी की तरह का मकान तो होगा नहीं, न जाने कितने विशेषज्ञ होंगे जिनकी फीसें ही करोड़ों में होगी। फ़िर मकान बनते-बनते बजट लगभग दोगुना हो जाता है। पहले की बात और थी आम आदमी की तरह थे एक कमरे के मकान में भी गुजारा हो जाता था। तो अपने नाम के अनुरूप पूरा stendard देखना पड़ता है। फ़िर अन्य खर्चे भी हैं गाड़ी भी एक करोड़ की खरीदनी जरुरी है। मोटर बायिकें तो कई चाहिए , क्या होता है उनंचास करोड़ से, जैसी हेसियत-वैसा खर्चा, ये भी कम ही पड़ता है चिंता में घुले रहते हैं जब खेल नहीं पाएंगे तब क्या होगा कौन देगा। इन सारी बातों को कोई नहीं देखता-कमाई सब देखते है, इस कमाई के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं तुम्हें क्या पता। इस पैसे के लिए कितना झूठ जीना पड़ता है । विज्ञापनों के लिए , अपनी आत्मा तक को नजरअंदाज करना पड़ता है जब बेकार वस्तु का विज्ञापन करना पड़ता है जिससे बेचारे देश के भोले लोगों को कोई फायदा नहीं, उल्टा नुक्सान ही होता होगा। फ़िर ये अकेले धौनी की बात नहीं है जितने भी क्रिकेट के कारण इस देश में "भागवान" बने हैं सबकी बात है । बाजारवाद का कमाल है वरना कौन पूछ रहा है।
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