रीता बहुगुणा जोशी बनाम मायावती दोनों में झगड़ा शुरू, बड़ा मजा आएगा, अभी तक वोटों के लिए और अपने कार्यकर्ताओंकी संख्या बढ़ाने के लिए नेता, दिखावे के तौर पर लड़ते थे। अंग्रेजों के समय से ये परम्परा चली आ रही है।हमारी आजादी के " स्वयंघोषित , एकलौते नेता और पार्टी वाले" बाहर अंग्रेजों का डटकर विरोध(दिखावा) करते थे संसद में उनकी जी हजूरी करते थे। बाहर आम जनता इन्हें देख कर ज्यादा जोश में आ जाती थी और पिटती थी या मरती थी ये अहिंसावादी बन कर जेलों के अन्दर शरण लेलेते थे।
यही आज के नेता करते आ रहे थे ,इनके दिखावे के कारण कार्यकर्ता आपस में खूनखराबा तक कर
देते हैं, पर ये सचमुच की लड़ाई है। मजा तो आएगा ही। अब हम तो आम आदमी की श्रेणी के आदमी हैं कोई पार्टी वाले होते तो दो बंदरों की लड़ाई में बिल्ली के फायदे वाली बात सोचते। कार्यकर्ताओं को भी अब तटस्थ हो जाना चाहिए ,क्या है कि जमाना बदल गया है, क्या पता कल को ये पार्टी छोड़ कर वो पार्टी पकड़नी पड़े । ऐसे में थोडी बहुत शर्मिंदगी तो होती ही होगी,स्वयं न भी हो तो मीडिया वाले करवा देते हैं।
वैसे टक्कर में बराबरी नहीं लगती एक मुख्यमंत्री दूसरी प्रदेश अध्यक्ष, अब देखना ये है कि कांग्रेसी (विशेषकर हाईकमान)इस लड़ाई को बराबरी का बनाने के लिए अपनी नेता का कितना साथ देते हैं।
ताजा प्रविष्ठियां
Saturday, July 18, 2009
Thursday, July 16, 2009
जैसे को तैसा
"रीता बहुगुणा जोशी" ने जो कहा एक दम चालू जुबान में कह दिया; ये बात तो आम आदमी रोज सोचता और बोलता है ,जब भी ये नेता-अधिकारी किसी पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा देकर भूल जाते हैं ।
जोशी जी ने
नेताओं वाली भाषा का इस्तेमाल न कर के, भावावेश में आम आदमी की भाषा का इस्तेमाल कर दिया । "फ़िर भी... कीचड़ में पत्थर मर दिया" ।
बसपाई ये भूल गए की उनकी नेता के विचार भी ऐसे ही होते थे ।
जो भी हुआ उससे केवल न्यूज चैनल वालों को लाभ हुआ,इन्होने इसीलिए इस बात को इतना उछाला वरना किसी का ध्यान इस बात की तरफ़ नहीं जाता। इनका तो फायदा हुआ जोशी जी का कितना नुकशान हो गया ,पता नहीं। सच में न्यूज चैनलों की चांदी ही चांदी।
आजकल ये सचिन और काम्बली की दोस्ती के पीछे भी पड़े हैं।
पता नहीं ये समाज के भले के लिए काम कर रहे हैं या समाज में तोड़-फोड़ के लिए, और, व्यभिचार फैलाने वाले चैनलों और हीरो-हिरोईनों के प्रचार-प्रसार में अपना समय बिता रहे हैं बिना कुछ किए कराये पैसा भी खूब रेटिंग भी खूब । धन्य हो भारतीय समाचार चैनलों की नंगई के लिए ।
जोशी जी ने
नेताओं वाली भाषा का इस्तेमाल न कर के, भावावेश में आम आदमी की भाषा का इस्तेमाल कर दिया । "फ़िर भी... कीचड़ में पत्थर मर दिया" ।
बसपाई ये भूल गए की उनकी नेता के विचार भी ऐसे ही होते थे ।
जो भी हुआ उससे केवल न्यूज चैनल वालों को लाभ हुआ,इन्होने इसीलिए इस बात को इतना उछाला वरना किसी का ध्यान इस बात की तरफ़ नहीं जाता। इनका तो फायदा हुआ जोशी जी का कितना नुकशान हो गया ,पता नहीं। सच में न्यूज चैनलों की चांदी ही चांदी।
आजकल ये सचिन और काम्बली की दोस्ती के पीछे भी पड़े हैं।
पता नहीं ये समाज के भले के लिए काम कर रहे हैं या समाज में तोड़-फोड़ के लिए, और, व्यभिचार फैलाने वाले चैनलों और हीरो-हिरोईनों के प्रचार-प्रसार में अपना समय बिता रहे हैं बिना कुछ किए कराये पैसा भी खूब रेटिंग भी खूब । धन्य हो भारतीय समाचार चैनलों की नंगई के लिए ।
लोकतंत्र या बंधुआ मजदूरी
छोटा सा राज्य उत्तराखंड, जब उसके पूर्व मुख्य मंत्रियों ,वो भी केवल तीन पर, इतना(तीस लाख प्र.माह) खर्च होता है तो ये काफी विचारनीय प्रश्न है कि पूरे देश में कितना खर्च होता होगा। जो सेवानिव्रत हो गए हैं ये खर्च तो उन पर है। जो सेवा में हैं उनका तो हिसाब लगाया जाना मुश्किल ही है क्योंकि कागज किताबों से कई गुना ज्यादा वह भ्रष्टाचार से कमा रहे हैं ।ये सब लोकतंत्र के नाम पर ठगी नहीं तो क्या है। और कुछ ही नेताओं की वंश परम्परा के कारण भारत के लोग बंधुआ मजदुर की तरह बंधे हुए नही हैं। वोट देना ही देना है नहीं दोगे तब भी कोई न कोई चुना जाएगा । मतलब न चाहते हुए भी कोई न कोई चुना जाएगा ।
फ़िर, आम आदमी को खाने को सूखी रोटी मिले न मिले पर इन्हें रसमलाई खिलानी पड़ेगी इनके मरने तक सारे नाज नखरे उठाने पड़ेंगे । मरने के बाद ,
फ़िर इनके बच्चे तैयार हो जायेंगे । ये सिलसिला थमता नहीं दिख रहा ।
अभी तो वह खर्च अलग हैं तो ये अपनी सनक पूरी करने के लिए करते हैं जैसे मायावती हाथी बनवा रहीं हैं
हिंग लगे न फिटकरी रोंग चोखा हम भी लोकतंत्र के बंधुआ मजदूर करते रहेंगे।
Wednesday, July 15, 2009
डॉक्टरों की हड़ताल
चिकित्सा कार्य अब पहले जैसा “सेवा कार्य” नहीं रहा। "व्यवसाय बन गया है"।
आरामपसंद जीवन पद्दति और आकस्मिक दुर्घटनाओं के कारण इनका व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है। देश-विदेश में भरपूर रोजगार के अवसर होते हैं, इसीलिए ये लोग पढ़ने के लिए लाखों रूपये खर्च करने से नहीं कतराते । क्योंकि डॉक्टर बनने के बाद तो उससे कई गुना अधिक कमाई होनी है। सरकारी अस्पतालों में नौकरी करने का मतलब वह सरकार और जनता पर अहसान कर रहे हैं।
ऐसे में सरकारी डॉक्टरों की हड़ताल ,उस पर सरकार द्वारा उन्हें धमकाना कि नौकरी से निकाल देंगे “बकरी का ऊंट पर रौब ज़माने”जैसा लगता है। सरकार को सोच-समझ कर बोलना चाहिए ,क्या होगा, नौकरी से निकाल कर ? भूखे मर जायेंगे क्या? फ़िर हड़ताल करने का अधिकार सरकार ने ही तो उन्हें दे रखा है।बीमार मरें या तड़पें किसी को क्या। “बीमार गरीब आदमी”,होता ही मरने के लिए है ,और अमीर आदमी किसी भी बड़े अस्पताल में "इन्हीं" डॉक्टरौं से इलाज करवा लेता है। तो; ये केवल सरकार का दिखावा है, अगर धमकाना ही है तो इनकी डिग्री निरस्त करने को कह कर धमका सकते हैं पर सरकार ऐसा नहीं करेगी क्योंकि अधिकतर इन्ही के नेताओं के सगे सम्बन्धी डॉक्टर होंगे। रही नैतिकता की बात तो आज नैतिकता रही किसमे है जो दूसरे से नैतिकता की उम्मीद की जाए।
आखरी और खरी बात ये, कि जिनसे कोई काम नहीं होता है, सरकारी नौकरियों में , वही हड़ताल करते हैं। किसी ने सच ही कहा है कि "खाली दिमाग शैतान का घर" होता है।
पिछले कुछ समय से देखा जाए तो सबसे ज्यादा हड़ताल सरकारी क्षेत्र में मास्टरों और डॉक्टरों की हो रही है ,दोनों ही मामलों में एक बात गौर करने वाली है कि न मास्टर अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाते हैं न डॉक्टर अपने सम्बन्धी का इलाज सरकारी अस्पताल में कराते हैं। यही बात नेताओं और अधिकारीयों पर लागू होती है।
आरामपसंद जीवन पद्दति और आकस्मिक दुर्घटनाओं के कारण इनका व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है। देश-विदेश में भरपूर रोजगार के अवसर होते हैं, इसीलिए ये लोग पढ़ने के लिए लाखों रूपये खर्च करने से नहीं कतराते । क्योंकि डॉक्टर बनने के बाद तो उससे कई गुना अधिक कमाई होनी है। सरकारी अस्पतालों में नौकरी करने का मतलब वह सरकार और जनता पर अहसान कर रहे हैं।
ऐसे में सरकारी डॉक्टरों की हड़ताल ,उस पर सरकार द्वारा उन्हें धमकाना कि नौकरी से निकाल देंगे “बकरी का ऊंट पर रौब ज़माने”जैसा लगता है। सरकार को सोच-समझ कर बोलना चाहिए ,क्या होगा, नौकरी से निकाल कर ? भूखे मर जायेंगे क्या? फ़िर हड़ताल करने का अधिकार सरकार ने ही तो उन्हें दे रखा है।बीमार मरें या तड़पें किसी को क्या। “बीमार गरीब आदमी”,होता ही मरने के लिए है ,और अमीर आदमी किसी भी बड़े अस्पताल में "इन्हीं" डॉक्टरौं से इलाज करवा लेता है। तो; ये केवल सरकार का दिखावा है, अगर धमकाना ही है तो इनकी डिग्री निरस्त करने को कह कर धमका सकते हैं पर सरकार ऐसा नहीं करेगी क्योंकि अधिकतर इन्ही के नेताओं के सगे सम्बन्धी डॉक्टर होंगे। रही नैतिकता की बात तो आज नैतिकता रही किसमे है जो दूसरे से नैतिकता की उम्मीद की जाए।
आखरी और खरी बात ये, कि जिनसे कोई काम नहीं होता है, सरकारी नौकरियों में , वही हड़ताल करते हैं। किसी ने सच ही कहा है कि "खाली दिमाग शैतान का घर" होता है।
पिछले कुछ समय से देखा जाए तो सबसे ज्यादा हड़ताल सरकारी क्षेत्र में मास्टरों और डॉक्टरों की हो रही है ,दोनों ही मामलों में एक बात गौर करने वाली है कि न मास्टर अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाते हैं न डॉक्टर अपने सम्बन्धी का इलाज सरकारी अस्पताल में कराते हैं। यही बात नेताओं और अधिकारीयों पर लागू होती है।
Saturday, July 11, 2009
सरकार, तुम कहाँ हो ?
सरकार… सरकार…..ओ सरकार… ! तुम कहाँ हो; यहाँ हम लुट रहे हैं, पिट रहे हैं खाने को रोटी नहीं पीने को पानी नहीं,सब्जियां, दालें,आटा-चावल दूध,घी-तेल,जीने के लिए जरुरी हर चीज इतनी महंगी हो गई हैं कि,दिन भर की दिहाड़ी में एक समय की सब्जी आती है ,कैसे पेट भरें । पिछले बहुत समय से तुम्हें ढूंढ़ रहे हैं,मीडिया में तुम्हारी आवाज और चेहरा तो दीखता है पर सामने कभी नही दखाई दिए।
हम तुम्हारे ही कर्मचारियों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार से लुट रहे हैं, कर्मचारी ही क्यों स्वयं तुम्हारे (नेता)द्वारा भी तो हम लुट रहे हैं पर तुम कहीं नजर नहीं आते,रास्ता चलते तुम्हारी पुलिस कब- किसे गोली से उड़ा दे पता नहीं,फ़िर हम चिल्लाते रहते हैं ,तुम नजर नहीं आते बल्कि ऐसे मामलों में तो अदृश्य रह कर अपने कर्मचारियों का बचाव भी करते हो उन्हें निलंबित कर या लाईन हाजिर कर, घर बैठे वेतन पहुंचाते हो जो उनके लिए इनाम की तरह होता है,और मरने वाले के परिवार को मुआवजे की घोषणा(अहसान) करके भूल जाते हो ,वैसे भी; मुआवजे से तसल्ली होती है तो पुलिस में भर्ती अपराधियों को गोली मार कर उनके घर वालों को मुआवजा देना चाहिए। पर हम चिल्लाते रहे तुम ने नहीं सुना। मुझे लगा, तुम हो ही नहीं ;अगर होते तो जरुर सुनते।
लेकिन जब चुनाव होते हैं तब तुम्हारे होने का अहसास होता है।
जब गाडियों के काफिले में जनता पर जाम लगा कर तुम निकलते हो, तो तुम्हारे होने का अहसास होता है । जब तुम हो तभी तो तुम्हारे आने पर , रातों-रात रोड़ बन जाती है, जिसके लिए हम सालों से चिल्लाते रहे,हैलीपैड बन जाता है,व्यवस्था चाक-चौबंद हो जाती है….तब अहसास होता है कि तुम हो। पर मेरी(आम-जनता की) नहीं सुन रहे हो ।
अब देखो न बहुत समय से हमें पीने को पानी नहीं मिल रहा ,बोतल वाला पानी हमारे लिए बहुत महंगा है, पर बोतलों को देख कर एक प्रश्न दिमाग में उठता है कि इन पानी के सौदागरों को इतना पानी कहाँ से मिल जाता है कि जितनी चाहे आपूर्ति कर दें,ये ही क्यों, शराब के सौदागर भी तो करोड़ों लीटर पानी रोज खर्च कर रहे हैं , अन्य पेय अलग हैं।इनको तो पानी बेचने को मिल जा रहा है हमें पीने को भी नहीं आख़िर क्यों ?
तुम कहाँ हो कुछ देखते क्यों नहीं ? कुछ करते क्यों नहीं ? हम तो समझते थे बड़े ताक़तवर होओगे ,करोड़ों की संख्या से चुन कर आए हो, पर जिन्होंने तुम्हें चुना ,हर-बार तुम उन्हें ही भूल जाते हो। अपना और अपने कर्मचारियों का ही भला करने में रह जाते हो, क्योंकि वे (कर्मचारी) संगठित हैं (हड़ताल कर देते हैं) इसलिए ? और तुम, खुदमुख्तार हो इसलिए ? अपने और अपनों के लिए तो एक हजार से पॉँच हजार रूपये रोज और हमारी दिहाड़ी एक सौ रूपये रोज वो भी कुछ दिन।
सौ रूपये में हम क्या खाएं चालीस रूपये किलो टमाटर, इतनी ही महँगी अन्य सब्जियां तोरी,घिया आलू इत्यादि, क्या इनके आलावा भी गरीब आदमी के खाने को कुछ है ? फलों को तो केवल सूंघ कर मन-मना ले रहे हैं ,दालें व घी- तेल खाना तो छोड़ने पड़ेंगे । दूध जो मिल भी रहा है उसका भरोसा नहीं कि बिना जहर का होगा। वैसे तो तम्हारे दिखाई न देने का फायदा तुम्हारे कर्मचारी-अधिकारी खूब उठा रहे हैं ।
अब देखो न महंगाई तो “जो है वो है” पर खाने-पीने की वस्तुओं में मिलावट क्या तुम्हारे कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना हो सकती है, अगर सुन रहे हो तो जरुर बताना ,दूध में मिलावट घी में मिलावट, हर वस्तु में मिलावट यहाँ तक कि जो स्वयं जहर है,शराब , उसमे भी जहर मिला दिया ।
सोचो ! अगर तुमने सालों पहले सुन लिया होता तो क्या अब भी ये हालात होते , इतने लोगों की जान जाती ? पर तुम अभी भी नहीं सुन रहे ,जरा बताओ तो, आजादी से पहले क्या जहरीली शराब से लोग मरते थे ,या मिलावट का धंधा इस तरह चलता था , हम तो मिठाईयों के स्वाद ही भूल गए क्योंकि मावा भी सिंथेटिक बनने लगा, आख़िर तुम अपनी शक्तियों का इस्तेमाल क्यों भूल रखे हो ,तुम्हारे नाकारेपन से अराजकता फ़ैल गई है,अपराधी केवल छुरे-बन्दूक से ही नहीं मार रहे ,सब्जियों तक में जहर के इंजेक्शन से भी मार रहे हैं।
वैसे भी खेती योग्य जमीन को तुम उद्योग और कॉलोनी बनाने को छीन लेते हो जिससे खाने की वस्तुयें कम पैदा हो रहीं हैं ,ज्यादा पैदावार को इंजेक्शन लगाने ही पड़ते हैं। नदी-नालों का पानी इतना जहरीला हो गया है कि जमीं में सब कुछ जहरीला पैदा हो रहा है। पर तुम न देख रहे हो न सुन रहे हो ।
सरकार, तुम टी.वी.और अखबार नहीं देखते क्या ,ख़ुद तो इनमें बहुत दिखाई देते हो,इनमें दिखने के साथ ही इन्हें देखा भी करो,पता तो लगे कि देश में जनता के साथ क्या हो रहा है। अपने अधिकारीयों द्वारा बनाये आंकड़ों पर तभी भरोसा करते हो शायद,जब इन्हें नहीं देखते। हुजुर, आकड़ों में तो महंगाई कम हो रही है,गरीबी कम हो रही है,भूख,बेरोजगारी कम हो रही है,अपराध कम हो रहे हैं ,जबकि ये सब बढ़ रहा है,और जो बढ़ा हुआ दिखा रहे हैं, वो सब कम हो रहा है। इसलिए टी.वी.अख़बार देखो ,शर्म से आँखें झुक जाएँगी,और शर्म आना अच्छी बात है तभी कुछ शक्तियों(कर्तव्यों) का भान होगा। जब शक्ति का भान होता है तो सरदार पटेल की तरह पुरे भारत को एक करने का जज्बा पैदा होता है। अरे, सरदार पटेल से नहीं सीखना चाहते तो अंग्रेजों से तो कुछ सीख लो , वो तो तुम्हारे निकट….. हैं।
हम तो तुम्हें कब से पुकार रहे हैं पर तुम अपने लिए मूर्तियाँ बनाने में,बंगले की सजावट में, पुलों के नामकरण में, उद्घाटनो में ,व्यस्त हो ,बस जनता की नहीं सुन रहे हो, आख़िर कब सुनोगे ?
हम तुम्हारे ही कर्मचारियों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार से लुट रहे हैं, कर्मचारी ही क्यों स्वयं तुम्हारे (नेता)द्वारा भी तो हम लुट रहे हैं पर तुम कहीं नजर नहीं आते,रास्ता चलते तुम्हारी पुलिस कब- किसे गोली से उड़ा दे पता नहीं,फ़िर हम चिल्लाते रहते हैं ,तुम नजर नहीं आते बल्कि ऐसे मामलों में तो अदृश्य रह कर अपने कर्मचारियों का बचाव भी करते हो उन्हें निलंबित कर या लाईन हाजिर कर, घर बैठे वेतन पहुंचाते हो जो उनके लिए इनाम की तरह होता है,और मरने वाले के परिवार को मुआवजे की घोषणा(अहसान) करके भूल जाते हो ,वैसे भी; मुआवजे से तसल्ली होती है तो पुलिस में भर्ती अपराधियों को गोली मार कर उनके घर वालों को मुआवजा देना चाहिए। पर हम चिल्लाते रहे तुम ने नहीं सुना। मुझे लगा, तुम हो ही नहीं ;अगर होते तो जरुर सुनते।
लेकिन जब चुनाव होते हैं तब तुम्हारे होने का अहसास होता है।
जब गाडियों के काफिले में जनता पर जाम लगा कर तुम निकलते हो, तो तुम्हारे होने का अहसास होता है । जब तुम हो तभी तो तुम्हारे आने पर , रातों-रात रोड़ बन जाती है, जिसके लिए हम सालों से चिल्लाते रहे,हैलीपैड बन जाता है,व्यवस्था चाक-चौबंद हो जाती है….तब अहसास होता है कि तुम हो। पर मेरी(आम-जनता की) नहीं सुन रहे हो ।
अब देखो न बहुत समय से हमें पीने को पानी नहीं मिल रहा ,बोतल वाला पानी हमारे लिए बहुत महंगा है, पर बोतलों को देख कर एक प्रश्न दिमाग में उठता है कि इन पानी के सौदागरों को इतना पानी कहाँ से मिल जाता है कि जितनी चाहे आपूर्ति कर दें,ये ही क्यों, शराब के सौदागर भी तो करोड़ों लीटर पानी रोज खर्च कर रहे हैं , अन्य पेय अलग हैं।इनको तो पानी बेचने को मिल जा रहा है हमें पीने को भी नहीं आख़िर क्यों ?
तुम कहाँ हो कुछ देखते क्यों नहीं ? कुछ करते क्यों नहीं ? हम तो समझते थे बड़े ताक़तवर होओगे ,करोड़ों की संख्या से चुन कर आए हो, पर जिन्होंने तुम्हें चुना ,हर-बार तुम उन्हें ही भूल जाते हो। अपना और अपने कर्मचारियों का ही भला करने में रह जाते हो, क्योंकि वे (कर्मचारी) संगठित हैं (हड़ताल कर देते हैं) इसलिए ? और तुम, खुदमुख्तार हो इसलिए ? अपने और अपनों के लिए तो एक हजार से पॉँच हजार रूपये रोज और हमारी दिहाड़ी एक सौ रूपये रोज वो भी कुछ दिन।
सौ रूपये में हम क्या खाएं चालीस रूपये किलो टमाटर, इतनी ही महँगी अन्य सब्जियां तोरी,घिया आलू इत्यादि, क्या इनके आलावा भी गरीब आदमी के खाने को कुछ है ? फलों को तो केवल सूंघ कर मन-मना ले रहे हैं ,दालें व घी- तेल खाना तो छोड़ने पड़ेंगे । दूध जो मिल भी रहा है उसका भरोसा नहीं कि बिना जहर का होगा। वैसे तो तम्हारे दिखाई न देने का फायदा तुम्हारे कर्मचारी-अधिकारी खूब उठा रहे हैं ।
अब देखो न महंगाई तो “जो है वो है” पर खाने-पीने की वस्तुओं में मिलावट क्या तुम्हारे कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना हो सकती है, अगर सुन रहे हो तो जरुर बताना ,दूध में मिलावट घी में मिलावट, हर वस्तु में मिलावट यहाँ तक कि जो स्वयं जहर है,शराब , उसमे भी जहर मिला दिया ।
सोचो ! अगर तुमने सालों पहले सुन लिया होता तो क्या अब भी ये हालात होते , इतने लोगों की जान जाती ? पर तुम अभी भी नहीं सुन रहे ,जरा बताओ तो, आजादी से पहले क्या जहरीली शराब से लोग मरते थे ,या मिलावट का धंधा इस तरह चलता था , हम तो मिठाईयों के स्वाद ही भूल गए क्योंकि मावा भी सिंथेटिक बनने लगा, आख़िर तुम अपनी शक्तियों का इस्तेमाल क्यों भूल रखे हो ,तुम्हारे नाकारेपन से अराजकता फ़ैल गई है,अपराधी केवल छुरे-बन्दूक से ही नहीं मार रहे ,सब्जियों तक में जहर के इंजेक्शन से भी मार रहे हैं।
वैसे भी खेती योग्य जमीन को तुम उद्योग और कॉलोनी बनाने को छीन लेते हो जिससे खाने की वस्तुयें कम पैदा हो रहीं हैं ,ज्यादा पैदावार को इंजेक्शन लगाने ही पड़ते हैं। नदी-नालों का पानी इतना जहरीला हो गया है कि जमीं में सब कुछ जहरीला पैदा हो रहा है। पर तुम न देख रहे हो न सुन रहे हो ।
सरकार, तुम टी.वी.और अखबार नहीं देखते क्या ,ख़ुद तो इनमें बहुत दिखाई देते हो,इनमें दिखने के साथ ही इन्हें देखा भी करो,पता तो लगे कि देश में जनता के साथ क्या हो रहा है। अपने अधिकारीयों द्वारा बनाये आंकड़ों पर तभी भरोसा करते हो शायद,जब इन्हें नहीं देखते। हुजुर, आकड़ों में तो महंगाई कम हो रही है,गरीबी कम हो रही है,भूख,बेरोजगारी कम हो रही है,अपराध कम हो रहे हैं ,जबकि ये सब बढ़ रहा है,और जो बढ़ा हुआ दिखा रहे हैं, वो सब कम हो रहा है। इसलिए टी.वी.अख़बार देखो ,शर्म से आँखें झुक जाएँगी,और शर्म आना अच्छी बात है तभी कुछ शक्तियों(कर्तव्यों) का भान होगा। जब शक्ति का भान होता है तो सरदार पटेल की तरह पुरे भारत को एक करने का जज्बा पैदा होता है। अरे, सरदार पटेल से नहीं सीखना चाहते तो अंग्रेजों से तो कुछ सीख लो , वो तो तुम्हारे निकट….. हैं।
हम तो तुम्हें कब से पुकार रहे हैं पर तुम अपने लिए मूर्तियाँ बनाने में,बंगले की सजावट में, पुलों के नामकरण में, उद्घाटनो में ,व्यस्त हो ,बस जनता की नहीं सुन रहे हो, आख़िर कब सुनोगे ?
Thursday, July 9, 2009
एक एम.एल.ए. की तमन्ना
"कई बार विधायक बन गया ,थोड़ा-बहुत पढ़ा-लिखा भी हूँ,(न भी होता तो क्या) पर हाईकमान की नजर अभी तक मुझ पर नहीं पड़ी,समर्थकों द्वारा लौबीयिंग करना; मुझे आता नहीं ,तो कैसे मंत्री बनूँ"। ये समस्या कई विधायकों की है। उनके लिए नीचे एक तुक्का लिख रहा हूँ ,कागज पर उतार कर हाईकमान के पास भेज देना, "तुक्का कामयाब हो गया तो तीर; नहीं तो देना चीर"। आजमाने में क्या जा रहा है। अपने काम की पंक्तियाँ ही लिखना।
मैं भी अगर मंत्री होता,मेरे हर दरवाजे पर संतरी होता ।
दस-पॉँच बॉडीगार्ड होते,कई चमचे मेरे पास होते।
हर कोई मेरी जयकार करता,समारोहों में स्वागत-सत्कार करता।
मैं भी अगर……..
मंत्री बनने तक तो आम रहता ,बन कर सरकार हो जाता ।
पुराना बंगला-सजावट,कार इत्यादि सब बेकार हो जाता।
सरकारी कार तो होती ही ,वैसे भी कई कारें ले आता ।
मैं भी अगर……..
कई पुश्तों को धनवान हो जाता,बेशक धर्म-ईमान खो जाता।
घरेलू खाना-रहना किसे भाता,फाईव स्टार होटल ही में खाता; और पीता।
शरीर रोगी होता, तो होता ,विदेशी अस्पताल में तभी जा पाता।
मैं भी अगर……..
कई विश्वविद्यालयों से डॉक्टर की मानद उपाधि पा जाता,
क्योंकि चमचों के द्वारा लेखक;साहित्यकार,और कवि भी बन जाता ,
चमचों के ही कर-कमलों से समरोहों में अपना सम्मान करवाता।
मैं भी अगर……..
पॉँच वर्ष में चुनाव है आ जाता ,लोकतंत्र में ठगने का मूलमंत्र मैं भी पा जाता।
पत्नी,बच्चों व सम्बन्धियों को चुनाव लड़वाता,
जनता के भोलेपन से अधिकाधिक समर्थकों को येन-केन जितवाता ।
इस लोकतान्त्रिक दौर में ,बहुमत; क्या पता मेरे साथ हो जाता ,
तो, चाहे जैसा भी था खोटा या खरा मैं भी सी.एम. बन जाता ।
मैं भी अगर…….. .
मैं भी अगर मंत्री होता,मेरे हर दरवाजे पर संतरी होता ।
दस-पॉँच बॉडीगार्ड होते,कई चमचे मेरे पास होते।
हर कोई मेरी जयकार करता,समारोहों में स्वागत-सत्कार करता।
मैं भी अगर……..
मंत्री बनने तक तो आम रहता ,बन कर सरकार हो जाता ।
पुराना बंगला-सजावट,कार इत्यादि सब बेकार हो जाता।
सरकारी कार तो होती ही ,वैसे भी कई कारें ले आता ।
मैं भी अगर……..
कई पुश्तों को धनवान हो जाता,बेशक धर्म-ईमान खो जाता।
घरेलू खाना-रहना किसे भाता,फाईव स्टार होटल ही में खाता; और पीता।
शरीर रोगी होता, तो होता ,विदेशी अस्पताल में तभी जा पाता।
मैं भी अगर……..
कई विश्वविद्यालयों से डॉक्टर की मानद उपाधि पा जाता,
क्योंकि चमचों के द्वारा लेखक;साहित्यकार,और कवि भी बन जाता ,
चमचों के ही कर-कमलों से समरोहों में अपना सम्मान करवाता।
मैं भी अगर……..
पॉँच वर्ष में चुनाव है आ जाता ,लोकतंत्र में ठगने का मूलमंत्र मैं भी पा जाता।
पत्नी,बच्चों व सम्बन्धियों को चुनाव लड़वाता,
जनता के भोलेपन से अधिकाधिक समर्थकों को येन-केन जितवाता ।
इस लोकतान्त्रिक दौर में ,बहुमत; क्या पता मेरे साथ हो जाता ,
तो, चाहे जैसा भी था खोटा या खरा मैं भी सी.एम. बन जाता ।
मैं भी अगर…….. .
Wednesday, July 8, 2009
“फर्जी मुठभेड़”
"सच क्या है" ये या तो पुलिस वाले जानते हैं या मरने वाला ।
बाकियों को पता लगना मुश्किल है,क्योंकि “ये हिंदुस्तान है”।
अगर पता लग भी गया तो भी क्या होगा , क्या आज तक कुछ हुआ ?
कुछ दिन की कैद वो भी कई साल मुकदमा लड़ने के बाद ।
दरअसल, जो कांटे कई तरह से आज हमें चुभ रहे हैं, वो
कभी हमारे पूर्वजों ने ही बोए हैं ,(बोए तो अंग्रेजों ने हैं पर खाद- पानी हमारे पूर्वज देते आए हैं जो इन्हें काट भी सकते थे) अब सूख कर इतने पक्के हो गए हैं कि जब चुभते हैं तो ,लहूलुहान कर जाते हैं ।
कहते हैं “बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए”
ऐसा ही बबूल का पेड़ हमारी कानून व्यस्था के रूप में अंग्रेजों ने बोया था,पुलिस प्रणाली उसी बबूल के पेड़ की शाखा है।
जब “ये” पेड़ लगाया था तब “वैसे अपराधी” कम होते थे । अंग्रेजो के “विरोधियों-क्रांतिकारियों” को ही अपराधी माना जाता था उन्हें जेलों में सड़ाने को या फर्जी मुठभेड़ में मारने को ये कानून बनाया था ।
इस कानून की एक विशेषता ये थी कि इनके अपने लोगों से यदि कोई अपराध हो जाता था तो ये ,उसकी जमानत कर के उसका बचाव कर लेते थे या दिखावे के लिए उसे जेल में बंद करके पूरी सुविधा का ध्यान रखते थे ,हमारे बहुत से तत्कालीन (१९४७से पहले के) नेताओं ने इसी सुविधा का लाभ उठाते हुए जेल यात्रा का रिकार्ड बनाया है। और दूसरी तरफ़ क्रांतिकारियों ने हजारों की संख्या में अंग्रेजों की गोलियां खायी हैं और गुमनाम मर गए।
जब भारत आजाद हुआ तो ये कानून बदलने चाहिए थे ,पर हमारे नेताओं ने इसे अपनी सुविधा के लिए "जस का तस" रहने दिया और हमारे आम आदमियों(पूर्वजों ने) उन्हें भरपूर समर्थन दिया , आज भी उनके "अंध भक्त" उनकी बुराई सुनने को तैयार नहीं (तोड़-फोड़ कर देते हैं)।
और( दिखावे के लिए) फर्जी मुठभेड़ के विरोध में धरना-प्रदर्शन करते हैं।
क्या अपने पूर्वजों की गलती को सुधारने के लिए हम कभी धरना प्रदर्शन करेंगे ?
मेरी ये बात भारत के किसी भी स्थान पर हुयी फर्जी मुठभेड़ के लिए लिखी गई है।
जब मुठभेड़ हो जाती है तब सब चिल्लाते हैं "पर उस कांटेदार पेड़ को उखाड़ने की पहल कोई नहीं कर रहा है"।
बाकियों को पता लगना मुश्किल है,क्योंकि “ये हिंदुस्तान है”।
अगर पता लग भी गया तो भी क्या होगा , क्या आज तक कुछ हुआ ?
कुछ दिन की कैद वो भी कई साल मुकदमा लड़ने के बाद ।
दरअसल, जो कांटे कई तरह से आज हमें चुभ रहे हैं, वो
कभी हमारे पूर्वजों ने ही बोए हैं ,(बोए तो अंग्रेजों ने हैं पर खाद- पानी हमारे पूर्वज देते आए हैं जो इन्हें काट भी सकते थे) अब सूख कर इतने पक्के हो गए हैं कि जब चुभते हैं तो ,लहूलुहान कर जाते हैं ।
कहते हैं “बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए”
ऐसा ही बबूल का पेड़ हमारी कानून व्यस्था के रूप में अंग्रेजों ने बोया था,पुलिस प्रणाली उसी बबूल के पेड़ की शाखा है।
जब “ये” पेड़ लगाया था तब “वैसे अपराधी” कम होते थे । अंग्रेजो के “विरोधियों-क्रांतिकारियों” को ही अपराधी माना जाता था उन्हें जेलों में सड़ाने को या फर्जी मुठभेड़ में मारने को ये कानून बनाया था ।
इस कानून की एक विशेषता ये थी कि इनके अपने लोगों से यदि कोई अपराध हो जाता था तो ये ,उसकी जमानत कर के उसका बचाव कर लेते थे या दिखावे के लिए उसे जेल में बंद करके पूरी सुविधा का ध्यान रखते थे ,हमारे बहुत से तत्कालीन (१९४७से पहले के) नेताओं ने इसी सुविधा का लाभ उठाते हुए जेल यात्रा का रिकार्ड बनाया है। और दूसरी तरफ़ क्रांतिकारियों ने हजारों की संख्या में अंग्रेजों की गोलियां खायी हैं और गुमनाम मर गए।
जब भारत आजाद हुआ तो ये कानून बदलने चाहिए थे ,पर हमारे नेताओं ने इसे अपनी सुविधा के लिए "जस का तस" रहने दिया और हमारे आम आदमियों(पूर्वजों ने) उन्हें भरपूर समर्थन दिया , आज भी उनके "अंध भक्त" उनकी बुराई सुनने को तैयार नहीं (तोड़-फोड़ कर देते हैं)।
और( दिखावे के लिए) फर्जी मुठभेड़ के विरोध में धरना-प्रदर्शन करते हैं।
क्या अपने पूर्वजों की गलती को सुधारने के लिए हम कभी धरना प्रदर्शन करेंगे ?
मेरी ये बात भारत के किसी भी स्थान पर हुयी फर्जी मुठभेड़ के लिए लिखी गई है।
जब मुठभेड़ हो जाती है तब सब चिल्लाते हैं "पर उस कांटेदार पेड़ को उखाड़ने की पहल कोई नहीं कर रहा है"।
Tuesday, July 7, 2009
गुरु पूर्णिमा
आज गुरु पूर्णिमा है,माता-पिता,गुरु-देवता को चरणस्पर्शी प्रणाम।
हम अपनी पुरानी और स्वस्थ-सार्थक परम्पराओं को भूल गए ,और निरर्थक प्रचलनों के नाम पर अपनी सभ्यता-संस्कृती को कोसने लगे
बिना कुछ जाने, विदेशी या पश्चिमी परम्पराओं का अनुकरण करने लगे। हो सकता है कि विदेशी परम्पराओं में भी कुछ अच्छी हों ,फ़िर भी
“अपने घर का खाना छोड़ कर हमेशा दूसरों के घर खाने जाना”
अपना स्वाभिमान ही कम करता है, या "रोजाना होटल में खाना "आदमी को बीमार बना देता है। अपने यहाँ की अच्छी परम्पराओं को नहीं भुलाना चाहिए।
आज कल गुरुओं की भरमार है,हर जगह गुरु,बाबा,स्वामी,महाराज,संत-शंकराचार्य मिल जायेंगे,पर सब मूर्ख बनाने में लगे हुए हैं। कुछ तो प्रत्यक्ष रूप से ठग रहे हैं कुछ परोक्ष रूप से ,हर कोई ,”पर उपदेश कुशल बहुतेरे”की तर्ज पर
दुनिया-समाज को मूर्ख बनाने में लगा है । कहने के लिए सभी समाज का भला करने में लगे हैं , पर फ़िर भी समाज पतनशील होता जा रहा था । आज हिंदुस्तान सबसे आगे है भ्रष्टाचार में,रिश्वतखोरी में,
चरित्रहीनता में, अकर्मंयता में ,अपराध में ,चोरी और सीनाजोरी में । पर, कभी यही भारत,विश्व गुरु होता था सत्यनिष्ठा में,इमानदारी में,चारित्रिक मूल्यों में, अब, जब से “स्वामी रामदेव” का अवतरण हुआ है
बदलाव आरम्भ हो गया है,गुरु,महाराज,स्वामी,बाबा,संत-शंकराचार्यों की परिभाषा भी बदलने लगी है,फ़िर भी “एक के तीन” बनाने वाले या हाथ से सोना और राख निकलने वाले बाबा पैदा हो जा रहे हैं,क्योंकि जब तक मूर्ख बनने वाले होंगे तो बनाने वाले पैदा होते रहेंगे ,होते रहे हैं। खैर ...... ।
अब बहुत समय बाद भारत को बाबा रामदेव जैसा व्यक्तित्व मिला है,जिस पर कुछ उम्मीद बनती दिख रही है।
आज गुरु पूर्णिमा पर हम बाबा रामदेव को कोटि-कोटि चरणवंदन करते हैं।
हम अपनी पुरानी और स्वस्थ-सार्थक परम्पराओं को भूल गए ,और निरर्थक प्रचलनों के नाम पर अपनी सभ्यता-संस्कृती को कोसने लगे
बिना कुछ जाने, विदेशी या पश्चिमी परम्पराओं का अनुकरण करने लगे। हो सकता है कि विदेशी परम्पराओं में भी कुछ अच्छी हों ,फ़िर भी
“अपने घर का खाना छोड़ कर हमेशा दूसरों के घर खाने जाना”
अपना स्वाभिमान ही कम करता है, या "रोजाना होटल में खाना "आदमी को बीमार बना देता है। अपने यहाँ की अच्छी परम्पराओं को नहीं भुलाना चाहिए।
आज कल गुरुओं की भरमार है,हर जगह गुरु,बाबा,स्वामी,महाराज,संत-शंकराचार्य मिल जायेंगे,पर सब मूर्ख बनाने में लगे हुए हैं। कुछ तो प्रत्यक्ष रूप से ठग रहे हैं कुछ परोक्ष रूप से ,हर कोई ,”पर उपदेश कुशल बहुतेरे”की तर्ज पर
दुनिया-समाज को मूर्ख बनाने में लगा है । कहने के लिए सभी समाज का भला करने में लगे हैं , पर फ़िर भी समाज पतनशील होता जा रहा था । आज हिंदुस्तान सबसे आगे है भ्रष्टाचार में,रिश्वतखोरी में,
चरित्रहीनता में, अकर्मंयता में ,अपराध में ,चोरी और सीनाजोरी में । पर, कभी यही भारत,विश्व गुरु होता था सत्यनिष्ठा में,इमानदारी में,चारित्रिक मूल्यों में, अब, जब से “स्वामी रामदेव” का अवतरण हुआ है
बदलाव आरम्भ हो गया है,गुरु,महाराज,स्वामी,बाबा,संत-शंकराचार्यों की परिभाषा भी बदलने लगी है,फ़िर भी “एक के तीन” बनाने वाले या हाथ से सोना और राख निकलने वाले बाबा पैदा हो जा रहे हैं,क्योंकि जब तक मूर्ख बनने वाले होंगे तो बनाने वाले पैदा होते रहेंगे ,होते रहे हैं। खैर ...... ।
अब बहुत समय बाद भारत को बाबा रामदेव जैसा व्यक्तित्व मिला है,जिस पर कुछ उम्मीद बनती दिख रही है।
आज गुरु पूर्णिमा पर हम बाबा रामदेव को कोटि-कोटि चरणवंदन करते हैं।
Monday, July 6, 2009
हो जाओ तैयार
आख़िर जब इंग्लैंड में हो सकता है तो यहाँ क्यों नहीं ,अंग्रेज हम पर दो सौ साल राज कर के गए हैं। अपने विचार ही नहीं
जींश तक (कुछ लोगों में) छोड़ कर गए हैं । वो सब इकट्ठे होकर तुम्हारा साथ देंगे ।
ये लो भई प्रगतिशील बुद्धिजीवियो(बौद्धिक नक्सलवादियो),
तुम्हारे अनुकरण के लिए पश्चिम से एक और अनुकरणीय
कर्म की ख़बर आ गई है। देख लो(फोटो में ) और तैयारी शुरू कर
दो। हाँ, शुरुआत अपने घर-परिवार से करना,न्यूज चैनल वाले
-वालियां अपने को थोड़ा सा, "और" आधुनिक सोच वाला बना लो,पर
अनुकरण करने से पहले अपने विज्ञापन दाताओं से जरुर पूछ लेना।
तुम्हारे अनुकरण के लिए पश्चिम से एक और अनुकरणीय
कर्म की ख़बर आ गई है। देख लो(फोटो में ) और तैयारी शुरू कर
दो। हाँ, शुरुआत अपने घर-परिवार से करना,न्यूज चैनल वाले
-वालियां अपने को थोड़ा सा, "और" आधुनिक सोच वाला बना लो,पर
अनुकरण करने से पहले अपने विज्ञापन दाताओं से जरुर पूछ लेना।
शुरू में थोड़ी दिक्कत आएगी ,क्योंकि पूरे कपड़े पहने हुओं की भीड़ में
अभी तक कम, कपड़े वालियां ही ठीक से सहज नहीं हो पाई ,(इसीलिए तो
सबको कम कपड़े पहनने की प्रेरणा देती हैं जिससे वह अलग न लगें),
ये तो एकदम नग्न हो जाने की बात है,कोई कैसे मानेगा। क्योंकि ये
चाहेंगी सब नग्न हों जिससे ये अलग न दिखें। और ज्यादा दिक्कत
आई तो कानून है ना ,उसमे कुछ न कुछ ऐसा होगा जो तुम्हारे
हित में होगा ।
अभी तक कम, कपड़े वालियां ही ठीक से सहज नहीं हो पाई ,(इसीलिए तो
सबको कम कपड़े पहनने की प्रेरणा देती हैं जिससे वह अलग न लगें),
ये तो एकदम नग्न हो जाने की बात है,कोई कैसे मानेगा। क्योंकि ये
चाहेंगी सब नग्न हों जिससे ये अलग न दिखें। और ज्यादा दिक्कत
आई तो कानून है ना ,उसमे कुछ न कुछ ऐसा होगा जो तुम्हारे
हित में होगा ।
आख़िर जब इंग्लैंड में हो सकता है, तो यहाँ क्यों नहीं ?
अंग्रेज हम पर दो सौ साल राज कर के गए हैं। अपने विचार ही नहीं
जींश तक (कुछ लोगों में) छोड़ कर गए हैं । वो सब इकट्ठे होकर
तुम्हारा साथ देंगे । और कोई दे न दे, टी.वी.और फिल्मों वाले तो हैं ही
कुछ प्रोफेसर,कुछ समाजशास्त्री,कुछ लेखक-पेंटर-कलाकार व
मानवाधिकारवादी सामाजिक कार्यकर्त्ता,एन.जी.ओ.आदि ,मतलब हर जगह
तुम्हें अपने सहायक मिल जायेंगे । इसलिए हो जाओ तैयार।
अंग्रेज हम पर दो सौ साल राज कर के गए हैं। अपने विचार ही नहीं
जींश तक (कुछ लोगों में) छोड़ कर गए हैं । वो सब इकट्ठे होकर
तुम्हारा साथ देंगे । और कोई दे न दे, टी.वी.और फिल्मों वाले तो हैं ही
कुछ प्रोफेसर,कुछ समाजशास्त्री,कुछ लेखक-पेंटर-कलाकार व
मानवाधिकारवादी सामाजिक कार्यकर्त्ता,एन.जी.ओ.आदि ,मतलब हर जगह
तुम्हें अपने सहायक मिल जायेंगे । इसलिए हो जाओ तैयार।
Sunday, July 5, 2009
शाबाश समलैंगिको
शाबाश समलैंगिको-शाबाश,(शाबाशी इसलिए कि तुमने बेशर्मी की हद पार कर ली ) अपने समर्थकों,प्रगतिवादियों,खुली सोच वालों,आधुनिक विचार वालों को भी मेरी तरफ़ से बधाई दे देना ।तुमसे बड़ा काम तो उन्होंने किया है, जिस व्यवहार को समाज,प्रकृति और सदाचरण के विरुद्ध माना जाता है,जिसे मानसिक रोग माना
जाता है, उन्होंने उसको सही ठहराने का साहस दिखाया है।
अंग्रेजों के बनाये जिन कानूनों को स्वतंत्र भारत के बड़े-बड़े नेता नहीं बदल पाए ,इन आधुनिक बुद्धिमानों ने उस १५० साल पुराने कानून को बदलवा दिया।बौद्धिक और चारित्रिक नक्सलवाद का उदहारण पेश किया है इन्होने। धन्य है इनको, कि इन्होने कितनी बारीकी से कानून का अध्ययन किया होगा जो इनको ये धारा नजर आई ,वरना बहुत से ऐसे कानून हवा में तैर रहे है,जिन्हें आम आदमी तक देख लेता है और देख कर या तो हँसता है या माथा पीटता। (उनके लिए ये मानवाधिकारवादी कभी नही बोले) धन्य है इनको, जो, इन्होने एक रोग को सामान्य व्यवहार सिद्ध कर दिखाया । अब शायद समाज में किसी को “ठरकी”कह कर अपमानित नही किया जाएगा । वैसे भी ये प्रगतिवादी समाज के डर से कब चुप बैठने वाले ,ये तो चाहते ही हैं कि समाज का डर आम जन में से निकल जाए ,सभी निर्लज्ज होंगे तो इनके लिए आसानी होगी ,भारत को यूरोप-अमेरिका बनाने में,और इनका इस दिशा में ये प्रयास सफल हुआ,बड़ी खुशी(इनके लिए) की बात है। इनके इस जज्बे को सलाम ,ये बेशक कम संख्या में हैं पर हैं हर जगह टी. वी .में ,फिल्मों में,संस्कृती कर्मियों में ,पत्र -पत्रिकाओं में ,एन जी ओ तो इनके मुख्य साधन हैं सरकारी विभाग विशेषकर शिक्षा विभाग में भी ये सक्रीय रहते हैं । इनमे भी महिलाएं ज्यादा सक्रीय रहती हैं । ये महिलाएं भारत की महिलाओं को दकियानूसी के बंद माहौल से यूरोप के खुलेपन वाले माहौल में ढालना चाहती हैं,जिसमे जब मर्जी तलाक़,लिया-दिया जा सकता है,तलाक़ लेने-देने की जरुरत ही क्यों हो बिना विवाह किए साथ रहने की वकालत भी तो ये प्रगतिवादी करते हैं ,इतने विरोधों के बावजूद भी ये इतने सक्रीय रहते हैं कि इन्हें धन्य हो कहना ही पड़ता है। इनकी तारीफ़ में लिखता तो बहुत कुछ पर इतना ही बहुत है ,ज्यादा के लिए अंग्रेज गए औलाद छोड़ गए पढ़वा देना ।
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