
जो “मुखर समर्थक” हैं वो तो प्रत्यक्ष हैं ही; जो मौन समर्थक हैं वह भी अपने आस-पास इस अभियान को चर्चित कर रहे हैं, पर जो मौन विरोधी हैं वह कहीं ना कहीं इस देश के और इस अभियान के दुश्मन हैं , और वो क्या हासिल करेंगे; कुछ धन...? लेकिन भारत की सामान्य जनता का विश्वास खो देंगे।
दरअसल आजकल बाबाजी नेपाल में शिविरों में व्यस्त हैं; जिस दिन बाबा जी नेपाल पहुंचे उस दिन वहां उपस्थित मेरे एक जन-पहचान वाले व्यक्ति ने बताया कि वहां की जनता का हुजूम का हुजूम उमड़ पड़ा उनके स्वागत में, पर हमारे यहाँ के समाचार चैनल, हमारे यहाँ के समाचार पत्र इस सबसे आखें मूंदे रहे।
जो जनहित का दावा करते हैं जो अपने को देशभक्त, पर्यावरण जागरूक, जो अपने को अन्धविश्वास का विरोधी (चाहे वह इसके विरोध की आड़ में विश्वास का ही गला घोंटें) बुराईयों का विरोधी बताते हैं; किसी ने भी इस समाचार को दिखाने की नैतिकता नहीं दिखाई। अब भी बाबा जी नेपाल-भारत मैत्री संबंधों को जितना मजबूत, 'अपने शिविरों के माध्यम से कर रहे हैं' वह सराहनीय और ऐतिहासिक है। वहां के माओवादी वास्तविक आध्यात्म को समझने लगे हैं।
भारत के कम्युनिष्टों के लिए विचारणीय अवश्य है; पर चिंतनीय(चिंता का विषय) नहीं हो सकता ।
"भारत के कम्यूनिस्टो ........ हो सकता " लगता है उलटा बोल गए आप , वृंदा जी तो इसी चिंता में घुली जा रही हैं !
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