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Wednesday, February 19, 2014

उत्तराखंड की कुमांउनी बोली में मेरी दो दिन पहले लिखी ये कुछ लाईने

हमारे उत्तराखंड की कुमांउनी बोली में मेरी दो दिन पहले लिखी ये कुछ लाईने कविता जैसी बन गयी हैं 
यहाँ मेरे "टैंशन पॉइंट" ( http://tensionpoint.blogspot.in/ ) पर काफी लोकप्रिय हो रही हैं लोग मुझसे इसकी फोटो स्टेट कापियां भी मांग कर ले जा रहे हैं। 
आजकल के पंचायती चुनावी माहौल पर लिखी ये लाइनें एक दम सटीक टिपण्णी कर रहीं हैं चुनाव लड़ने वालों पर !
सुना है किसी ने इन्हें फेसबुक https://www.facebook.com/sfulara पर भी फोटो खींच कर डाल दिया 

Monday, September 2, 2013

अब चाहे बापू निर्दोष निकले या दोषी । मुख्य मकसद था संतों पर लोगों को भ्रम हो जाये ।

आसाराम बापू जी का सच तो जो भी होगा ! साल दो साल या हो सकता है दस साल भी लग जाएँ पता लगने में ! हो सकता है पता लगे ही ना ! क्योंकि न्याय और कानून व्यवस्था अपराधियों को बचाने और निरपराधियों को फंसाने के लिए ही है हिन्दुस्तान में । बहुत से केस हैं ऐसे; जिनका पिछले पचास सालों से सच झूठ का पता नहीं चला । 30-30, 35-35 सालों से जेलों में बंद ऐसे लोग बाहर निकले हैं जिन्हें अपने अपराध का पता ही नहीं था अन्दर न जाने कितने मर गए होंगे । वर्तमान में भी साध्वी प्रज्ञा व और भी हैं ।
लेकिन आसाराम बापू के केस में मीडिया ने अपना काम कर दिया है अब आप चिल्लाते रहो । 

मीडिया ने जो सिद्ध करना था वो कर दिया !बखूबी कर दिया !

अब चाहे बापू निर्दोष निकले या दोषी ।
मुख्य मकसद था संतों पर लोगों को भ्रम हो जाये ।
अब ये विश्लेषण करने की बात है कि ये उसमे कितना सफल हुए । लेकिन इनके द्वारा इस तरह बिना कोई अपराध साबित किये अपने शब्दों के चातुर्य से किसी को दोषी बना के पेश करना आने वाले समय में इनके लिए घातक होने वाला है ।
ये नहीं जानते कि भारत में इस तरह से कभी भी अपने धर्म अध्यात्म और अध्यात्मिक गुरु सत्ता के विरुद्ध अविश्वास नहीं फैला है ।
यहाँ तो खुले आम व्यभिचार करने वाले को भी महात्मा(श्रेष्ठ) का दर्ज दे दिया जाता है और उसके भी अंध भक्त करोड़ों में होते हैं । उसे पिता और चाचा घोषित कर दिया जाता है । 

ये सब किसलिए हो रहा है ??? 

क्योंकि जब जब धर्म पर देश पर संकट आता है तब तब उसे बचाने को कोई न कोई ऋषि संत आता है और सफल होता है । आज भी भारत पर विदेशियों का वर्चश्व है वो नहीं चाहते यहाँ पर कोई भी संत सुधारों की बात करे । लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से स्वामी रामदेव ने लगभग पुरे भारत को जगा दिया है उसके लिए उन लोगों को कोई आसान सा लक्ष्य चाहिए था ; "सॉफ्ट टारगेट" और वो उसकी तलाश में निरंतर रहते हैं जैसे ही कहीं भी मौका मिला अपना दांव चल दिया । 
कभी का इतिहास उठा कर देख लो जब भी भारत-भारतीयता पर संकट आया है कोई न कोई ऋषि इसे बचाने आया है । और इस समय ऋषि और संत ही इसे बचाने को सक्रीय होने लगे हैं । 
उनके हथियार हैं भारत का मीडिया,भारत की सेकुलर पार्टियाँ,भारत के सेकुलर बुद्दिजीवी, भारत के मूर्ख और भावुक लोग, लालची लोग आदि आदि कमी नहीं है ।

Saturday, August 31, 2013

नाश पिट्टे इस ऐतिहासिक पार्टी को इतिहास की पार्टी बना के ही छोड़ेंगे ! ए ओ ह्युम की आत्मा भूत बनके चिपटेगी |

कांग्रेस इतिहास बनने जा रही है ! अगर आप को अकल जाए तो !!!

और अगर आप को भी अकल न आई तो आप के साथ साथ देश भी भुगतेगा; भुगत रहा है । 

कांग्रेस एक ऐतिहासिक पार्टी है ! कितनी मेहनत और साजिश से तत्कालीन नेताओं और जनता की आँखों और बुद्धि पर पर्दा डाल कर इसे ब्रिटिश अधिकारी ए ओ ह्युम ने बनाया था ! ये आज के टटपूंजिए नेता क्या जानें ।   कितनी कुर्बानियां इसे बनाने को, और कितनी इसे बनाये रखने को, लेनी पड़ी ये कल के छोकरे(युवा बने फिरते हैं ) क्या जानें ! जब जब इसपर संकट आया, कैसे कैसे हथकंडे अपनाने पड़े; वो भी अपने वोटरों(समर्थक और विरोधी दोनों ही) से छुप छुपा कर, इन्हें क्या पता ! इन्हें तो बस पकी पकाई मिल गयी, उसी के बल पर आज तक खा रहे हैं; अब वो भी नहीं पच रहा, उलटे सीधे बिल लाकर अपनी पोल खोल रहे हैं ।
अब भला बताओ जिस "कांग्रेस" को बनाने में ए ओ ह्युम द्वारा "राजा राम मोहन राय" के "ब्रह्म समाज"की पूरी क़ुरबानी ली गयी, और उन्हें खुद को तो बिलकुल गुमनाम ही कर दिया (ताकि कांग्रेस जैसा कोई अन्य संगठन न हो, चाहे सामाजिक ही क्यों न हो) पर लोगों को कुछ भी अंदेशा नहीं हुआ वही कांग्रेस आज "आप" को खड़ा कर के अपने को बचाने की "छोटी सी बात" को भी छुपा नहीं पायी।  
और इनके बाप ए ओ ह्युम ने इस कांग्रेस के उद्देश्यों का तक पता नहीं चलने दिया इसके जन्म पर । इसके निर्माताओं नेताओं ने सन 47 में जो समझौते किये अंग्रेजों से; कितने लोगों को पता लगे ? बहुत कम गिने चुने लोगों को पता लगा कि अंग्रेजो से "ट्रांसफर ऑफ पॉवर एग्रीमेंट" नामक समझौता हुआ था । और आज ये छोटा सा ऍफ़ डी आई वाला मुद्दा भी नहीं संभाल पाए । लोगों को पता लग गया कि रूपये को उसी ऍफ़ डी आई के लिए गिराया गया है ।
इसके 127 साल के इतिहास में इसको बनाये रखने के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ा ! कितने अपने ही नेता; लाला लाजपत राय से लेकर ………तक, मरवाने पड़े |  कितने देशभक्त क्रान्तिकारी मरवाने पड़े, या उन्हें देश विरोधी, आतंकवादी-उग्रवादी कहना पड़ा । गद्दारों को देश भक्त और देशभक्तों को गद्दार सिद्ध करना पड़ा । स्कूलों तक में ऐसी शिक्षा लागु की; कि आज भी "सेकुलर नस्ल" उनके गुण गाते नहीं थकती । 
जानते सब हैं ! पर इनके बारे में कोई भी आधिकारिक तौर पर कुछ भी नहीं कह सकता; ये इनकी काबिलियत का प्रमाण नहीं है क्या ?
आज तुम दो चार सौ लाख करोड़ के घोटाले नहीं छुपा पा रहे ! धिक्कार है तुम्हें ! अरे ! अपने पितृ पुरुष (चाचा) को तो याद कर लेते (उन्हें तो बच्चों के याद करने को छोड़ा है), जिन्होंने नेताजी बोस के साथ साथ सन 47 में उनका पूरा खजाना और रजवाड़ों से आया खजाना भी ऐसे गायब कर दिया कि उसकी भनक भी अब 67 सालों बाद सुनाई दे रही है । 
कितनी काबिलियत रही होगी तुम्हारे पित्तरों में ! जरा सोचो ! देश के दो टुकड़े करवा दिए पर अपना स्वार्थ नहीं छोड़ा ! विश्व में महान बनने के लिए कितने क्षमा शील रहे ; दुश्मन के क्षेत्र पर कब्ज़ा करके भी उसे वापस दे दिया, उसका कर्जा खुद भरने को तैयार रहे, दुश्मन की 90 हजार फ़ौज को घुटने पर बैठने को मजबूर कर दिया हमारी फौजों ने, फिर भी तुम्हारे नेता ने वो देश स्वतंत्र कर दिया । वाह रे दरियादिली ! अब ये अलग बात है; आज वो हमें बार बार लतियाता है । 
कहने का मतलब ये है ! अपने महान अय्याश नेताओं का कुछ तो अनुसरण करते । तुम तो अपने अपने रिश्तेदारों की कारगुजारियों को भी नहीं छुपा पा रहे ! जबकि अपने पितृ पुरुषों के रिश्तेदारों को देखो कितनी काबिलियत से उन्हें अय्याशी करवाई और फिर नेता बना कर देश में महान भी सिद्ध किया और कई तो आज तक राज्यों के मुख्य मंत्री-मंत्री भी बने हुए हैं ।  तुम एक दामाद के कारनामे नहीं छुपा पाए ! बड़ा आश्चर्य है । 

अपनी कमियों को पहचानो ! सारे के सारे तलुवे चाटू रखे हुए हैं; जो आँख बंद कर बस अंध भक्ति में ही लगे रहते हैं । कुछ तो दिमाग वाले चमचे होने चाहिए ! तुम्हारे नेताओं ने भी पाले हैं चमचे, पर पूरे खानदानी थे आज तक भी बुद्दिजीवियों में माने जाते हैं ।  दिमाग से अपने पुराने नेताओं की चोरियों अय्याशियों को सही सिद्ध करते रहते हैं । कोई गांधीवाद के गुण गान करता है कोई नेहरूवाद के; लेकिन पूरे दिमाग से । 
और तुमने पाले हुए हैं दिग्गी,पिग्गी,सिंघी,कप्पी जैसे जो आँख बंद कर ऐसी बातें बोल जाते हैं कि सारी पोल खोल जाते हैं । यही हाल युवाओं का है न जाने कौन से देश में पढने भेजा था इन्हें जहाँ ये ये भी नहीं सीख पाए कि कैसे सफाई से अपने नेताओं की चमचा गिरी की जाती है । 
अब तो भगवान (इनकी महारानी ! अरे भई इंग्लैण्ड वाली) ही बचाए ऐसे चाटुकारों से । रोम वाली महारनी तो फेल हो गयी ।       

Saturday, August 24, 2013

उनके इस कार्य में कांग्रेस पिछले एक सौ सत्ताईस वर्षों से कार्यरत है ।

दोस्तो ! इन लाईनों पर जरा चिंतन करना ..... ये कोई अध्यात्मिक उपदेशों की लाईनें नहीं हैं ; 
"जो दीखता है वो होता नहीं ! (या छोटा सच होता है मन बहलाने को ! )
जो वास्तव में होता है वो दीखता नहीं" ॥ (बड़ा सच, छुपा सच, उसे सब मानते नहीं ) | 
भाई राजीव दीक्षित और 
स्वामी रामदेव जी की बातो 
से मुझे जो समझ में आया है ; 
कि भारत समेत पूरे विकासशील देशों पर ईसाइयत का कब्ज़ा हो चूका है जिसे ये मुसलमानों की कट्टरता और मूर्खता से हर देश के मूल निवासियों के साथ लड़वा कर कायम रखने के प्रयास में हैं । जितनी भी वैशिवक संस्थाएं हैं इनके प्रमुख ईसाई और उन्हीं पश्चिमी देशों के हैं जो विश्व को अपना गुलाम बनाये रखना चाहते हैं विश्व बैंक,विश्व स्वास्थ्य संगठन,विश्व व्यापर संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष,यु एन ओ ....... आदि आदि ; इनके इस कार्य में सहयोग कर रहीं हैं । 
जो भी देश या उसका कोई नेता (चाहे चुना हुआ हो या अपने प्रयासों से बना हो) इनका विरोध करेगा या इनकी नहीं मानेगा तो उसका हस्र इराक,मिस्र,लीबिया,रूस और भी जाने कितने ऐसे देश होंगे जिन्हें इन्होने बर्बाद कर दिया । 
वर्ना जो राष्ट्राध्यक्ष अपने यहाँ चालीस चालीस साल से शासन कर रहा है और लोकप्रिय है वो अचानक पूरे देश के लिए दुश्मन बन जाये ! आश्चर्य होता है । 
*हमें ये गलत फहमी है कि हम वोट देकर अपने देश का नेता चुनते हैं ! ये केवल दिखाई देने वाली "प्रणाली" है देश का नेता उपरोक्त शक्तियां ही तय करती हैं जो नहीं दिखाई देने वाला सच होता है । 
विशेषकर जब कांग्रेस का बहुमत होता है । 

जैसे; "15 अगस्त को देश आजाद हुआ" ! केवल दिखावे वाला सच था, जबकि वास्तविकता में देश को और ज्यादा विदेशी गुलामी में शर्तों के साथ बाँध दिया गया ।
जैसे; "देश में न्याय व्यवस्था और कानून सबके लिए सामान है", जबकि वास्तविकता में ये सब ढकोसला विदेशियों के ज़माने से लागु है उन्होंने अपने लोगों को बचाने और आम जनता को गफलत में रखने को ऐसी न्याय प्रणाली बनायीं जिससे लोगों को लगे कानून अपना काम रहा है और उनके अपने अत्याचारी अधिकारी और मित्र मजे में अपना जीवन जीते रहें ।
*सबकुछ वही है जो जो सन सैंतालिस से पहले था ! नेताजी सुभास चन्द्र बोस का सच भी अभी सामने नहीं आया ! प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री की म्रत्यु का सच ! और भी कई देशभक्त नेताओं और क्रांतिकारियों की मृत्यू का सच क्या है कोई नहीं जानता । 

अब जरुरत है ! इस साजिश को आपस में लड़ने वाले हिन्दू मुसलमानों को समझने की और उन तथाकथित नेताओं को पह्चानने की जो या तो उन शक्तियों के किसी न किसी दबाव में हैं या केवल अपने मुर्खता पूर्ण स्वार्थ वश एक दुसरे का भला करने का झांसा देकर सभी देश भक्तों को बांट कर रखते हैं । 

मुसलमानों को ये सोचना होगा कि जिन भलाई के मुद्दों को ये शुरू से उठा रहे हैं वो आज तक भी क्यों जस के तस बने हुए हैं । और हिन्दुओं को ये सोचना होगा कि कुछ मूर्ख और ईसाईयों की साजिश में फंसे मुस्लिमों की वजह से सारा मुस्लिम समाज गलत नहीं है । 
उन विदेशियों की साजिश को प्रत्येक देश में वहां का समाचार जगत और वहां की मुख्य राजनितिक पार्टी अन्दरखाने पूरा समर्थन करते हैं जैसे हमारे भारत में कांग्रेस और उसकी पिछलग्गू मीडिया, ये इस साजिश को थोडा सा भी लीक नहीं होने देते । केवल जनता का ध्यान भटके या निरर्थक विषयों पर उलझा रहे ऐसे समाचार दिखा दिए जाते हैं न मिलें तो बना दिए जाते हैं । उन समाचारों को प्रथमिकता दी जाती है जिससे राष्ट्रीयता की भावना का मखौल उड़े; धर्म अध्यात्म संस्कृतिक विरासत पर लोगों का विश्वास कम हो और वो अपना राज कायम रख सकें ।
उनके इस कार्य में कांग्रेस पिछले एक सौ सत्ताईस वर्षों से कार्यरत है ।

Friday, March 1, 2013

कृषी के बिना कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो किसी को आधी रोटी भी उपलब्ध करा दे ।

"बजट पर बकवास" 

सभी अपने अपने "खयाली पुलाव" पकाने में लगे हैं ! कुछ दिन के पेट भरने का इंतजाम हो जायेगा । 

इस व्यवस्था में प्रतिवर्ष के बजटों से कुछ अच्छा होना होता तो देश का ये हाल थोड़े ही होता । इसलिए व्यवस्था को बदलने वाला बजट होना चाहिए ।


व्यवस्था ऐसी है कि जो घर घर में उद्योग धंधे थे उन्हें ख़त्म करके बड़े उद्योगों का जाल बुना गया, जो गाँव-गाँव में स्कूल होते थे (जिनमे विद्वान् तैयार होते थे) उन्हें बदल कर नौकर बनाने वाले स्कूलों में बदला गया, जो व्यक्ति विद्वान् हो कर भी अपने हस्तकौशल से वस्तुओं का निर्माण करके समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था उसे कुर्सी (क्लर्क-चपरासी) का लालच देकर निट्ठल्ला बना दिया, खेती की जमीन को उद्योगों- कालोनियों, परियोजनाओं के नाम पर और किसानों को मुआवजे का लालची बना कर जमीन और किसान दोनों ही बर्बाद कर दिए .....कृषी के बिना कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो किसी को आधी रोटी भी उपलब्ध करा दे ।

कहने का मतलब सामजिक ढांचा ही गड़बड़ा दिया है ;


फिर कहते हैं महंगाई कम नहीं हो रही ! फिर चिंता करते हैं अपराध बढ़ रहे हैं ! फिर चिंता करते हैं बेरोजगारी बढ़ रही है ! फिर चिंता करते हैं रोजगार के अवसर कैसे बढ़ें ! फिर चिंता करते हैं देश बहुत बड़ा है ( कल शाम टी .वी चैनल पर एक कांग्रेसी मैडम कह रही थी 'कांग्रेस कैसे इतने बड़े देश की व्यवस्था संभालती है तुम्हें क्या पता', देश को बर्बाद करके  जैसे देश पर एहसान करते हों)।

और ये सब बर्बादी वाली व्यवस्था अंग्रेजों ने कुछ सोच-समझ कर ही बनायीं थी । उन्होंने जो हमारा सामाजिक ढांचा था उसे तहस नहस करना था । क्योंकि न यहाँ गरीबी थी, न यहाँ बेरोजगारी थी, न यहाँ निट्ठल्लापन था, हर कोई कर्मयोगी था, लेकिन सरकार पर निर्भर नहीं था | यहाँ तक कि सेना भी नाम मात्र की होती थी आम जनता में सभी सैनिक होते थे, जब देश को जरुरत पड़ती थी सब एकत्र हो जाते थे, बाकि समय अपना-अपना काम-धंधा करते थे ।
एक किसान ( जिसको जमींदारी प्रथा के नाम पर बदनाम किया गया) सबकी जरूरतों को ख़ुशी-ख़ुशी पूरा करता था । लोहा कूटने वाला लोहार, बाल काटने वाला नाई, कपडे सिलने वाला दरजी, हल जोतने वाला हलिया, लकड़ी का काम करने वाला बढ़ई, विद्यालयों में पढ़ने वाला विद्वान्, और भी जो जो कामगार होते थे, यहाँ तक कि राज व्यवस्था भी लगान के रूप में अपना हिस्सा इसी समय लेती थी, सभी फसल चक्र पूर्ण होने पर किसनों के पास पहुँचते थे अपना-अपना प्रयाप्त हिस्सा लेकर संतुष्टि से जीवन यापन करते थे । और इस सब में कहीं बेईमानी नहीं होती थी किसान दो मुट्ठी अनाज ज्यादा ही देता था, कामगार भी समय से अधिक ही काम करता था । देश सुखी सम्पन्न और खुशहाल था ।

अंग्रेजों ने जब अपना राज कायम किया तो न किसानों ने उन्हें लगान दिया न किसी और ने उनके काम किये , दरअसल उन्हें "कर प्रणाली"का अनुभव था जिसे हमारे यहाँ स्वतंत्र मानसिकता वाले लोगों ने स्वीकार नहीं किया, जिससे उन्होंने कानून बना कर लूटने का काम किया । उनको काम करने के लिए नौकर नहीं मिले, गुलाम बनने को कोई तैयार नहीं था तो उन्होंने इस सामाजिक ढांचे को ध्वस्त करने लिए ये व्यवस्था बनाई , जिसे समझ कर ही तत्कालीन स्वतंत्र मानसिकता वाले बुद्दिजीवियों ने लगातार उनके विरुद्ध आन्दोलन किये ।

पर 1947 में गद्दारी हो गयी । उसे सुधारो तब बजट की बात करो ।
चपरासी और क्लर्क कितने लोग बन सकते हैं ? वो भी सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र में । और मूल बात ये है कि कृषी के बिना कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो किसी को आधी रोटी भी उपलब्ध करा दे ।

Friday, October 19, 2012

महिला अपराधों के प्रति खाप पंचायतें नहीं ! तथाकथित आधुनिकता वाद, पाश्चात्य संस्कृति का भोगवाद, अश्लील विज्ञापन और चलचित्र को सही ठहराने वाली मानसिकता दोषी है । जबकि माहौल खाप पंचायतों और भारतीय संस्कृति के विरुद्ध बनाया जाता है ।

संसार की पहली माँ,

जाहिर है कोई महिला ही होगी। उसे ही आदि शक्ति कहा गया,"(माँ) महिला तो
शक्ति का श्रोत है”लेकिन यह भी सच है की श्रोत ,जहाँ पर होता है वहां
पर शक्ति कम होती है , लेकिन; जब कुछ अन्य शक्तियां उससे मिलती हैं तो
वह भागीरथी गंगा की तरह प्रचंड शक्ति के साथ अपना प्रदर्शन करती
है। जिसे नियंत्रित करने के लिए महादेव को अपनी जटाओं में उलझाना पड़ा
था, कहते हैं कि वरना गंगा पाताल में चली जाती।

माफ़ करना मैं महिलाओं का विरोधी नहीं हूँ, लेकिन मुझे ये समझ
नहीं आता कि “रानी लक्ष्मी बाई,चेन्नमा,रजिया सुलतान,सरोजिनी नायडू,विजय लक्ष्मी
पंडित, माता जीजा बाई,मेडम भीकाजी कामा,इंदिरा गाँधी, किरण बेदी इत्यादि को
किस सशक्तिकरण की जरुरत पड़ी थी।
हम अपने पौराणिक इतिहास को देखें तो उन
महिलाओं को आज तक जिस तरह आदर्श माना जाता है शायद आज की सशक्तिकरण

वालियों को कोई याद करना भी न चाहे। क्योंकि इनकी तथाकथित “आजाद खयाली”
को ये महिलाओं का सशक्तिकरण मानती हैं,
ये पबों में जाकर शराब पीनेको
महिलाओं की आज़ादी व अधिकार मानती हैं,लिव इन रिलेशनशिप की ये समर्थक हैं,
अल्प-वस्त्रों वाला फैशन शो इन्हें महिलाओं की आज़ादी लगता है,इन्होंने प्यार को
ऐसे परिभाषित किया की लोग माँ-बाप,भाई-बहन के प्यार को भूलने लगे हैं केवल
वैलेन्टाइन डे के दिन उछ्रंख्लता को ही प्यार मानने लगे हैं, फिल्मों में अभिनय

के नाम पर अंग-प्रदर्शन, कला के नाम पर अश्लील नृत्य ;अगर जाँच की जाए या
रिसर्च की जाए कि महिलाओं के प्रति अपराधों में कब से बढोतरी हुयी है तो शयद
पता लगेगा की जब से पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव बढ़ा है तब से ही ये अपराध
बढे हैं तब से ही पैदा होने से पहले ही बच्ची को कोख में अधिक मारा जा रहा
है । मतलब; पहले भी होता होगा लेकिन उसके बाद अधिक होने लगा।
जैसे पर्यावरण
को प्रदूषित कोई करता है हानि कोई और उठाता है,ऐसे ही ये आधुनिकाएँ भी
करती हैं। इन्हें क्या पता की घर से भागी हुयी लड़की का हस्र देख कर, उसके माता-
पिता की बदनामी देख कर दूसरे माँ-बाप लड़की पैदा करना नहीं चाहते । ये दहेज़ से
बड़ा कारण है; छेड़छाड़,गुंडागर्दी तो कानूनी मसला है।

क्या होगा आरक्षण दे कर, जब इज्जत ही न हो और इज्जत, उपरोक्त तथाकथित आधुनिक
कर्मों से तो कम से कम भारत में तो नहीं मिलेगी। केवल कानून बनाकर या आरक्षण
लागु कर समस्या का समाधान नहीं हो सकता “जन के मन” के अनुरूप माहौल बनाना
होगा। जो निन्यनाब्बे प्रतिशत हैं उनमे महिलाऐं भी हैं।
निचले स्तर पर जो आरक्षण दिया है

उसे जाकर देखो बिना पति के महिलाऐं कोई कार्य नहीं कर पा रही और पति को पॉँच साल तक
शराब पीने का अच्छा अवसर मिल जाता है । पहले शराब को बंद करवाएँ इसका सबसे अधिक
नुकशान महिलाओं को ही होता है ।
  
जो अभिनय करने में निर्वस्त्र हो सकता है उस अभिनेता/अभिनेत्री या कलाकार को पुरस्कार (गौरव), जो लेखन में नग्नता खुलेपन से लिख सकता/सकती है;उस लेखक/लेखिका को पुरस्कार, जो जितना अधिक नग्न चित्र बना सकता है; उस चित्रकार को सम्मान, जो जितना गन्दा गा सकता है उसे उतना ही अधिक सम्मान, ऐसे नर्तक-नर्तकी जो अश्लीलता से ठुमके लगा सकते हों; उन्हें सम्मान .......... और भी अन्य विधाओं में इस कलयुगी परंपरा को देखा जा सकता |
वो समाज कैसा होगा जब सभी उनकी तरह नंगे होंगे, उनकी तरह लुटेरे-हत्यारे होंगे,बलात्कारी होंगे ?
आज क्या है कि हमारी व्यवस्था ही बुराईयों को पैदा करने वाली साबित हो रही है वरना; जिस व्यवहार को हेय दृष्टि से देखा जाना चाहिए उसे समाज में सम्मानित किया जाता है। व्यवस्था इस सबको सही ठहराने के लिए कानून बना देती है । विदेशी संस्कृति के प्रभाव में सामूहिक रूप से कु संस्कृति को बढ़ावा दिया जाता है । किसी भी गलत कार्य को सही ठहराने के लिए कानून बनाने का चलन अंग्रेजों ने शुरू किया था; उसे ही लागू करने का काम आजाद होने के बाद भी यहाँ की सरकरों ने किया। व्यवस्था के रूप में नाम के लिए लोक तंत्र ( जिसमे दस विद्वान् बेकार माने जाते हैं ग्यारह मूर्खों के आगे ) ।
यहाँ तो व्यवस्था बुराईयों के लिए उकसाती है। एक जगह व्यवस्था कहती है शराब मत पीयो; ये शारीर,मन, समाज परिवार के लिए हानिकारक है, दूसरी ओर अपने आप अपने द्वारा खोली दुकानों पर बिकवाती है। एक ओर व्यवस्था हत्यारे को दण्डित करने के लिए न्यायलय की व्यवस्था करती है दूसरी ओर उसी न्यायलय के निर्णय को बड़ी न्यायलय निरस्त करती है |

इस तरह की सारी बुराईयों के लिए व्यवस्था और पाश्चात्य मानसिकता दोषी है । वर्ना हमारे भारत और भारतीय सभ्यता में संस्कारों में जितना सम्मान महिलाओं का है पूरे विश्व में आज भी नहीं है।
इसे हम चाहे अपने धर्म ग्रंथों, इतिहास और ऐतिहासिक पुस्तकों और समाज में व्याप्त चलन में देखें तो नजर आएगा । लेकिन उसके देखने लिए शुद्ध दृष्टि वाली आँखें चाहिए ।

Monday, September 17, 2012

ज्योतिषियों के लिए शोध का विषय !!!!


देश भर के फेसबुक-ब्लॉग और अन्य सोशियल साईटों पर सक्रिय ज्योतिषियों के लिए शोध का विषय !!!!
मनमोहन + ममता बनर्जी + मायावती + मुलायम सिंह + एम् करुणानिधि + मोंटेक सिंह अहलुवालिया
क्या "म" (M) शब्द इस समय देश को बर्बादी की ओर धकेल रहा है !!!

दोस्तो ये सोचने का मुद्दा है ! वैसे पिछला माह हिन्दू धर्मानुसार पुरुषोत्तम मास के रूप में बीता है; शायद कल समाप्त हो गया है | बहुत भारी गुजरा है देश के लिए | इस विषय पर ज्योतिषी कुछ प्रकाश डालने का कष्ट करें |
साथ ही "म" शब्द से शुरू कुछ नामों के व्यक्तियों का इस समय जो
गठजोड़ दिखाई दे रहा है, इस देश के साथ आँख बंद कर अन्याय करने का उसके विषय में भी कुछ
प्रकाश डाला जाये |

एक जगह जब जमा हों सारे.... !!!! M M M M M M M

Friday, August 3, 2012

दूध से मुहं जलाई जनता छाछ भी फूंक फूंक पीयेगी |


जो गद्दारी १९४७ में हुयी थी उसे सुधारने के लिए पू....ऊउरे सिस्टम को बदलने के लिए कोई राजनीतिक दल अपने को साबित करता है तो उसका देश भक्त जनता द्वारा स्वागत होगा | इस बारे में स्वामी रामदेव जी महाराज आगे बढ़ रहे हैं | इसीलिए टीम अन्ना के पेट में मरोड़ उठा और राजनीतिक दल की बात कह कर बाजी मारने की सोची |

क्योंकि ये तथाकथित सेकुलर इस देश में राष्ट्रीयता की भावना नहीं पनपने देना चाहते | इनकी नजर में रामायण-महाभारत काल्पनिक हैं; क्योंकि नेहरू की नजर में भी ऐसा ही था | इनकी नजर में भारत के हिन्दू-मुसलमान कभी एक नहीं हो सकते; क्योंकि इन्होने यहाँ के मुसलमानों के दिमाग में उन्हें 'गौरी और गजनी के वंशज हो' बिठा रखा है | और हमारी नजर में कुछ सौ साल पहले तक यहाँ के हिन्दू मुसलमानों के पूर्वज एक ही थे | "स्वामी रामदेव जी कहते हैं जींस या डी एन ए टेस्ट करालो" |

जैसा राजीव दीक्षित और स्वामी रामदेव जी महाराज ने आमूल चूल परिवर्तन के लिए अपने अनुयायियों को प्रशिक्षित किया है उसके लिए हमें ऐसे बिचौलियों (अन्ना जैसे) की चालों को समझना पड़ेगा | आखिर ये क्यों हमारे आन्दोलन के समय ही वही सारी बातों को दोहराने लगते हैं जिन्हें बाबा रामदेव पिछले ४-५ वर्षों से लेकर चल रहे हैं अगर ये भी वही चाहते हैं तो स्वामीजी तो इन्हें बुला रहे हैं ये साथ क्यों नहीं आते ? अनशन तोडना ही था तो ये भी हो सकता था कि ९ अगस्त से दोबारा स्वामी रामदेव जी के साथ अनशन होगा |

जनता इन्हें चेता भी रही है लेकिन क्योंकि गोटी कहीं और फिट है; और वो जनता को मूर्ख समझते हैं | लेकिन गाँधी-नेहरू के समय जनता मूर्ख होगी; आज नहीं है | आज फेसबुक है मोबाईल है टी वी है और सबसे बड़ी बात दूध से मुहं जलाई जनता छाछ भी फूंक फूंक पीयेगी |


यही हम भारत स्वाभिमान वाले जान गए हैं इसीलिए हम कहते हैं ये सिस्टम फेल है क्योंकि अंग्रेजों का बनाया हुआ है उन्होंने अपने लूटने के लिए बनाया था वो गद्दार नेहरू उनसे मिलीभगत करके उसी सिस्टम को लागू कर गया जिसे ट्रांसफर ऑफ पॉवर एग्रीमेंट कहते हैं | इसीलिए स्वामी रामदेव जी ने सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का आह्वान किया है | लेकिन पहले ४०० लाख करोड़ रुपया कालाधन चाहिए,क्योकि भूख से बिलबिलाता गरीब जब दो रोटी खायेगा तभी कुछ सोचने लायक दिमाग काम करेगा | और जिनको दो रोटी मिल रही है वो स्वामी रामदेव जी के साथ लग गए हैं; उनकी सहायता से कालाधन आएगा और सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होगा |

Monday, July 16, 2012

ऐसा कब तक चलेगा माँ ?

हे भारत माता (भारतीयता) ! हम बड़भागी हैं जो तेरे जैसी माँ की गोद में हमने जन्म लिया। तेरे द्वारा वैदिक पावन ऋचाओं को सुन हमने आँखें खोली। तेरी गायी लोरियों को सुन हम सोये। तेरे खुशहाल हरे-भरे आँगन में खेलकर बड़े हुए। तेरे दिए हुए संस्कारों से अपने जीवन को सफल किया | तेरी दी हुयी शिक्षाओं से हम धन्य हुए |

इसीलिए तो माँ ! जब-जब तुझ (हम) पर संकट आया तेरे अधिकांश लाडलों ने मिलकर दुश्मन को ललकारा और संकट से निजत पाई। तेरा भेजा कोई दूत आता है और तेरी सोयी संतानों को जगा जाता है

पर माँ ! एक दुश्मन बहुत खतरनाक आया; उसके वंशजों को तो हमारे पूर्वजों ने बेशक भगा दिया, पर उसने तेरे द्वारा दिए जा रहे संस्कारों-शिक्षाओं में जो बदलाव किये उनके कारण आज तेरे लाडले निकम्मे हो गए हैं। उस कु शिक्षा के कारण सही-गलत की पहचान नहीं कर पा रहे। कुशिक्षा का प्रभाव देखो; जो मालिक थे सेवक बनना अपना अहो भाग्य समझ रहे हैं। योग्यता छोड़ आरक्षण के लिए झगड़ रहे हैं |

हे माँ ! उस कुशिक्षा के कारण उन्हें आकाश पाताल का भी अंतर पता नहीं। आकाश की ओर थूक कर खुश होते हैं और दुष्टों के सम्मुख पाताल तक झुक जाते हैं। नशा करने लगे हैं; दुर्व्यसनों में फंस चुके हैं; माता ! इस कुशिक्षा का प्रभाव देखो ! जो जितना अधिक शिक्षित है वो उतना ही अधिक भ्रष्ट है न केवल आर्थिक रूप से; अपितु नैतिक चारित्रिक और व्यावहारिक रूप से भी।

कुशिक्षा के प्रभाव से पढ़ लिख कर तेरी शश्य-श्यामला कोख में जहरीले रसायन वाले खाद और कीट नाशक डाल कर तुझे जहरीला बना दिया है। तेरी सदानीरा नदियों को गंदे नालों में बदल दिया है। झीलों को सुखा दिया है। इस सबका कारण है धन, जिस धन को तेरे श्रंगार में लगना था उसे विदेशों में जमा करवा दिया है। तेरा श्रंगार कैसे हो माँ ? कैसे तू अपने बच्चो को पाले ?

हे माँ ! हमें ये कहते हुए खेद होता है कि तेरी देशभक्त स्वाभिमानी संतानों में से आज अधिकांश निकम्मे हो गए हैं। उनमे उस शिक्षा का प्रभाव बहुत गहरा हो गया है। कुछ जो जरा संभल गए हैं वो वैसे पालों में बंट गए हैं कोई किसी नेता की जय में मस्त है कोई किसी पार्टी की जय में, कोई तेरे नाम की जय बोल कर विदेशियों के हाथों की कठ पुतली बन जाते हैं। कोई भी अपनी माँ की भावनाओं को नहीं समझ रहा।

ऐसा कब तक चलेगा माँ ? तेरे आँगन में कब तक बच्चे भूख और बीमारी से मरेंगे ? कब तक चिकित्सक कसाई की भूमिका निभाएंगे ? कब तक लोग मरते समय छाती पर धन ले जायेंगे ? दुष्टों को समझने की बुद्धि आम लोगों में कब आएगी ?

हे माँ ! तेरी संतानों का रक्त इतना गन्दा तो नहीं हो सकता । पहले भी तो संकट आये हैं तब तो ऐसा नहीं देखा सुना। गद्दार तो थे पर गिने चुने ही थे आज तो गद्दारों की गिनती नहीं होती माते ! ............ । क्या करें ?

Friday, July 13, 2012

"छिनाल " कांग्रेस !

एक बहुत चालाक औरत थी। चरित्रहीन मां-बाप की संतान। इसलिए पैतृक गुण बचपन से ही उसमें विद्यमान थे वह भी अपने मां-बाप से ज्यादा दुश्चरित्र हो गयी साथ ही चालाक इतनी, कि; 'उसकी चरित्रहीनता को समझने - जानने के बाद भी उसके परिवार वाले और समाज' मूर्ख बन जाते हैं