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Monday, November 14, 2011
महंगाई समस्या नहीं;समाधान है; गरीब कम करने का |
क्योंकि मेरे पास कार तो है नहीं; एक पुराना स्कूटर है जिसमे महीने में सात सौ का पेट्रोल लगता है जो दो साल पहले तक तीन सौ का लगता था,मैं अपने को अमीर नहीं कह सकता हाँ ३२ रूपये से ऊपर वाला अमीर हूँ लेकिन पेट्रोल मुझे गरीब बना देगा। जितने कर हिंदुस्तान में लगाये हुए हैं उनसे क्या-क्या होता है ? ये जानने कि इच्छा होने लगी है । क्योंकि इन की अय्याशी किसी से छुपी नहीं है, कहीं अपनी अय्याशी कम होने के डर से ही तो ये महंगाई नहीं बढ़ाते।
है बेशक यह एक मजाक, हो सकता है इसमें कहीं कोई सच्चाई हो।
जनसंख्या ! वो भी गरीबों की। दरअसल एक बड़ी समस्या है; संसार में सक्षम लोगों के लिए वैसे ही संसाधनों की कमी पड़ रही है इन गरीबों के कारण । इसलिए बहुत दबाव है कि जनसंख्या कम करो, फिर गरीबी कम करो; ये दोनों ही कम होंगे तो सक्षम लोगों के ऐश ओ आराम की वस्तुएं आसानी से उपलब्ध हो जाएँगी। दूसरा; अगर कहीं गरीबों को समय रहते सक्षमों की अय्याशी समझ में आ गयी तो बड़ा विद्रोह न हो जाये। इसलिए; जनसंख्या कम करो।
अब जनसंख्या कम करनी है ! गरीबी कम करनी है,गरीब* कम करने हैं। जरा ध्यान देना ! केवल कम करने हैं; खत्म नहीं करने, क्योंकि ख़त्म कर दिए तो इनके (सक्षमों के) लिए काम कौन करेगा ? तो साहब एक तीर से कई निशाने लगाने का सबसे अच्छा हथियार है "महंगाई"। वैसे तो कई प्रकार के जो"कर"लगाये हुए हैं वह भी गरीबी बनाये रखने के लिए हैं। दूसरा; अपनी अय्याशी कम न हो जाये इसलिए भी करों की आवश्यकता पड़ती है।
बहुत कोशिश करी;अस्पतालों में चिकित्सक और दवाएं ही नहीं रखे। जिससे गरीब मरें, अपने लिए तो अलग अस्पताल हैं अलग दवाएं और विशेषज्ञ चिकित्सक हैं पर गरीब फिर भी कम नहीं हो रहे,कम ही लोग मर रहे हैं । लोग किसी तरह कर्ज लेकर ही सही अपना इलाज करवा ले रहे हैं। इन्होने क्या नहीं किया गरीबों को कम करने के लिए उनकी जमीनें छीनी, उन्हें कर्ज में फंसाया, उनके लिए पढने को अध्यापक नही रखे, बेरोजगारों को काम ही नहीं दे रहे, सड़कों तक पर गड्डे इसीलिए छोड़े जाते हैं कि उनसे होने वाली दुर्घटनाओं से गरीब ही मरते हैं। नक्सलवादी, आतंकवादी घटनाओं में गरीब ही मरते हैं पर फिर भी इनकी संख्या बढती ही जाती हैं। क्या-क्या नहीं किया गरीबी कम करने के लिए; अंत में हार कर गरीबी रेखा को ही इतना नीचे खींच दिया कि उससे ऊपर सब अमीर माने जायेंगे। पर उसमे भी घपला हो गया, क्योंकि कुछ गरीब जो पढ़-लिख गए हैं वह इनकी साजिश को समझ गए।
गरीबों की संख्या है भी बहुत साहब; जहाँ देखो गरीब ही मरता है नकली दारू,नकली दवा,नकली खानपान की वस्तुएं, घर में मरे या सीमा पर मरे, खेत में मरे या सड़क पर मरे, बिना दवा के मरे या बिना चिकित्सक के मरे, अनपढ़ मरे या पढ़ा-लिखा मरे,नक्सलवादी या आतंकवादी हमले में मरे या हमला करके मरे, मतलब मरता गरीब ही है। हमने तो साहब बहुत कम अमीरों को मरते देखा है। जैसे गांधीजी, नेहरूजी,इदिराजी,…. इत्यादि-इत्यादि। मतलब करोड़ों गरीबों पर एक अमीर। अब देखा जाये तो उनकी संख्या है ही उतनी।
अब ये एकमात्र हथियार है जिससे गरीबी और गरीब दोनों नियंत्रण में रहते हैं, शिक्षा महँगी करदो,चिकित्सा महँगी करदो,रोटीमहँगी करदो अब हर चीज को अलग-अलग महंगा करेंगे तो लोग इन्हें मारने न आ जाएँ इसलिए सबसे आसन उपाय है पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दो। एक बार नहीं थोड़ा-थोड़ा करके कुछ सालों में इतने बढ़ा दो कि अब अगर कम करने का दबाव भी पड़े तो कुछ कम करने पर भी कोई फर्क न पड़े। क्योंकि इनकी अपनी हिस्सेदारी भी होगी;वो भी घाटे में न जाये। है न आसान उपाय ?
Friday, November 11, 2011
इस हल्ले और होड़ के कारण कितने ही बच्चे समय से पहले पृथ्वी पर आ जायेंगे
Tuesday, November 8, 2011
कुछ दोस्त हमारे; हमसे कतराने लगे हैं, “मतलब” देशभक्ति का; जो हमने बता दिया ॥
कुछ दोस्त हमारे; हमसे कतराने लगे हैं,
“मतलब” देशभक्ति का; जो हमने बता दिया ॥
Sunday, November 6, 2011
कांग्रेस के पीछे कौन है ?
स्वामी रामदेव के पीछे भाजपा और संघ का हाथ !
अन्ना हजारे के पीछे भाजपा और संघ का हाथ !
एक बड़ा सवाल
कांग्रेस के पीछे किसका हाथ ?
हमें जो समझ आ रहा है वो यह है कि; इस अ राष्ट्र वादी कांग्रेस के पीछे
आजादी से पहले अंग्रेज,आजादी के बाद चरित्रहीन नेता,रूस और अमेरिका की गुप्तचर संस्थाएं और माफिया डॉन, और अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, अमेरिका और यूरोप की सरकारें- गुप्तचर संस्थाएं, मुख्य रूप से वो विदेशी बैंक जिनको दिवालिया होने का खतरा है, खनन माफिया,शिक्षा माफिया,चिकित्सा माफिया,शराब माफिया,भू माफिया, बिल्डर माफिया और अन्य भी जिन भ्रष्टों की सरपरस्त कांग्रेस है।
जैसे कि देश के टुकड़े करवाने के लिए कांग्रेस के पीछे माउन्ट बेटन और "लेडी माउन्ट बेटन" कश्मीर समस्या के लिए के लिए भी कोई..... थी। हमारे क्रांतिकारियों को आतंकवादियों कहलवाने के पीछे कौन है ? हमारी संस्कृति-संस्कारों को ढकोसला कहलवाने के पीछे कौन है ? हमारे इतिहास को तोड़ मरोड़कर पढ़वाने के पीछे कौन है ? देश का तीन सौ लाख करोड़ रुपया विदेश में जमा करवाने के पीछे कौन है ? जो बैंक हमारे बेईमानों का पैसा अपने यहाँ छुपाये बैठे हैं; उन्हें भारत के अन्दर अपनी शाखाएं खोलने की अनुमति दिलवाने के पीछे कौन है ? केवल यही एक पार्टी है जो हमारे देश की बर्बादी का कारण है ये बताये इसके पीछे कौन-कौन है ? ......
Wednesday, November 2, 2011
क्रिकेट के नाम पर; बर्बादी कम न थी.............
जिस देश में तीस की रफ़्तार से गाड़ी चलाना मुश्किल हो वहां ३०० की रफ़्तार से रेस लगाने का ट्रेक बन जाये तो कुछ सम्भावना आम जनता के लिए भी बनती है , उनके लिए ऐसा क्यों नहीं हो सकता ? आखिर आम जनता ने ऐसे नेताओं, अधिकारीयों का क्या बिगाड़ा है ? हे भगवान सद्बुद्धि दो ऐसे नेताओं-अधिकारीयों को जो अस्पतालों में दवाओं,चिकित्सकों,बिस्तरों या सड़ रहे अनाज के लिए गोदाम बनवाने के लिए और स्कूलों में अध्यापकों के लिए धन का आभाव बता कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं जिनकी बनायीं सड़कों से पूरे देश का यदि रफ़्तार का औसत निकाला जाये तो शायद तीस भी न निकले । और भगवान ऐसे नेताओं को सद्बुद्धि देना असंभव हो तो उस जनता को ही दे देना जो इनके ठगने में आसानी से आ जाती है।
क्रिकेट के नाम पर;
बर्बादी कम न थी,
अब फॉर्मुला वन ले आये।
कोई हिसाब लगा कर ये तो बताये;
इन धौनियों सचिनो, या
हीरो-हीरोइनों पर;
पैसे किसने बरसाए ।
धन्य है देश हमारा;
धन्य यहाँ की देश भक्ति,
सीमा पर जवान मर जाये;
हम छक्के पर ताली
बजाएं ॥
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"मानसिक अय्याशों के लिए"
फॉर्मुला वन रेस को देख कर;
ऐसा लग रहा है।
मत याद दिलाओ फांसी झूलते किसानों की,
हस्पतालों में मर रहे बीमारों की,
अनाज को सड़ा रहे गोदामों की,
ये कुछ अच्छा नहीं लग रहा है।
भारत तरक्की कर रहा है,
फॉर्मुला वन रेस को देख कर;
ऐसा लग रहा है।
क्यों करते हो आलोचना ?
लगता है तुमने समाचार नहीं सुना,
हुआ है भारत का सम्मान दोगुना ,
क्यों ! ये कुछ अच्छा नहीं लग रहा है ?
भारत तरक्की कर रहा है,
फॉर्मुला वन रेस को देख कर;
ऐसा लग रहा है।
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