ताजा प्रविष्ठियां
Saturday, March 24, 2012
Friday, March 23, 2012
हार्दिक मंगल कामनाएँ
आज शहीद दिवस पर सभी शहीदों को याद करते हुए; भारत के सच्चे सपूत भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को हमारा कोटि-कोटि प्रणाम।
आज के दिन 23 मार्च सन् 1931 को इन सभी ने भारत माता के लिए हँसते-हँसते फाँसी को गले लगा लिया था।
धन्य होती है ऐसे माताएँ जो ऐसे वीर पुत्र को जन्म देती है।
साथ ही नव संवत्सर पर हार्दिक मंगल कामनाएँ !प्रभु कृपा से आप के आयु,आरोग्य,ऐश्वर्य की अभिवृद्धि हो
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Sunday, March 11, 2012
नग्नता के लिए पुरस्कार
कई बार सोचता हूँ हमने ये कैसे मान लिया कि सभी बुराईयों के लिए कलियुग का ही दोष है | क्या ऐसी बुराईयाँ अन्य युगों में नहीं थीं ? हमारे पौराणिक धर्म ग्रंथों में तो जितनी भी ऐतिहासिक लड़ाईयों का वृत्तान्त है उसमे एक भी कलियुग का नहीं है | दूसरा; जितनी भी बड़ी लड़ाईयों का वृत्तान्त है वो निजी हितों के लिए न होकर धर्म-संस्कृति-संस्कार-सत्य और देश बचाने के लिए है |
और इस कलियुग में भी ऐसा ही हो रहा है; ऐसी लड़ाईयां निरंतर चलती रहती हैं | इन्हें साधारण युद्ध नहीं "संस्कृति युद्द"
कहना चाहिए | अगर ऐसे युद्ध न हों ( जो समय-समय पर होते रहते हैं और जिनके लिए कोई न कोई महापुरुष अवतरित होता है) तो शायद!! न प्रकृति बचे; न पर्यावरण, न संस्कृति बचे; न संस्कार, न देश बचे; न धर्म |
वो समाज कैसा होगा जब सभी उनकी तरह नंगे होंगे, उनकी तरह लुटेरे-हत्यारे होंगे,बलात्कारी होंगे ?
आज क्या है कि हमारी व्यवस्था ही बुराईयों को पैदा करने वाली साबित हो रही है वरना; जिस व्यवहार को हेय दृष्टि से देखा जाना चाहिए उसे समाज में सम्मानित किया जाता है। व्यवस्था इस सबको सही ठहराने के लिए कानून बना देती है । विदेशी संस्कृति के प्रभाव में सामूहिक रूप से कु संस्कृति को बढ़ावा दिया जाता है । किसी भी गलत कार्य को सही ठहराने के लिए कानून बनाने का चलन अंग्रेजों ने शुरू किया था; उसे ही लागू करने का काम आजाद होने के बाद भी यहाँ की सरकरों ने किया। व्यवस्था के रूप में नाम के लिए लोक तंत्र ( जिसमे दस विद्वान् बेकार माने जाते हैं ग्यारह मूर्खों के आगे ) ।
हमारी व्यवस्था बुराईयाँ,बेईमानी पैदा करती है ; आज कोई ईमानदार रहना चाहता है पर नहीं रह सकता, सभी उसके दुश्मन हो जाते हैं कोई उसे उपहास की दृष्टि से देखता है तो कोई प्रत्यक्ष उसके विरोध में खड़ा हो जाता । यही कारण है ईमानदार लोग हर जगह मारे जाते हैं। अगर व्यवस्था के द्वारा बुराईयों पर नियंत्रण रखना हो तो व्यवस्था को स्वयं उदहारण पेश करना चाहिए बुराईयों का विरोध करके, पर यहाँ तो व्यवस्था बुराईयों के लिए उकसाती है। एक जगह व्यवस्था कहती है शराब मत पीयो; ये शारीर,मन, समाज परिवार के लिए हानिकारक है, दूसरी ओर अपने आप अपने द्वारा खोली दुकानों पर बिकवाती है। एक ओर व्यवस्था हत्यारे को दण्डित करने के न्यायलय की व्यवस्था करती है दूसरी उसी न्यायलय के निर्णय को बड़ी न्यायलय निरस्त करती है |
Saturday, February 25, 2012
तब आजादी की लड़ाई वास्तव मे कितनी मुश्किल रही होगी;
कभी हम बचपन में क्रांतिकारियों की कहानियां पढ़ते थे तो अकसर गद्दारों का जिक्र आता था | तो हम सोचते थे कैसे होते होंगे वो गद्दार ? उन्हें क्यों नहीं समझ में आती होगी वो बात ? जो देशभक्त क्रांतिकारियों को समझ में आती है |
आज वैसा ही सब कुछ हमारे सामने घट रहा है हमें गद्दार देखने को मिल रहे हैं | और देख कर ये सोच कर दिमाग भन्ना जाता है कि तब आजादी की लड़ाई वास्तव मे कितनी मुश्किल रही होगी; जब ना फोन था ना फेसबुक था ना अन्य संचार के इतने साधन थे, ना त्वरित गति वाले आवागमन के साधन थे |
एक अंतर है तब के गद्दार विदेशियों की गुलामी को सही मान कर उनके द्वारा पोषित सम्मानित होते थे; अब के गद्दार अपनों द्वारा लुट भी रहे हैं अपना सब कुछ (संस्कार-चरित्र गया तो सबकुछ गया) गँवा भी रहे हैं फिर भी उन्हें सही मान कर उनके ही पीछे चल रहे हैं |
अब के गद्दार बहुत चालक हैं | जिनको देश और समाज की चिंता ना होकर सिर्फ खुद और खुद की खुशियों से ही मतलब होता है जो सिर्फ खुद के मजे में डूबे रहने की बीमारी से ग्रस्त होने के साथ स्वार्थी किस्म के होते है, वो उसी तरह से हैं;जैसे एक चालाक-जिद्दी लकडहारा जंगल में लकड़ी काटते वक्त अपनी ही गलती से अपनी नाक काट बैठा तो अब अपनी नाक(इज्जत) बचाने को गाँव में आकर सबको कहानी सुनाता है कि मुझे जंगल में भगवान मिले थे उन्होंने कहा है कि जो अपनी नाक नहीं कटवाएगा उसका कुछ न कुछ नुकसान हो जायेगा |
मतलब ये है कि वो अपनी गलती छुपाने को; चाहता था कि सभी नकटे बन जाएँ | वही हाल आज के गद्दारों का है | जो कुसंस्कृति के समर्थक हैं, जिनको इस व्यवस्था से हराम का खाने को मिल रहा है, ऐसे लोग; ये पता होते हुए भी कि वो गलत हैं; आज गद्दारी कर रहे हैं उनकी देखा-देखी साधारण व्यक्ति भी उनका अनुसरण करके अपना ही नुकसान कर रहा है | कहीं कहीं उसकी मज़बूरी भी है कि उसे इनका समर्थन करना पड़ रहा है |
Monday, February 13, 2012
उनकी तो मम्मियां भी वैलेंटाईन मनाती थी; तुम्हारी माँ ने कभी मनाया ?
एक के साथ नहीं कईयों के साथ कई-कई बार मनाया,
विवाह से पहले ही न जाने कितने बच्चों को नर्सरी* पहुँचाया;
हम भारतियों की माताओं ने भाई तो सैकड़ों हजारों लाखों को बनाया;
पर दोस्तो ! मजे के लिए; पुरुष मित्र या पति विदेशियों की तरह कभी नहीं बनाया ||
उनकी मम्म्मियों और डैडीयों ने वैलेंटाईन मनाया था इसलिए वो मनाएं तो चलेगा
हमारे यहाँ उस कुसंस्कृति की आड़ में वो कुचक्र चलायें;
ये किसी भी संस्कृति प्रेमी देशभक्त को खलेगा,
पहले ही बुराईयाँ इतनी आ गयीं समाज में;एक और बुराई आ जाये तो समाज जलेगा ||
हमारे पर्व क्या कम हैं जो जबरदस्ती वो त्यौहार मनेगा;
जिससे कुछ टीवी चैनलों और कम्पनियों का भंडार भरेगा |
उनकी तो मम्मियां भी वैलेंटाईन मनाती थी; तुम्हारी माँ ने कभी मनाया ?
Sunday, January 8, 2012
डिप्रेशन के मरीजों को पहले के गाने सुनाने चाहिए
ये गाना गोपी फिल्म का है दिलीप कुमार द्वारा परदे पर गाया गया है | एक से एक गाने सुने आज | कुछ देर में उस चैनल पर ध्यान गया | 'है प्रीत जहाँ की रीत सदा....., मेरे देश की धरती सोना उगले; उगले हीरे-मोती, न मुहं छुपा के जियो; और न सर झुका के जियो...| क्या ऐसे गानों की तुलना "उललाला"* या "जय हो"* से हो सकती है ? व्यक्ति को एकदम से रिचार्ज कर देते हैं पहले के गाने | एक सुझाव और है डिप्रेशन के मरीजों को पहले के गाने सुनाने चाहिए मेरा दावा है वो एक हद तक ठीक हो जायेंगे | आप अपना ख्याल भी बताइयेगा |
Monday, January 2, 2012
अट्ठारहवीं सदी से पहले तक भारत विश्व का सिरमौर था;
तब न टाटा- बिरला या अम्बानी था,
न क्रिकेट-ओलम्पिक या राष्ट्रमंडल था ||
धन कमाने के लिए हम विदेश नहीं जाते थे;अपितु
विदेशी धन कमाने और लूटने के लिए भारत आते थे ||
पर दोस्तो ! ऐसा वाला लोकतंत्र नहीं था,
और जब लोकतंत्र ही नहीं था तो लोकपाल भी नहीं था |
हाँ ! विश्वास करो ऐसे नेता और अभिनेता भी नहीं थे,
फिर भी भारत सिरमौर था अट्ठारहवीं सदी से पहले तक ||
हमारा निर्यात पैतीस प्रतिशत और बदले में सोना मिलता,
न कोई अनपढ़ था ; न कोई भिखारी मिला, ऐसा;
हमारा इतिहास नहीं; ये कहती हैं अंग्रेजों की डायरियां ||
ऐसा जातिवाद भी कहाँ था ? जब नाई-कसाई,मोची-दरजी,
तो कुशल सर्जन होते थे, लुहार लोहा बनाता भी था, और;
सैनिकों की तरह युद्ध में लड़ता भी था, जिनको वो दलित कहते हैं;
वो जल जंगल जमीन का विद्वान् होता था, कहाँ पानी है;
पांव के नाख़ून से जमीन खुरच कर बता देता था,
कूँआ खोद कर पहला घड़ा पानी का वही पिलाता था,
हवाएं सूंघ कर बता देना किसी पंडित को नहीं आता था,
बरसात या अंधड़ आने वाला है कोई दलित ही बताता था ||
अट्ठारहवीं सदी से पहले तक मेरा भारत लुटता था,
फिर भी;इतना संपन्न था; कोई भीख नहीं मांगता था
सबकी जरुरत;धरती पुत्र किसान ही पूरी करता था,
दूध की नदियाँ बहती थी,शराब का चलन नहीं था;
छप्पन भोग होते थे खाने में, मांस का सेवन नहीं था ||
मुस्लमान भी हमारे ही थे कोई गैर नहीं था;
सेनाओं में सेना पति होते थे अपनों से बैर नहीं था,
और यकीन मानो दोस्तो बिना आरक्षण के सबका सम्मान था,
कोई भी मुफ्त का लालची नहीं था सबका स्वाभिमान जिन्दा था,
आज जैसे विद्यालय नहीं थे पर कोई अनपढ़ नहीं था;
अट्ठानवे प्रतिशत तो साक्षरता थी कोई निरक्षर नहीं था ||
तब घर होता था तभी तो कुटुंब और परिवार होता था,
वृद्धाश्रम नहीं होते थे, वृद्धों का तिरस्कार नहीं होता था;
गाँव में पंचायत होती थी सरपंच उसका सबसे वृद्ध ही होता था,
चोरों को छूट थी चोरी की, पर दोस्तो कोई चोर ही नहीं था ||
दोस्तो क्यों रहें हम अब सोये ? निकल गया वो;
जोअँधेरे का समय था; उजाले की किरणें दिखने लगी हैं,
धीरे-धीरे ही सही सोये हुओं की आँखें खुलने लगी हैं,
कोशिश कर रहे हैं वो* हमें अब भी सुलाए रखने की,
हमारा स्वाभिमान जागने से जिनको डर है अपनी अय्याशी खोने की ||
जो झूठ उन्होंने पढाया दिखाया समझाया हम उसे ही सच मान बैठे,
वो चाहते थे हम लड़ें आपस में; हम सच में अपनों से ही लड़ाई ठान बैठे ||
इस देश में जो रहता है वो अपनी जड़ों को अगर देखे;
दूर क्यों जाये अपने दादा-दादी से ही पूछें,
अपने-अपनों पर ही जो अत्याचार करते;
कैसे फिर अभी तक इतनी संख्या में बचे रहते ||
Sunday, December 11, 2011
भला कोई माँ अपने बच्चों का गला स्वयं कैसे घौंट सकती है ?....
तो साहब हम बात कर रहे हैं माँ की। माँ! दरअसल एक व्यक्तित्व के साथ एक प्रवृत्ति भी है इसीलिए तो जरुरी नहीं कि ममत्व का भाव केवल एक स्त्री में ही हो यह पुरुषों में भी होता है। फिर भी माँ शब्द को एक स्त्री के लिए ही प्रयुक्त किया जाता है और जितने भी उदहारण दिए जाते हैं वह स्त्रियों के ही होते हैं। कारण ? प्रकृति जननी है और स्त्रीलिंग है, इसे माँ कहा और समझा जाता है। इसीलिए माँ शब्द केवल स्त्रियों के लिए ही प्रयुक्त होता है ।
प्रकृति के किसी भी प्राणी में कोई भी माँ अपने बच्चों का गला अपने हाथों से नहीं घोटती;कुछ अपवाद हों तो पता नहीं।
जैसे कहते हैं नागिन अपने संपोलों को स्वयं खा जाती है। वहीँ बंदरिया अपने बच्चे को मरने के बाद भी तब तक नहीं छोड़ती जब उसमे से दुर्गन्ध नहीं आ जाती। मेरा दावा है लादेन की माँ अगर वहां पर होती तो पहले स्वयं गोली खाती। कोई भी हो सद्दाम या गद्दाफी के विषय में भी हम यही कह सकते हैं । पर इनके पास शायद माँ जीवित नहीं थी।
पर हमारे यहाँ की एक माँ जीवित है; अपने बच्चों की प्यारी और अपने ही बच्चों को जी जान से चाहने वाली, हमारे देश में "कांग्रेस" है। भला वो कैसे चाहेगी कि अपने प्यारे बच्चों का गला घोंट दे। जो बच्चे उसे अब मालामाल कर रहे हैं। चाहे उसका “बड़ा पुत्र” भ्रष्टाचार हो या “गोद ली पुत्री” व्यवस्था हो, और लोकतंत्र नामक पुत्र को तो उसने पूरी योजनाबद्ध तरीके से पालपोस कर बड़ा किया है इसका इतना डर उसने जनता में बैठा रखा है कि इसके नाम से हर कोई बगलें झाँकने लगता है। और माँ कांग्रेस; अपने सब नैतिक अनैतिक धंधे इसकी आड़ में बखूबी कर लेती ।
पूरी दुनिया एक तरफ; माँ की ममता एक तरफ। माँ अपनी जान दे देती है पर अपने बच्चों को बचा लेती है अगर वो सक्षम हो। वो मर जाये तब कहीं संभव होता है कि उसके बच्चों को कोई मार सके।
तो साहब माँ की ममता को समझो ध्यान करो जंगल में एक शेरनी या हथिनी पागल हो जाती है जब कोई उनके बच्चों पर प्रहार करता है । कहीं वैसा ही कांग्रेस के मामले में न हो जिसे देखो उसके नाजों पले पुत्र-पुत्रियों को ख़त्म करने की बात करता है । इनके ख़त्म होने से पहले वह पगला जाएगी स्वयं ख़त्म हो जाएगी पर इन्हें अपने जीतेजी ख़त्म नहीं होने देगी। आखिर एक अच्छी माँ के प्राण अपने बच्चों में ही तो बसते हैं।
Wednesday, December 7, 2011
बड़ी ख़ुशी हुयी ये जानकर........
इंटरनेट साईटों को प्रतिबंधित करने को लेकर समझ आया कि सरकार देखती सुनती सब है; पर करती कुछ नहीं, हाँ; अपने सर पर लगे तो बौखला जाती है।
हम तो मायूस थे कि दुश्मन के कानों में मैल आँखों में कमजोरी है |
बड़ी ख़ुशी हुयी ये जान कर कि वो सब कुछ सुन और देख रहे हैं ||
Saturday, December 3, 2011
प्रार्थना; हे भगवान इनको कुमति ही देना !
हे भगवान “इनको” कुमति ही देना।
पर "इनसे" हमें और देश को बचा लेना॥
इनकी चाल – चेहरा और चरित्र
सबको समझ आ जाये;
नादानों को ऐसी समझ देना
सब इन्हें जान जाएँ तब तक;
हे भगवान इनको कुमति ही देना।
पर;”इन”से हमें और देश को बचा लेना॥
“ये”चरित्र हीनों का सम्मान करें,
अपने लिए चरित्रहीनों का निर्माण करें,
“ये”अबलाओं को तंदूर में भूनें;
या चूना भट्टी में भस्म करें,
“वो” इनकी समर्थक ”पबों” और बारों में मरें,
अबलाओं को समझ आ जाये;
ऐसा सबक देना,
पर इन से हमें और देश को बचा लेना।
