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Saturday, May 21, 2011

हे देहली ! आ रहे हैं हम “भारत स्वाभिमानी’,तेरे आँगन में;

हे भारत की भाग्य विधाता देहली ! तुम स्तब्ध न होना;
आ रहे हैं हम “भारत स्वाभिमानी’,तेरे आँगन में;
इतिहास
का सबसे बड़ा सत्याग्रह देख कर; हतप्रभ न होना ।
हे
देहली ! वैसे तो देखे हैं तुमने अपने जीवन में कई बदलाव,
खांडव
प्रस्थ से इन्द्रप्रस्थ,फिर पड़ोस के कुरुक्षेत्र में, सत्यासत्य का टकराव,
धर्मराज
का राज्याभिषेक,राजा परीक्षित को सर्पदंश और जन्मेजय का सर्प यज्ञ विशाल,
देखा है तुमने निर्जन वन से राजधानी बनना,बारम्बार उजड़ाव और बसाव,
धैर्य
की पराकाष्ठा हो तुम, इसलिए सत्याग्रहियों को देख; विक्षुब्ध न होना,
हे भारत की भाग्य विधाता देहली ………।
बदले हैं तम्हारे नाम भी कई,देखे है कई राजा-महाराज,
शौर्य
और क्षमा देखी चौहान की अट्ठारह युद्धों का इतिहास,
गौरी
की कायरता देखी धोखा भी; मंगोलों मुगलों का अत्याचार,
नादिरशाह
की लूट देखी और देखा, एक ही दिन में क़त्ल किये तीन लाख,
तुगलक
ने उजाड़ दिया तुम्हें,बस गयी; फिर बन गयी तुगलकाबाद,
उजड़
गयी तो भी देहली है, वर्तमान में भी कहाँ हो आबाद,
तुम
तो केवल तुम ही हो और तुम्हारी पहचान है; "धैर्य न खोना" ।
हे
भारत की भाग्य विधाता देहली…………………
देखा
है वैभव तुमने देखी है गरीबी बेबशी लाचारी भी,
देश
भक्तों की निष्ठा देखी है और गद्दारों की गद्दारी भी,
भाईयों
को लड़ते देखा गद्दी के लिए, राजाओं की अय्याशी भी, गुरु तेग बहादुर की देखी बलिदानी,शाह जफ़र की लाचारी भी ,
देहलवियों
की खुद्दारी भी देखी , और अंग्रेजों की मक्कारी भी,
सन सैंतालिस में हुयी साजिश देखी,देश को टुकड़ों में बंटती बर्बादी भी, लोकतंत्र में नेताओं की अय्याशी भी देखी तुने, अब देख रही लाचारी भी, इतना सब कुछ सह जाती है
देहली ! इस बार भी क्लांत न होना ,
हे भारत की भाग्य विधाता देहली ! तुम स्तब्ध न होना ; आ रहे हैं हम भारत स्वाभिमानी, तेरे आँगन में, इतिहास का सबसे बड़ा सत्याग्रह देख कर; विक्षुब्ध न होना ।

Monday, May 16, 2011

“तुम धन्य हो” दिग्विजय सिंह


“तुम धन्य हो” धिक्विजय सिंह। धन्य है तुम्हारी स्वामिभक्ति;जो स्वामी के दुत्कारने के बावजूद भी श्वान-निष्ठा नहीं छोड़ती; अपितु पुच्छ हिल्लन और बारम्बार पद चट्टन से अपने स्वामी को रिझाती रहती है। "पर एक अच्छे श्वान का एक गुण तुममे नहीं है"; वह सज्जन और दुर्जन में भेद जान लेता है और केवल दुर्जन के विरोध में ही भौंकता है, पर तुम भेद तो जानते हो लेकिन सज्जन के विरोध में भौंकते हो । पर ये भी सच है; कि अगर ये गुण तुम पा लो तो कैसे अपनी विशिष्टता सिद्ध कर पाओगे। धन्य है; तुम्हारी देश-समाज- संस्कृति,सज्जन "विरोध" के प्रति निष्ठा को। तुम्हारे जैसे दुष्ट शिरोमणि,गद्दार शिरोमणि, असुर शिरोमणि सदियों में कभी-कभी ही जन्म लेते हैं। अपना और अपने कुल-खानदान का नाम "मोटे स्याह अक्षरों में" इतिहास में लिखवा जाते हैं। कुल-वंश का गौरव तो सभी बनना चाहते हैं पर कुल कलंक बनने का साहस भी कोई एकाध ही सदियों में कर पाता है। आखिर कौन ऐसा साहस कर पाता है ; कि उसके आने वाली पीढ़ीयां गद्दारों के नाम से जानी जाएँ। वैसे तो तुम्हारे समुह (पार्टी) में एक से बढ़ कर एक "श्वान निष्ठीय आदर्श" वाले व्यक्तित्व हुए हैं और ; और वर्तमान में भी हैं,जाने क्यों उन्होंने तुम्हें अकेला छोड़ा हुआ है इसीलिए तुम जो आदर्श प्रस्तुत कर रहे हो वह धन्य है । धन्य हैं तुम्हारे माता -पिता जहाँ भी (नर्क में ही )होंगे कैसे अपने कुल कलंक पुत्र को देख रहे होंगे कि कैसे उनका पुत्र सिंह हो कर भी किस सरलता से श्वान- प्रवृत्ति को पूर्ण रूप से निभा रहा है। पिता याद कर रहे होंगे कि उनके कुल में कोई इतना बड़ा गद्दार कभी हुआ या नहीं आखिर किस से बीज धारण किया तुम्हारी माता ने; वह भी जानना चाह रहे होंगे ।
धिक्विजय सिंह ! एक और सिंह आजकल आवारा श्वान की तरह भटक रहे हैं स्वामिभक्ति में ये भी किसी स्वान से या तुमसे कम नहीं हैं इनकी भी सिफारिश करो न, एक से भले दो होते हैं, अकेले की तरफ किसी का भी ध्यान कम जाता है जब दो हो जाओगे तो स्वामी भक्ति भी अधिक होगी सेवा भी अधिक होगी ।
एक आदर्श प्रस्तुत करो देश के गद्दारों के लिए, स्वान प्रवृत्ति वालों के लिए, धर्म विरोधियों के लिए संस्कृति-समाज विरोधियों के लिए । याद करो जयचंद को; आज तक लोग भूले नहीं हैं। ऐसा ही तुम्हारा नाम भी याद रखा जायेगा ।आखिर गद्दार वंश परंपरा को आगे बढ़ाने का कोई तो सार्थक प्रयास करे ।

धिक्विजय सिंह ! एक और सिंह आजकल आवारा श्वान की तरह भटक रहे हैं स्वामिभक्ति में ये भी किसी स्वान से या तुमसे कम नहीं हैं इनकी भी सिफारिश करो न, एक से भले दो होते हैं, अकेले की तरफ किसी का भी ध्यान कम जाता है जब दो हो जाओगे तो स्वामी भक्ति भी अधिक होगी सेवा भी अधिक होगी ।

एक आदर्श प्रस्तुत करो देश के गद्दारों के लिए, स्वान प्रवृत्ति वालों के लिए, धर्म विरोधियों के लिए संस्कृति-समाज विरोधियों के लिए । याद करो जयचंद को; आज तक लोग भूले नहीं हैं। ऐसा ही तुम्हारा नाम भी याद रखा जायेगा ।आखिर गद्दार वंश परंपरा को आगे बढ़ाने का कोई तो सार्थक प्रयास करे ।

Sunday, May 15, 2011

कायर प्रधान मंत्री.... लादेन, आतंकवाद,नास्तिक वाद, कम्युनिज्म...दादागिरी, बुराईयाँ ख़त्म होने का दौर, जन लोकपाल, विश्व का सबसे बड़ा सत्याग्रह |

लादेन मारा गया ! विश्वास नहीं होता, पर; करना पड़ेगा। क्योकि अमेरिका कह रहा है। वैसे भी बुराई ख़त्म होने की कामना सभी करते हैं इसलिए भी हमने मान लिया। और यह समय बुराईयों के लिए ख़राब ही चल रहा है। पूरे विश्व में बुराई के विरुद्ध जनता जाग रही है। इसलिए भी हम मान लेते हैं कि लादेन मारा गया होगा। अच्छा ही हुआ बुराई को ख़त्म होना ही चाहिए।

पर जिस गोपनीयता से अमेरिकी सैनिक कार्रवाही हुयी; क्या यह संभव नहीं कि वह जिन्दा पकड़ कर ले जाया गया हो और विश्व की नजरों में धूल झोंकने के लिए अमेरिका ने कहानी बना कर पेश कर दी हो ?
कुछ समय बाद अगर अमेरिका कहे कि लादेन मरा नहीं था हमने जिन्दा पकड़ा था और उससे सभी जानकारियां लेकर अब मार रहे हैं तो ! तब भी मानना पड़ेगा, क्योकि ये सब करने के लिए अमेरिका सक्षम है। और विश्व के दो सौ देशों में से किसी की हिम्मत नहीं; कि उससे कह सके, कि हमें लादेन को दिखाओ या दिखाया क्यों नहीं या उससे यही पूछ सकें कि कोई विश्वसनीय सबूत है ? कि तुमने लादेन को मार ही दिया है। लादेन अकेला अमेरिका का ही दुश्मन नहीं था वह पूरे विश्व का दुश्मन बन गया था और विश्व के सभी देशों को यह जानने का हक़ और जिज्ञासा है कि क्या वास्तव में लादेन मारा गया ?

पूरे
विश्व से एक और बुराई का अंत पिछले कुछ वर्षों से जारी है, और वह बुराई है "नास्तिकवाद" (कम्युनिज्म)। उसका खात्मा भी यहाँ होने लगा है। हालाँकि कम्युनिज्म का जो मूल सिद्धांत है समानता का, वह कोई गलत नहीं है, पर जिस तरह वह धर्म को अफीम मानते हैं और इस विश्व को केवल भोग की वस्तु मानते हैं वह अँधेरे में भटकने जैसा ही था और वो भटक कर लुप्त होने की स्थिति में हैं।
यही सिद्धांत हमारे वेदों और बहुत से शास्त्रों में हैं जिन्हें वैदिक कम्युनिज्म या आध्यात्मिक कम्युनिज्म कहा जा सकता है। इसमें मनुष्य अपनी मेहनत और ईमानदारी से कमाया हुआ धन; सेवा में, दान-पुण्य में लगा कर समाज,संस्कृति,प्रकृति की रक्षा में लगाता था; वह सनातन चला आ रहा है और अब तो उसकी महत्ता समझी जाने लगी है। और जिन नास्तिकों के द्वारा समाज को धर्म के नाम पर उलटी बातें समझा कर अँधेरे में रखा गया उनका भी खात्मे का दौर चल रहा है। जिसके लिए स्वामी रामदेवजी का विश्वव्यापी योग-आध्यात्म-और बुराईयों के विरुद्ध आन्दोलन चल रहा है।
भारत में भी इन नास्तिकों की विश्वसनीयता समाप्त होने लगी है । हालाँकि अभी कोई विकल्प न होने की स्थिति में उन्हीं नास्तिकों को जनता समर्थन दे रही है; जो मुख्य धारा से अलग हुए लोग हैं, जैसे; ममता बनर्जी को प.बंगाल में और कुछ औरों को और जगह । ये वैसे कोई ख़ुशी की बात नहीं है क्योकि ममता बनर्जी ईमानदार हो सकती है, सही व्यवस्थापक हो सकती है, पर ये उसी नास्तिकों के गिरोह से अलग हुयी एक सदस्य है; जिसने भारत में नास्तिकवाद के बोये बीज को जाने अनजाने पोषण दिया। और वह है "कांग्रेस"।

भारत
में नास्तिक-भोगवादी (कम्युनिज्म)विचारधारा अपनों के द्वारा उतनी सफल नहीं हो पाई जितना इस विचारधारा को कांग्रेस ने सफल बनाया। इस नास्तिक(कम्युनिष्ट) विचारधारा में घालमेल करके एक अलग विचारधारा “कांग्रेस” बन गयी, उसकी ही एक शाखा ये ममता बनर्जी हैं। इसलिए खुश होने की जरुरत नहीं है। ऐसा ही कमोबेश सभी राजनीतिक पार्टियों में हैं चाहे वो दक्षिण की हों या पूरब की। एक का असुर राज ख़त्म होता हैं दूसरे का आजाता है।

विचार धारा वही रहती है केवल चेहरे बदल जाते हैं। यही वो विचारधारा है; जो भारत के महापुरुषों के नाम से बगलें झांकती है, जो भारत के मानवीय मूल्यों को तोड़-मरोड़ कर केवल बुराईयों को देखती है,यही वो विचारधारा है जो भारत के सनातन सात्विक आध्यात्मिक मूल्यों के नाम पर बिदकती है। यही वो विचारधारा है जिसे भारत की वो सांस्क्रतिक विचार धारा, ढकोसला नजर आती है जिसके द्वारा भारत एक डोर में बंधा नजर आता है। इनका प्रयास उसी डोर को तोड़ने का रहा है। जातियों के नाम पर, प्रदेशों के नाम पर, सम्प्रदायों के नाम पर, समूहों के नाम पर उसी डोर को तोड़ने का प्रयास इन्होने आज तक किये हैं। इनकी साजिशों को आम आदमी नहीं समझ पाता। ये शिक्षा के क्षेत्र में,समाचारों के क्षेत्र में, समाजसेवा के क्षेत्र, में पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग सभी जगह हैं ।


इस विचार धारा वाले समाचार क्षेत्र के लोग अपनी और अपने विचार वालों की गलतियाँ छुपाने में लगे रहते हैं। इस समय प्रधान मंत्री ने जो अफगानिस्तान में बयान दिया है, वह भारत जैसे संप्रभु देश के प्रधान मंत्री को शोभा नहीं देता। उन्होंने वहां बहुत ही दयनीय मुद्रा में कहा कि,अपने दुश्मनों को समाप्त करने के लिए भारत में अमेरिका जैसी हिम्मत नहीं है।
ऐसी कायरता वाली बात केवल इस विचारधारा वाले लोग ही कर सकते हैं ,और इसी विचार धारा वाले लोग इसे कोई महत्व नहीं दे रहे। जब लाल बहादुर शास्त्री जी ने हुँकार भरी थी तो देश बहुत कमजोर था फिर भी उन्होंने जो जज्बा दिखाया वह अब के नेताओं में नहीं दीखता। सांप विषैला न भी हो तो अपने शत्रु को देख कर फन और फुफकार से वह उसे विचलित तो कर ही देता है। पर हमारे ये कायर प्रधान मंत्री तो अपने साथ पूरे देश को कायर समझ बैठे हैं।

पर;जैसा कि हर बार होता है इस देश का जन अपनी नींद से जगता है उसे कोई जगाने वाला आता है और फिर से भारत विश्व की महाशक्ति बन जाता है। यह भी वही युग चल रहा है। समय को कोई नहीं रोक पाया, जो होना है वह होगा; इस देश की संस्कृति जाग गयी है। वह चार जून से दिल्ली के रामलीला मैदान पर दिखेगा। इन नास्तिकों के होश फाख्ता हो रहे हैं कि अब कैसे मुहं छुपायें इस आन्दोलन से , सरकार परेशान है, वो सब भी परेशान हैं जिन्होंने इस आन्दोलन को दूसरे नंबर का घोषित कर दिया, उन्हें पिछले पांच वर्ष से चल रहा ये आन्दोलन नहीं दिख रहा उन्हें तो बहुत ही चतुराई से इस आन्दोलन से लोगों का ध्यान हटाने को चलाये गए जन लोकपाल बिल वाला आन्दोलन कैसे अपनी तीव्रता खोता जा
रहा है ये चिंता खाए जा रही हैं।

Sunday, May 1, 2011

धधकते अंगारे को कितनी देर कपडे से ढँक सकते हो

इस महान देश के अन्दर साजिशें करने में कुछ खानदानी नेताओं,पार्टियों और उनके समर्थकों ने इतनी महारत हासिल कर ली है कि उस सीमा तक सोचने में आम आदमी तो आम ही रह जाता है;
अपने
को खास और कुलीन समझने वाले लोग (बुद्धिजीवी) भी सोच नहीं पाते।

महानता
जहाँ सरकारें ही साजिशों में लिप्त हों, साजिशों से टिकी रहें, साजिशों से घोटाले और देश को लूटने का अभियान चलाती रहें, और एकाध साल से नहीं, कई शदियों से इस लूट को अंजाम दिया जा रहा हो फिर भी...... ।
अपना देश वाकई महान है कि टुकड़े हो गए पर जीने का जज्बा फिर भी न केवल बरक़रार है; अपितु दौड़ में सबसे आगे रहने का हौसला भी है।

कारण ?
हम सर्वव्यापी भगवान को मानते हैं, मंदिरों में चाहे किसी भी मूर्ति की पूजा करें या किसी भी देवी-देवता के नाम से उपवास करें, पर सबके पीछे एक ही भगवान होता है; जिसे सर्वव्यापी माना जाता है । ये हमारे संस्कार हैं और इन्हीं संस्कारों से संस्कृति बनी है।
और यही इस देश की ताकत है। पूर्व से पश्चिम तक,उत्तर से दक्षिण तक, एक डोर से भारत बंधा हुआ है। आज भारत में बसने वाले किसी भी धर्म-संप्रदाय के लोग कुछ सौ साल पहले अपने पूर्वजों की खोज करें तो सभी उस संस्कृति से अपने को जुड़ा पाएंगे ।
और यही भाव जन-जन में स्वामी रामदेव जी ने जाग्रत कर दिए।

साजिशों की पोल
ये सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतनाएं; जिन्हें वैसी ही महान शातिर साजिशों से (जैसी ऊपर लिखीं हैं कि कोई समझ ही न पाए) भुला दिया गया था। शिक्षा में साजिश, संस्कारों को समाप्त करने की साजिश,आध्यात्म को ख़त्म कर भौतिकवाद- अनैतिकता को बढ़ावा देने की साजिश, और तो और धार्मिक उपदेशों द्वारा गरीबी में संतोष करके जीवन चलाने की बात मानने की साजिश, और इन सबके लिए लोगों को आपस में लड़ाये रखने की ‘साजिश और महारत’, इन सबकी पोल स्वामीजी ने खोल दी है।

स्वाभिमान
भारतियों में स्वाभिमान जगा दिया, उन्हें धर्म का वास्तविक अर्थ बता दिया, आजादी का वास्तविक अर्थ बता दिया, संतोष का वास्तविक अर्थ बता दिया,उन्हें बता दिया है कि ग्रंथों में लिखा है कि चोर और बेईमान लोग हम पर राज न करें, और सबसे बड़ी बात; देश की एक सौ साढ़े बीस करोड़ आबादी को अब ये समझ में आ गया है कि ‘केवल पचास लाख अनैतिक और भ्रष्ट’ लोगों के कारण (जो हद से ज्यादा बेईमान हैं) पूरा देश नर्क बना हुआ है ।
सुख का अहसास
कितना भी पैसे वाला आदमी हो वो सुखी नहीं है क्यों कि खाने के लिए बिना मिलावट का कोई खाद्य पदार्थ
नहीं, चलने के लिए अच्छी सड़क नहीं जिस पर वह बिना हिचकोले खाए चल सके, स्वस्थ रहने के लिए वातावरण ठीक नहीं, अस्पतालों की आर्थिक लूट को वहन कर सकता है पर फिर भी आज किसी पर भी विश्वास नहीं कि कब उसके शारीर का कोई अंग निकाल लिया जाये, उसका कोई सम्मान नहीं कि कब कौन उसे डरा धमका दे या अपहरण करले ( अब तो ये नेताओं का व्यवसाय भी बन गया), और अब तो एक सबसे बड़ा खतरा जो इन पैसे वालों के लिए तो अधिक ही है कि अगर किसी पडोसी देश ने आक्रमण कर दिया तो कैसे अपने महलों-बंगलों और अपनी रक्षा कर पाएंगे। ये सब बातें अब देश के आम से कुछ खास लोगों की समझ में आ रहा है। जिसे जगाने के लिए स्वामी रामदेव जी ने पिछले पांच वर्षों में बहुत मेहनत की है। और लोगों में एक क्रांति का, और जाग्रति का भाव भर दिया है।

किंकर्तव्य विमूढ़ता
जिससे कुछ समय तक तो ये सारी महाशक्तियां एक दम हक्का-बक्का थीं। पर पिछले दिनों इन सबको एक अवसर मिल गया। इनके हाथ अन्ना हजारे लग गए। और जैसा कि इनमे होता है "अघोषित एकता"और "आपसी समझ" इतनी विकसित हो गयी है कि जो जहाँ पर है वहीँ से अपनी चालें चलेगा, और उसके दूसरे साथी अपने आप समझ जायेंगे कि अब उसे कौन सी चाल चलनी है। सबका उद्देश्य एक, लेकिन लड़ने के तरीके में एक दम से भिन्नता,कोई तो साथी बन कर पीठ में छुरा भौकने का काम करेगा, कोई सामने से आकार ध्यान बंटायेगा , कोई सरकार का डर दिखायेगा या धमकी देगा, कोई सरकार की तरफ से आश्वासन देगा...। बेचारा ! साधारण जन, अपनी दाल-रोटी में ही व्यस्त है,गरीब को कोई मतलब ही नहीं, वह तो चुनावों का इंतजार करता है कि उन दिनों कमसेकम पेट भरके खाना और दारु तो मिल जाती है।

साजिश
तो साहब इन्होने अन्ना हजारे,किरण बेदी जैसों को स्वामीजी से मिलने का अवसर उपलब्ध करवाया। उन्हें बीच में डाला
गया। क्योंकि इनकी अपनी विश्वसनीयता तो थी नहीं। कोई आर टी आई कार्यकर्त्ता बना फिर रहा था तो कोई गुड़ खाना चाहता था पर गुलगुलों से परहेज कर रहा था, इसलिए इनके इण्डिया वाले संगठन को कोई नहीं मुहं लगा रहा था। बहुत अच्छा अवसर था कि "भारत स्वाभिमान" के करोड़ों लोगों को अपना नाम चमकाने के लिए इस्तेमाल किया जाये मतलब एक तीर से कई निशाने, सरकार भी खुश, बुद्धिजीवियों और मीडिया का अहम् भी पूरा, जो अनैतिकता चाहते हैं वह भी खुश, जो धर्म के नाम पर अपनी अय्याशी चला रहे हैं वह तो बढ़-चढ़ कर आरोप लगाने के लिए हौसला पा गए, मतलब हर वो बुराई खुश, जो इस आन्दोलन को सफल होते नहीं देखना चाहती ।
अपने को बुद्धिजीवी समझने वाले और जिम्मेदार मानने वाले लोग, इसे स्वामीजी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा बता कर दुष्प्रचार करने लगे या भ्रमित होने लगे, एक और तरीका निकाला इन लोगों
ने, विशेषकर मीडिया से जुड़े लोगों ने और सरकार ने; कि चाहे कितना ही बड़ा आन्दोलन क्यों न हो (स्वामीजी द्वारा) नजरंदाज करो, वही किया भी। लेकिन इण्डिया वालों का आन्दोलन को खूब प्रचारित करो; जिससे भारत स्वाभिमान का आन्दोलन कम नजर आने लगे ।

गुलाम
ऐसा लगता है उनमे (बुद्धिजीवियों में से) से अधिकांस उन्हीं लोगों का दिया खाते हैं जिनके विरोध में ये जाग्रति आई है। इसी लिए इन्होने सम्पूर्ण बदलाव की बात को दबा कर केवल जन लोकपाल बिल पर ध्यान बंटाना चाहा । और इन्हींके बीच के लोगों ने उस पर और उसके सदस्यों पर आरोप
लगाये,ताकि विवाद सुर्ख़ियों में रहे, जिससे भारत स्वाभिमान का आन्दोलन जो सम्पूर्ण क्रांति का आन्दोलन है; की धार कुंठित हो जाये। सब सक्रिय हो गए किसी ने अन्ना को तैयार किया होगा, किसी ने इन सबको उकसाया होगा, किसी ने इस मामले को मीडिया में कैसे उछले इसकी रणनीति बनायीं होगी और कैसे उलझे ये मामला ,कोई इस पर भी काम कर रहा है । क्योंकि सबके हित प्रभावित हो रहे हैं जो संस्कृति-संस्कारों,आध्यात्म-नैतिकता के विरोधी हैं,जो राजनीतिक-सामाजिक,धार्मिक सुचिता के विरोधी हैं सब अघोषित रूप से एक हैं ।

क्या
ये धधकती आग को कपडे से ढँक पाएंगे ?
नहीं ! ये अंदाजा नहीं लगा पा रहे कि देश के कितने लोग स्वामी जी का साथ देंगे। इनके जन लोकपाल बिल का भविष्य तो वर्तमान की पी.ए.सी. में दिख गया है केवल लट्ठ और गोलियां नहीं चली बाकी सब कुछ हो गया।
इनका जन लोकपाल उसी तरह बन रहा लगता है जैसे किसी कांटेदार वृक्ष से कांटे फैलने से रोकने के लिए उस पर कपड़े से जाल की तरह बांध रहे हों । और स्वामी जी का चलाया आन्दोलन उस वृक्ष को जड़ से उखाड़
कर उसकी जगह स्वादिष्ट फलदार वृक्ष लगाने का है । जिसे स्वामीजी ने अपनी योग की अग्नि ऐसा धधका दिया है कि अब उसे दबाने की चेष्टा वैसे ही है जैसे आग को कपड़े से ढंकने की कोशिश करना । पर ये ऐसा नहीं कर पाएंगे अपितु ये आग उस कपड़े को जला कर और तेजी से धधक उठेगी ।