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Monday, August 22, 2011

आंधी में उड़ने के मजे... ले रहा हूँ पर ....... और जन्माष्टमी की शुभकामनायें

आजकल देश में आंधी चल रही है। दुनिया के कई देशों से होते हुए यहाँ अब पहुंची है। वैसे पहले भी आंधी का प्रयास हुआ; परपेशेवर हवाबाजोंनेपता नहीं क्यों”? इतनी हवा नहीं उड़ाई। उलटे जो उड़ी भी; उसे छितरा दिया। पर इस बार तो ! ........ मजा रहा है।
बड़े-बड़े "दरख्तों" की नाक में दम हो रखा हैकब उनकी जड़ें उखड जाएँ पता नहीं। छोटे-छोटे "बूटे" मस्ती में हवा को तेजी दे रहे हैं कि इन बड़ों के कारण हम बढ़ नहीं पा रहे। ये हटें तो कुछ खाद-पानी हम भी चूसें; "जमीन से" बहुत से बूटे और कुछ झाड़-झंखाड़ जो बड़े दरख्तों के आस-पास हैं घबराये हुए हैं; कि अगर ये गिरे तो उन्हें भी नुकसान पहुंचेगा; क्योंकि उनके तो सरपरस्त यही दरख़्त हैं। बड़ी से बड़ी आंधी में भी इन दरख्तों की वजह से वो बचते रहे है पर ये आंधी ! ........

हम भी आंधी में उड़े जा रहे हैं। क्या करें ? जरा शहरों से दूर हो गए; वरना हम भी न्यूज चैनलों पर दिन भर में दो चार बार तो दिख ही जाते। दुकानदारी का क्या है जिंदगी भर करनी हैआंधी में उड़ने का मजा फिर कब मिलेगा ?
वैसे दिल्ली से दूर रहने का हमें कभी मलाल नहीं हुआ, पर आजकल लग रहा है किटी.वी.पर आंधी देखने का मजा और है;आंधी में दिखने का मजा कुछ और एक औरमलालहो रहा है कि हम ऐसी जगह रहते हैं जहाँ कोई न्यूज चैनल वाले वहीँ पहुंचते न्यूज कवर करने को, (न्यूज दिखाने वाले तो तीन-चार चैनल हैंजो महंगाई बढ़ाने का कम पांच मिनट में कर देते हैं), अख़बार वाले उतनी अहमियत देते नहीं, इसीलिए यहाँ अभी तक आंधी नहीं पहुच पाई।
हम लोगों ने प्रयास किया कि आंधी की कुछ लहरें यहाँ भी पहुंचें पर पर लोग बड़े "बुद्धिमान" हैं वो हम पर ही ऊँगली उठा देते हैं; दुकानदार होकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध.... ! मानो इस देश में सबसे ज्यादा भ्रष्ट दुकानदार ही हो। पर एक बात की गारंटी मैं देता हूँ अगर कोई न्यूज चैनल वाले यहाँ भी होते तो फिर देखते कैसी आंधी यहाँ भी चलती। सब अपने गधे-घोड़ों को इकट्ठा कर टी.वी. में दिखने को आतुर होते। किसी नेतृत्व की जरुरत ही नहीं पड़ती। हर कोई अपनी मर्जी से अपने रिस्क पर शामिल होता; टी. वी. में दिख गया तो वा - वा; दिखा अपनी किस्मत, जैसे लॉटरी के टिकट में होता है। जो ढंग से "आंधी" बोल नहीं सकते उन बच्चों को लेकर माता-पिता पहुँच गए कि इनके कारण हमारा चेहरा दिख जायेगा चैनल पर। नए-नए तरीके इजाद होने लगे हैं आंधी में उड़ने को; ताकि टी. वी. पर दिख जाएँजो नहीं उड़ पा रहे वो इंतजार करें

इस आंधी को शुरू करने वालों ने इसमें दोबारा आंधी उड़ाने की गुन्जायिश छोड़ी हुयी है जैसे आजादी के समय तत्कालीन नेताओं ने दोबारा आजादी के आन्दोलन के लिए गुन्जायिश छोड़ दी थी। तभी तो अब नई आजादी का आन्दोलन करना संभव हुआ। लेकिन इसमें भी गुन्जायिश छोड़ने की बात पहले ही तय हो गयी हैलोगों को समझा दिया गया है कि भ्रष्टचार केवल साठ प्रतिशत कम होगा बाकी चालीस तो जीने के लिए आवश्यक है। फिर से कुछ सालों तक "कुछ खानदान" भावी पीढ़ियों के लिए धन एकत्र करेंगे और फिर कोई आंधी उन्हें उड़ा कर कहीं पटक देगी और वे चैन से लूटे हुए धन से कहीं अय्याशी करेंगे
इससे सब खुश हैं; जो नहीं हैं वो कौन सा टी. वी.पर दिख रहे हैं। टी.वी. पर या तो विरोधी दिखेगा या मैदान में नाचने वाला समर्थक
खैर
साहब एक बात तो समझ गयी कि इस युग में बिना टी. वी.
न्यूज चैनल के कोई आंधी नहीं उड़ाई जा सकती। उनकी नब्ज पकड़ो, उनको "टैकल" करना आना चाहिए, ये देखना जरुरी है कि तुम्हारी उड़ाई जा रही आंधी से उनके हितों पर चोट तो नहीं लग रही। हाँ ! मानसिकता में भी एक रूपता होनी आवश्यक है; अब तो ऐसी आंधियो से डर भी लगता है कोई भी कैसी भी आंधी उड़वा सकता है। विज्ञापन का दौर है नाजो दिखेगा बिकेगा , बिकेगा तो और ज्यादा दिखेगा बस उड़ गयी आंधी शुरू में एकाध न्यूज चैनल वालों को पकड़ो; खिलाओ-पिलाओ दोस्ती बनाओ; फिर तो अन्य सभी में अपने आप होड़ लग जाएगी। और आपकी आंधी उड़ने लगेगी। बाकी कंप्यूटर जीमेल,फेशबुक इत्यादि का भी पूरा ज्ञान होना चाहिए। इसमें लोगों की टी. वी. पर दिखने की अभिलाषा आपकी सहायक होगी।
और हाँ ! एक बात तो मैं भूल ही गया, कोई ऐसा व्यक्ति भी होना चाहिए जिसका दिल-दिमाग बच्चों जैसा होजो तुम्हारी बातों को मान ले, जिसकी थोड़ी बहुत पहचान जनता में हो,दिखने में मासूम स लगे, टी.वी.पर दिखाना पड़ेगा न ........
लो मैं तो इस आंधी के फेर में जन्माष्टमी की शुभकामनायें देनी भी भूल गया सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें

Monday, August 15, 2011

Can we proud on “those indians” ?

वर्तमान समय "दिखावे" (फैशन) का चल रहा है,जिस बात का चलन हो जाये वह चलेगी फिर चाहे वह असुविधा करे या हानि पहुंचाए। "विज्ञापन का दौर है ना"जो उछलेगा वो दिखेगा।
आज के समय में मनुष्य कितना सुविधेच्छु,संक्षीप्तेच्छु, (शॉर्टकट) तुरंतेच्छु (इंस्टेंट) हो गया है;देख कर कुछ अंदाजा नहीं लगता कि और दस-बीस साल बाद क्या होगा ? कोई बात इन गुणों से छूटी नहीं हैबड़ा आश्चर्य होता है; जब हम यही गुण देशभक्ति में देखते हैंक्या कहें ? कुछ कह भी नहीं सकतेक्योंकि ये उसी तरह से है; “मम्मी.. भूख लगी; बस दो मिनट…..” और नूडल्स तैयार, खाओ भूख मिटाओदोबारा भूख लगे; उसके लिए दो-चार पैकेट और रख लो उबालो खा लो
इस तुरंत-फुरंत(इंस्टेंट) वाले तरीके में कोई यह नहीं देखता कि केवल स्वाद-और जल्द बाजी के चक्कर में वह भोजन के उन गुणों से वंचित रह गया जिनकी शारीर को आवश्यकता होती हैएक सम्पूर्ण भोजन में जो पोषण मिल सकता है वो एक उबाल दिए नूडल्स में कहाँ ? लेकिन उसमे "मम्मी"को मेहनत पड़ेगी बच्चे को इंतजार
लेकिन; आज केपिज्जा बॉयजको कौन समझाए ? बच्चे तो बच्चे; मम्मियों को कैसे समझाएं उन्हें भी तो सुविधाजनक लगता है फोन करो पिज्जा हाजिर कुछ सालों बाद चाहे मोटापे और अन्य बिमारियों से पीड़ित होकर कुछ भी खा पायें पर पिज्जा का स्वाद तो भरपूर ले लिया तब इन्हें भारतीय मशाले और भोजन बबाल लगता था लेकिन अब भी इन्हें वह बबाल लगता है क्योंकि डाक्टर ने परहेज बता दिया है
"ऐसा ही कुछ" आज के दौर में देशभक्ति और आंदोलनों के विषय में होने लगा हैहम एक हाथ से "विदेशी हट"के बाहर पिज्जा खाते दूसरे हाथ से ड्रिंक ( सोफ्ट या हार्ड) पीते हुए बाईकों ( वो भी विदेशी) पर बैठकर एक समुह में किसी विदेशी धुन पर हिलते हुए भी देशभक्त कहला सकते हैंऔर टी वी में छा सकते हैं क्योंकि वो भी इसी तरह के देश भक्त हैं ; हमारे ही बीच से तो निकले हैं
इन्हेंभारतीयहोने की बात बेकार लगती हैया ये उसे समझना नहीं चाहते, क्योंकि उसे समझने में समय भी लगेगा मेहनत भी लगेगीइसलिए इन्डियन कहलाना पसंद करते हैंहमारे क्रांतिकारियों(जिन्होंने जान दे दी) की बातें इन्हें चलन से बाहर (आउट डेटड) वाली लगती हैं
ये विदेशी संक्षिप्त परिधान पहने हाय-हाय गर्ल” “हैलो बॉयऔर इनके सम्बन्धी मोमबत्ती जुलुस निकालने में बड़े जागरूक होते हैंहमारे एक ब्लोगर मित्र ने तो इन्हें नाम दिया हैमोमबत्ती ब्रिगेड”। इनकी खासियत ये है कि इनके कुनबेदार मीडिया में सभी जगह घुसे हुए हैंइनके देशभक्ति गाने भी गिटार-मिटार के साथ कुछ-कुछ अंग्रेजी धुनों में लिपटे-चिपटे,जैसे च्युंगम चबाते हुए बोल रहे हों, होते हैं
अब आज केचाउमीन चौपरऔरड्रिंक-पोटप्रकार के युवाओं को कुछ समझा भी नहीं सकते क्योंकि बात तो देश भक्ति की कर रहे हैंये जरुरी थोड़े ही है कि उन्हें संस्कृति-संस्कार,स्वदेशी-विदेशी खाद्य-अखाद्य,स्वास्थ्य शिक्षा की बाते पसंद आयेंउन्हें तो ये सब उबाऊ बातें लगती हैं ; कौन सुबह पांच बजे उठे और "मुह धोये" फिर दंड बैठक पेले ? उन्हें तो आठ बजे उठकर आधुनिक जिम में जाना किसी अंग्रेजी धुन पर ऐसी मशीन पर खड़ा होना या लेटना भाता है जिसमे इन्हें कुछ करना पड़ेरही शारीर सौष्ठव की बात; तो कई प्रकार की गोलियां दुकानों पर मिल जाती हैं
अब ऐसे लोगों के लिए सुविधाजनक आन्दोलन भी होने लगे हैं. इन आन्दोलनों से मीडिया का भला क्योंकि विदेशी कम्पनियों और सरकारों के विज्ञापनो से हो रही कमाई कम होने का खतरा नहीं, इनसे विदेशी कम्पनियां खुश; क्योंकि उनका विरोध करने वाले नेपथ्य में धकेले जा रहे हैंइसके लिए उन्हें कुछ खर्च भी करना पड़ रहा है तो क्या, ऐसे आन्दोलनों से नशा व्यवसायी खुश; वरना उनके पेट पर भी लात लग रही थीऐसे आन्दोलनों से दवा चिकित्सा माफिया भी खुश; ये उनका भी विरोध नहीं करतेऐसे आन्दोलनों से खाद और कीट नाशक कम्पनियां भी खुश उनका भी बाजार "वास्तविक बदलाव" वाला आन्दोलन बंद करे दे रहा है, शिक्षा माफिया नहीं चाहते कि अंग्रेजी का वर्चस्व ख़त्म हो वो भी ऐसे सुविधाजनकएक कानून वाले आन्दोलनको उछालना चाहते हैंसबसे बड़ी बात पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति को श्रेष्ठ समझने वाले नहीं चाहते कि भारत का स्वाभिमान वाला आन्दोलन सफल हो;क्योंकि उनके लिए तो ये संस्कृतियों का युद्ध है अगर इसमें भारत सफल हो गया तो सम्पूर्ण विश्व में उसीका डंका बजेगाजैसा दो हजार वर्ष पूर्व होता थावो नहीं चाहते कि भारतीयों की हीन भावना समाप्त हो जाये
उसमे हमारे देशभक्तपिज्जा बॉयजऔरहाय-हाय गर्लभ्रमित हो रहे हैंक्योंकि वे अभी इण्डिया और भारत का अंतर नहीं जानतेकुछ तो मानते हैंबाबा रामदेव जी ने सारे मुद्दे एक साथ उठा दिए हैं; खिचड़ी बना दीएक एक कर मुद्दे उठाने चाहिए थे, जैसे हमारे पास चार-पांच सौ साल का समय हो कि लड़ते रहो लड़ते रहो
कारण वही है समझना चाहते ही नहीं या "इन्डियन" मानसिकता से ग्रसित हैं "भारतीय" लोग तो जानते हैं; खिचड़ी की पौष्टिकता क्या होती हैये उस प्रकार से तुरंत नहीं बनती जैसे नूडल्स तैयार हो जाते हैं लेकिन उतनी देर भी नहीं लगाती जितना अलग-अलग खाना बनाने में लगती है
अब इन्हें लगेगा कि हम विरोधी हैं , हम विरोधी नहीं हैं समर्थन तो हमारी मज़बूरी है; भ्रष्टचार केवल एक बुराई है हम तो सभी बुराईयाँ खत्म करने वाला आन्दोलन चला रहे हैं;"व्यक्ति का अपना सुधार फिर राष्ट्र निर्माण"। फिर भी जो देशभक्त है बेशक एक ही मुद्दे पर लड़ रहा है हम उसके साथ हैं; और अन्ना(&कंपनी) देशभक्त तो हैं ही