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Friday, August 7, 2009

चोर की दाढ़ी में तिनका




चोर की दाढ़ी में तिनका … ? या ये कहना चाहिए की चोरों की दाढियों में तिनका ,
संसद में चार सौ बीस नंबर की सीट नहीं होगी , क्योंकि जो भी उस सीट पर बैठेगा उस पर चार सौ बीसी का ठप्पा लग जाने का डर है ,अब
जो चोरी छुपे चार सौ बीस हो वह खुलेआम क्यों चार सौ बीस कहलाये ,
इसलिए इस नंबर को ही हटा दिया। सच का सामना बिना पोलीग्राफ मशीन लगाये हो गया ।

महंगाई का राज

जी हाँ महंगाई किसलिए बढ़ रही है ,इस बारे में जो कुछ मेरी सूक्ष्म बुद्धि में आया , सोचा आपको भी बता दूँ ,
कुछ समय पहले बड़ी-बड़ी पूंजीपति हस्तियों द्वारा रिटेल स्टोर्स की
(दुकानदारी की )शुरुआत की गई थी , जिसका विरोध भी हुआ था ,और एक साल बाद ही इनमे से ज्यादातर बंद हो गए पता नहीं क्यों ?
पर, मैं एक बात जो कई सालों से देख रहा हूँ ;वो ये, कि ये पूंजी पति घराने या विदेशी कम्पनियां जिस भी सामान की (जो जीने के लिए जरुरी हो) दुकानदारी शुरू करते हैं उसमे ये सफल हो पायें या नहीं पर उन वस्तुओं के दाम कुछ समय बाद, बढ़ ही जाते हैं ,एक और बात, कि उस वस्तु की उत्पादन के कारण या अन्य किसी भी कारण से जबरदस्त कमी हो जाती है । वर्तमान की महंगाई भी मुझे ऐसी ही लगती है। ये एक साजिश है और सरकारें इसमें शामिल हैं । इन कम्पनियों और पूंजीपतियों ने बाजार से ज्यादातर सामान जमा कर लिया है ,अब मनमाने दामों पर बेच रहे हैं । सरकार भी जनता की तसल्ली के लिए थोड़े बहुत दाल-चावल का इंतजाम कर बेचने का ड्रामा कर रही है ।

टेंशन पॉइंट के चर्चित पोस्टर

उत्तराखंड में नौवीं कक्षा में पढने वाले छात्र प्रधान मंत्री का नाम नहीं बता पाए कुछ हिन्दी के शब्द नहीं लिख पाए ये उत्तराखंड की शिक्षा की पोल है जिसके अध्यापक वेतन बढ़ाने के लिए हड़ताल पर हड़ताल करने केलिए आम जनता की नजरों में गिर चुके हैं और जिस काम के लिए वेतन लेते हैं उसका हाल भी सभी ने देख लिया है ,दूसरी तरफ़ सरकार का भी तरीका ये है कि वह पढाई के लिए छापा नहीं मारती बल्कि स्कूल में भात ठीक तरीके से बनता है या नहीं इसके लिए छापा मारती है इस पर एक पोस्टर (मेरा ) यहाँ तिराहे पर चर्चित हो रहा है ।

दूसरा ............ कुछ दिन पहले उत्तराखंड सरकार के आयोग ने उत्तराखंड की राजधानी गैरसैण नहीं बन सकती का निर्णय दिया ,जबकि जनभावनाओं में गैरसैण ही सबसे उपयुक्त स्थान है ,पर अगर मनमर्जी न चलाये तो
सरकार किस बात की उसके लिए भी ये पोस्टर है

Wednesday, August 5, 2009

अवैध कब्जा कर धर्मस्थल न बनायें


ये तो हमारे मानवाधिकार का हनन है।
आख़िर जब हमारा मन रास्ता चलते मन्दिर के आगे सर झुकाने को करेगा तो क्या हम , अक्षर धाम मन्दिर जायेंगे ?
ये आदमी का मन है हर समय डरा हुआ रहता है क्या पता कब कोई दुर्घटना हो जाए या कब किसी पुलिस वाले को गलतफहमी हो जाए , कब कोई बदमाश अपनी बाइकों से हमें ठोकते हुए निकल जाएँ। मतलब, कुछ भी हो सकता है, अब जो होना है वो तो होगा ही लेकिन हर दस कदम पर अगर कोई धर्मस्थल मिल जाए तो सर झुकाने में कुछ तसल्ली तो होती है । तो ये तो हमारे मानवाधिकार का हनन है । वैसे भी जितने बड़े धर्मस्थल में जायेंगे उतना बड़ा दान देना पड़ेगा लेकिन इन छोटे –छोटे धर्मस्थलों में तो मामूली सी भेंट से काम चल जाता है हमें लगता है कि हमें भी उतना ही पुण्य मिल गया जितना किसी को किसी बड़े धर्मस्थल में एक करोड़ रुपये देकर मिला होगा । फ़िर उस बेरोजगार आदमी की भी तो सोचो जो बेचारा उससे कुछ कमाकर उसमे से कितनो का पेट भरता है (पुलिस वाले,व छुट्भायिये नेता टाईप के गुंडे) तब उसके परिवार का खर्चा चलता है । क्या उसे बेरोजगार कर दोगे । इसके बदले हर चौराहे पर एक धर्म स्थल होना चाहिए लाल बत्ती की जरुरत ही नही रहेगी चौराहे पर चौमुखा धर्मस्थल होना चाहिए ,लोग गाडियां रोक कर मत्था झुकायेंगे कुछ दान देंगे जिससे दुर्घटनाएं भी कम होंगी और पैसा भी जमा होगा । अभी और सुझाव देता पर क्या करूँ मैं लिखने में बहुत आलसी हूँ । फ़िर कभी बताऊंगा हाँ मेरे मानवाधिकार का उल्लंघन मत करो । इन्हें बनने दो तभी तो राजनीति करने को कुछ होगा।

धौनी या किसी की भी शान

धौनी को चाहिए शस्त्र लाईसेंस , ओह, सौरि ; केवल लाईसेंस नहीं शस्त्र भी चाहिए । सरकार ने जो सुरक्षा दी है उससे इनकी शान थोड़े ही झलकती है। वह तो केवल नेताओं की हैसियत दर्शाने के लिए होती है ।
इनकी शान के लिए इन्हें निजी शस्त्र की जरुरत है ,जैसे शान दिखाने के लिए ये
गाड़ी लाये हैं , एक करोड़ की ,ऐसे ही महंगा वाला शस्त्र खरीदेंगे ।
दिखाने के काम आएगा ,ये नहीं भी दिखाना चाहेंगे ,पर चैनल वाले जी हजूरी करके इनसे इनकी शान दिखाने का अधिकार प्राप्त कर लेंगे
भाई उनकी तो रोजी-रोटी ही बड़े आदमियों की शान दिखाना है । पुरे-पुरे दिन इनकी शान दिखायेंगे । आम आदमी भी इनकी इस शान को देखने में अपनी भूख –प्यास सब भूल जाता है ,जो आम आदमी से कुछ ऊपर होता है (इन्हीं की श्रेणी का ) वह इनकी किस्मत देखकर जल भुन जाता है,और जो आम आदमी से नीचे होता है(जो भूखा रहता है ) वह मन ही मन गाली देता है। कुछ सोच कर,
हमारा टेंशन पॉइंट केवल ये बोल पाता है कि आदमी कुछ पा लेने के बाद अपने को अपनों से ( आम आदमी से) क्यों इतना दूर कर लेता है,क्या ये अपनेआप अपने दुश्मन नहीं बना लेता है... ?

Monday, August 3, 2009

" अंधा देखै-मूक पुनि बोलै "


आज स्वामी रामदेव द्वारा बताये गये प्राणायाम से" ये बात सच" हो रही है
न केवल अंधा देख रहा है गूंगा बोल रहा है , अन्य भी जितने रोग हैं वह भी ठीक हो रहे हैं , अब , उनका क्या होगा जो लाखों रूपये लगा कर डॉक्टर बन रहे हैं , उनके उस “बिजनेस हब का क्या होगा जिसे वे नर्सिंग-होम कहते हैं”। बहुत लूट लिया लूटने वालों ने , अब तो बाबा रामदेव ने हर मोर्चे पर जागरूकता जगानी शुरू कर दी है । हजारों लाखों लोग इससे लाभान्वित हो रहे हैं। सुर प्रक्रति के लोग तो समर्थन में हैं
लेकिन असुर प्रकृति के लोग एकदम सुन्न हो गए हैं न विरोध कर रहे हैं ,समर्थन करना उनकी प्रक्रति नहीं हैं ।

Sunday, August 2, 2009

भारतीय जजो डरो मत

जजो तुम संपत्ति घोषित करने में क्यों घबरा रहे हो..... ?
बिना बात के अपने को संदेह के दायरे में ला रहे हो ।
डरो मत संपत्ति घोषित करने के बाद भी भ्रष्टाचार करने पर रोक थोड़े ही लगती है ।

क्या हमारे नेता लोग अपनी संपत्ति घोषित नहीं करते ?
फ़िर भी भ्रष्टाचार करते हैं , बस,उनसे (नेताओं से ) कुछ हथकंडे सीखने पड़ेंगे ।
अपने पुत्र-पुत्रियों को एडजस्ट करना पड़ेगा ।( बूटा सिंह व अन्य की तरह)
और ज्यादा कोई परेशानी की बात नहीं है।

बल्कि भ्रष्टाचार में और सहूलियत हो जायेगी । इसलिए डरो मत।
(नेताओं का काम आसान हो जाएगा ,जो भी उनके विरुद्ध निर्णय देगा उस पर आरोप लग जाएगा।)

Saturday, August 1, 2009

भविष्यवाणी

पहले कमाई व पहचान के लिए कम कपडों वाला नाच अजीबोगरीब झटकों वाला ।
लोग उससे ऊब गए, ऊबना ही था, कोई कब तक लगातार शराब पी सकता है या तो बीमार पड़ेगा या ऊब जाएगा, एक और काम करेगा कि उससे तेज नशा ढूंढेगा जो की उपलब्ध है। ऐसा ही राखी के साथ हुआ ,अब फिल्मों में आईटम सोंग नहीं आ रहे, तो कड़की आ रही थी इसलिए स्वयंवर की सूझ गई,अच्छी कमाई हो रही है.कुछ समय बाद फ़िर कमाई की जरुरत पड़ेगी तो एक सीरियल आएगा राखी का तलाक ।
मतलब
“कमाई के लिए स्वयंवर कुछ समय बाद कमाई के लिए तलाक”

ये दुनिया ,अगर अब छूट भी जाए तो क्या है

बूटा सिंह “अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष पूर्व केन्द्रीय मंत्री व कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में शुमार” का लड़का घूस (नहीं-नहीं घूस तो छोटी-मोटी होती है इसे क्या कहना चाहिए समझ नहीं आ रहा ) लेते पकड़ा गया सी.बी.आई को बड़ी मोटी मुर्गी या मुर्गा (वैसे भी काफी मोटा है) हाथ लगा है।
मैं तो समझता हूँ कि इस मोटापे का राज भी ये ही होगा कि मोटा खाने की आदत पड़ गई होगी , अकेले खाने की आदत पड़ गई होगी ,क्योंकि ऊपर तो किसी को देना नहीं पड़ता होगा ऊपर डैडी जो हैं । डैडी ही अब पकड़े जाने पर काम आयेंगे ,आयेंगे क्या आने लगे हैं।
पुत्र मोह में इतना बड़ा महाभारत हो सकता है तो ये तो मामूली सी (इन मोटी आसामियों के लिए ) रकम का मामला है। थोड़ा बहुत ले-दे कर काम निकाल लेंगे । और सब कुछ छोड़ना भी पड़ा तो क्या ? इतना कमा लिया है कि कई जन्मों तक बैठे-बैठे खायेंगे ।

"जब अंग्रेज बोलें तब हम निहाल"

जी हाँ यही है हमारे देश का हाल , अब देखो न योग-आयुर्वेद को हमारे यहाँ आज से पहले भी कई योगी व संत प्रतिष्ठा दिला चुके हैं, और वर्तमान में तो बाबा रामदेव लगभग पुरी दुनिया में छाये हुए हैं, लेकिन हमारे यहाँ के मीडिया (इ.और पी. मीडिया) को वह तभी नजर आते हैं जब कोई विवाद हो ,उस समय ये बाबा रामदेव हो या कोई अन्य उन्हें अपने स्टूडियो में बुलाकर इंटरव्यु करवाते हैं लेकिन अंदाज ऐसा होता है जैसे हँसी उडानी हो ।
पर उसी योग के विषय में किसी विदेशी ,वो भी अंग्रेज ने कोई साधारण सी बात कह दी, तो इनके लिए वह प्रकाशनीय और प्रसंसनीय हो जाती है । वह इनके लिए बड़ी ख़बर हो जाती है ,उसे ये भीगे हुए अल्पवस्त्रों में महिला को दिखाते हुए (फोटो) समाचार भी काफी बड़ा बनाकर छापते हैं।
इनकी इस मानसिकता से इन्हें प्रत्यक्ष में तो लगता होगा कि, कोई हानि नहीं हो रही ,लेकिन आम जनता की नजर में "ये" और "इनका संस्थान" उपहास का पात्र बनते हैं । जिससे इनकी विश्वसनीयता कम होती है।
अब देखिये न स्वामी रामदेव को आज भारत में कौन नहीं जानता, भारत में ही नहीं विदेशों में भी योग-आयुर्वेद के लिए बाबा ने भारत का नाम बहुत ऊँचा किया है, लेकिन हमारे देश के मीडिया (किसी भी) ने केवल एक छोटे से समाचार से ज्यादा महत्त्व नहीं दिया ,जबकि फिल्मी समाचार पूरे-पूरे दिन चलते हैं ,किसी हीरो-हिरोईन की शादी में तो ये,बिन बुलाये पहुँच जाते हैं फ़िर पिटते भी हैं पर उसे फ़िर भी निर्लज्ज बनकर दिखाते हैं। तर्क ये कि उन्हें जनता देखना चाहती है,पता नहीं इन्होंने जनता से कब पूछा, कि तुम क्या देखना चाहते हो ।
दरअसल इन्हें पता है कि भारत की जनता को जो दिखाओ वो वही देखेगी ,फ़िर सर्वे भी तो इन्हीं ने करने-करवाने हैं ये सिद्ध कर सकते हैं । पर कितने दिन..?
घड़ी की सुईयों को कोई नहीं रोक सकता इन जैसे लोगों को भी शर्मिंदगी का अहसास होगा।