इन्हेंसोचनाचाहिए , जिसमुद्देकोलेकरइनशर्मीलेलोगोंकोकलंककीहदतकशर्मआयी, उसीमुद्देपर"पिछलेपाँचसौसालोंसेबहुतसेलोगोंकोशर्मआरहीथी"। सो उनहोंने उस शर्म को धो दिया, वरना वह भी कलंक का अनुभव कर रहे थे।
और वास्तव में शर्म आनी भी ऐसी ही बातों के लिए चाहिए थी,लेकिन इनलोगोंकी"शर्मभीबड़ीबेशर्महै" पिछले साठ-बासठ सालों से ऐसी बातों के लिए नहीं आ रही,जैसे स्वतन्त्र होने के बाद भी हम विदेशियों द्वारा बनाये कानून को लागू किए हुए हैं, जैसे स्वतन्त्र होने के बाद भी हम विदेशियों द्वारा बनाई गई शिक्षा पद्दति से पढ़ने-पढ़ाने को मजबूर हैं,जैसे हमारी अपनी सशक्त भाषाएँ होने के बाद भी हम विदेशी भाषाओँ में पढ़ने को अपना सौभाग्य समझने लगे हैं, जैसे न्याय व्यवस्था में भी हम विदेशी गुलामी को नहीं त्याग सके, इसी तरह के और भी बहुत से कारण शर्म करने के हैं।
इन पर शर्म करने की किसी को फुर्सत नहीं है। तारीफकीबातयेहैकिउनलोगोंकोभीनहींहैजिन्हेंअयोध्यामुद्दा याईमारतकलंकलगरहाथा।
तब इन्हें शर्म नहीं आती जब हमारे खिलाड़ी (क्रिकेट के) विदेशी टटपुन्जिये पत्रकारों द्वारा बहिष्कृत कर दिए जाते हैं कि उन्होंने अपनी भाषा में क्यों बोला।
ऐसेहीउनखिलाडियोंकेऊपरभीइन्हेंशर्मनहींआतीजोचारपैसेमिलनेकेबादअंग्रेजीकोहीअपनीपैतृकभाषासमझनेलगतेहैं। जैसे ये उनकी पत्रकारिता के गुलाम हो गए हों।
आख़िरशर्मकाभीकोईमानदंडतोहोनाहीचाहिए, शर्मीले बनो तो ऐसी सभी बातों के लिए शर्म आनी चाहिए जिनसे देश की समाज की आँखे नीची होती हों।नंगापन फैलतेदेखतुम्हेंशर्मनहींआती,उल्टाउसेसहीठहरातेहो,क्योंकि "कुछ शर्मीले जो ताकतवर भी थे"ने उन्हें पीट दिया। पीटने पर शर्म आई तो ठीक लेकिन नंगापन ठीक तो नहीं।
तो जनाब शर्म करो पर कुछ सोच कर। शर्म करने के कुछ वास्तविक मुद्दे भी हैं उनपर शर्म करो, अगर वास्तविक शर्मीले हो तो। क्योंकि उन मुद्दों पर हो सकता है कि वोट न मिले।केवलऐसेमुद्दे परक्योंशर्मकरतेहो,जिसपरतुम्हेंभीवोटमिलेंऔरउन्हेंभीजिन्होंनेतुम्हारेअनुसारशर्मकरनेकाकामकियाहै।
2. वो अधिकारी…?जिन्होंने अंग्रेजी चश्मे पहन कर नेताओं और दलालों के साथ मिल कर इस देश को लूट कर लगभग सौ लाख करोड़ रूपये विदेशी बैंकों में जमा किए हुए हैं।
3. वो डॉक्टर…? जिन्होंने शैतान के जैसे काम करने और धन कमाने को ही अपने जीवन की सार्थकता समझ लिया हो।