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Thursday, December 10, 2009

"मायावती का बंगला"


सुना आपने … मायावती अपने बंगले को बुलेट प्रूफ बनवा रहीं हैं

रुपये खर्च होंगे पचास करोड़,

बंगला बनने पर खर्च आया होगा “कुछ सौ” करोड़ रुपये।

ऐसा बंगला बनाने का कारण…. सु-श्री मायावती का डर… .

डर…? क्या उन्होंने ऐसे कर्म किए हैं, कि उन्हें डरना पड़े ?

भई... कई बार मुख्यमंत्री रहीं हैं, इतना पैसा कमाया है, अब उसे सँभालने के लिए बुलेट प्रूफ बंगला होना जरुरी है।

बिना बुलेट प्रूफ बंगले में कोई भी सेंध लगा लेता।

खैर… छोडो... आगे बात करते हैं।

बंगले की क्या गारंटी…? अरे महाराज बंगले की गारंटी तो होगी,

पर… स्वयं मायावती की क्या गारंटी…….. ?

क्या संसार में केवल किसी के मारने से, या बम-बंदूक से ही लोग मरते हैं ?

Tuesday, December 8, 2009

"शर्म"(आख़िर शर्म का भी कोई मानदंड तो होना ही चाहिए)

आज कल बहुतों कोशर्म रही है। बहुतशर्मीलेहो गए हैं,इतना किकलंककी हद तकशर्मानेलगे हैं। इन जैसों की शर्म ने अयोध्या मुद्दे की रिपोर्ट पिछले सत्तरह साल से बनने ही नहीं दी, लिब्राहन साहब को शर्म जाती थी,कि क्या लिखूं-क्या पेश करूँ।

वैसे बहुत अच्छे लक्षण हैं हमारे देश के,हमारे यहाँ के लोगों, खासकरनेता लोगोंको,अगर शर्म आने लग जाए तो देश में कुछ सुधार होने लगे। जब से शर्म आनी कम हो गई है तभी से देश में बुराईयाँ-भ्रष्टाचार बढ़ने लगे।

इन्हें सोचना चाहिए , जिस मुद्दे को लेकर इन शर्मीले लोगों को कलंक की हद तक शर्म यी, उसी मुद्दे पर "पिछले पाँच सौ सालों से बहुत से लोगों को शर्म रही थी"। सो उनहोंने उस शर्म को धो दिया, वरना वह भी कलंक का अनुभव कर रहे थे।

और वास्तव में शर्म आनी भी ऐसी ही बातों के लिए चाहिए थी,लेकिन इन लोगों की "शर्म भी बड़ी बेशर्म है" पिछले साठ-बासठ सालों से ऐसी बातों के लिए नहीं आ रही,जैसे स्वतन्त्र होने के बाद भी हम विदेशियों द्वारा बनाये कानून को लागू किए हुए हैं, जैसे स्वतन्त्र होने के बाद भी हम विदेशियों द्वारा बनाई गई शिक्षा पद्दति से पढ़ने-पढ़ाने को मजबूर हैं,जैसे हमारी अपनी सशक्त भाषाएँ होने के बाद भी हम विदेशी भाषाओँ में पढ़ने को अपना सौभाग्य समझने लगे हैं, जैसे न्याय व्यवस्था में भी हम विदेशी गुलामी को नहीं त्याग सके, इसी तरह के और भी बहुत से कारण शर्म करने के हैं।

इन पर शर्म करने की किसी को फुर्सत नहीं है। तारीफ की बात ये है कि उन लोगों को भी नहीं है जिन्हें अयोध्या मुद्दा या ईमारत कलंक लग रहा था

इन सब बातों के साथ अब तो वर्तमान में भी इतने मुद्दे शर्म करने को हो गए है, उन पर किसी नेता को शर्म नही है बिल्कुल बेशर्म होगये हैं, जैसे नेतागिरी बेईमानी का प्रतीक बन गई है,जैसे नेतागिरी गुंडागर्दी का पर्याय बन गई है

ये कितनी बड़ी शर्म और कलंक की बात है कि हमारे देश का सौ लाख करोड़ रूपये विदेशी बैंकों जमा हैं जबकि सैकड़ों बैंक हमारे देश में हैंक्या सोचते होंगे विदेशी हम भारतीयों के बारे में अपने घर में चोरी करके पड़ोसी का घर भर रहे हैं

तब इन्हें शर्म नहीं आती जब हमारे खिलाड़ी (क्रिकेट के) विदेशी टटपुन्जिये पत्रकारों द्वारा बहिष्कृत कर दिए जाते हैं कि उन्होंने अपनी भाषा में क्यों बोला।

ऐसे ही उन खिलाडियों के ऊपर भी इन्हें शर्म नहीं आती जो चार पैसे मिलने के बाद अंग्रेजी को ही अपनी पैतृक भाषा समझने लगते हैं। जैसे ये उनकी पत्रकारिता के गुलाम हो गए हों।

इन बेशर्म शर्मिलों को तब भी शर्म नहीं आती जब इनका कोई बिरादर अपने लिए करोड़ों रूपये का महल बनवाता है फ़िर उसे बुलेटप्रुफ भी करवाता है,जैसे वो पैसा..........या जैसे बुलेटप्रुफ बनवा कर ये अजर-अमर हो जायेंगे

आख़िर शर्म का भी कोई मानदंड तो होना ही चाहिए, शर्मीले बनो तो ऐसी सभी बातों के लिए शर्म आनी चाहिए जिनसे देश की समाज की आँखे नीची होती हों। नंगापन फैलते देख तुम्हें शर्म नहीं आती,उल्टा उसे सही ठहराते हो,क्योंकि "कुछ शर्मीले जो ताकतवर भी थे"ने उन्हें पीट दिया। पीटने पर शर्म आई तो ठीक लेकिन नंगापन ठीक तो नहीं।

तो जनाब शर्म करो पर कुछ सोच कर। शर्म करने के कुछ वास्तविक मुद्दे भी हैं उनपर शर्म करो, अगर वास्तविक शर्मीले हो तो। क्योंकि उन मुद्दों पर हो सकता है कि वोट न मिले। केवल ऐसे मुद्दे पर क्यों शर्म करते हो,जिस पर तुम्हें भी वोट मिलें और उन्हें भी जिन्होंने तुम्हारे अनुसार शर्म करने का काम किया है

Sunday, December 6, 2009

टिप्पणियां

लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट…. एक मरा हुआ सांप।(न किसी को लाभ न हानी)।

कल्याण सिंह ….बूढ़ा हो चुका साइड हीरो। ( अब तो पेट भरने का सवाल है)।

अमर+मुलायम=सपा…. रंग उतरने लगा।(धुंआ दिख रहा है तो आग भी होगी)।

शिवसेना बाल ठाकरे और बहू….नाक कैसे बचे।( खानदान की इज्जत “बहू” ही इज्जत उतारेगी)।

Saturday, December 5, 2009

वाह क्या चित्र है


ये चित्र जो आपको दिखाई दे रहा है एक समाचार पत्र में छपा है, मुख पृष्ठ पर, कियह गाँधी फ़िल्म का हीरो है अपनी पत्नी के साथ ताज के आगे भाव पूर्ण मुद्रा में”। चित्र लेने वाले ने बहुत मेहनत की होगी छापने वाले ने भी अच्छी जगह चुनी छापने के लिए,पर क्या ये इसी तरह का चित्र स्वयं अपनी पत्नी के साथ, या इनकी कोई निकट सम्बन्धी अपने पति के साथ, खुलेआम खिंचवा सकते हैं...? या ये चित्र लेने वाले ले सकते हैं,या छापने वाले छाप सकते हैं ?

जिस कार्य को स्वयं करने में शर्मिंदगी अनुभव हो(भारतीय संस्कारों के कारण) हम अपने सम्बन्धियों को भी नहीं करने दे सकते, उसे समाचार पत्र के मुख पृष्ठ पर छाप कर आख़िर समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं

Friday, December 4, 2009

"कौन बनाएगा भारत को विश्व की महाशक्ति"

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"कौन बनाएगा....?
1.वो नेता? जो येनकेन-प्रकारेण धन कमाना ही अपना अधिकार मानने
लगे हैंअपने आर्थिक और राजनितिक हित के लिए थूका हुआ(दूसरों का
भी) चाटने में कोई झिझक नहीं होती
2. वो अधिकारी…?जिन्होंने अंग्रेजी चश्मे पहन कर नेताओं और दलालों के साथ मिल कर इस देश को लूट कर लगभग सौ लाख करोड़ रूपये विदेशी बैंकों में जमा किए हुए हैं।
3. वो डॉक्टर…? जिन्होंने शैतान के जैसे काम करने और धन कमाने को ही अपने जीवन की सार्थकता समझ लिया हो।
4. वो इंजिनियर?जो भ्रष्टाचार में इतने ज्यादा लिप्त हैं जैसे जलेबी बक्खर मेंलिपटी होती है।
5.वो शिक्षक?जो कर्तव्यों की शिक्षा देना भूल कर स्वयं अकर्मण्य हो गए केवल अपने अधिकार याद रखते हैं,शिक्षा जाए भा……. में कहते हैं।
6. वो उद्योगपति?जो गरीब जनता को लूटना ही अपने उद्योग का उद्देश्य मानने लगे नेताओं-अधिकारीयों के साथ मिल कर जो लूट सके वही सफल है कीमान्यता बना दी।
7.वो समाजसेवी? जो नेताओं-अधिकारीयों कर्मचारियों के हित साधने के काम आने लगे या विदेशियों के मोहरे बनने लगे।
8. वो संत-सन्यासी…?जिन्होंने इस लुटते-पिटते देश में , बरबाद होते देश में
बुराईयों को देख कर भी अनदेखा किया और कर रहे हैं। स्वयं भी उसी
रंग(कीचड़)में रंग गए, दुनिया माने माने स्वयं जगतगुरु बन बैठे।
9. वो लेखकविचारक? जिन्होंने अपनी बुद्धि की एक ही खिड़की खुली छोड़ रखी है, जो एक ही तरह के विचारों को सही मानते हैं, निष्पक्ष रह कर सोच ही नहींसकते।
10. वो पत्रकार...?जो प्रथम रहने के लिए कुछ भी करने को राजी हैं, गुड़ को
गोबर-गोबर को गुड कहने से पहले देखना या जानना उन्हें पीछे हो जाने
का खतरा लगता है
11.वो आम जनता...?जो भूखे नंगे रह कर भी किसी हीरो-हिरोईन के लिए या
अपने भ्रष्ट नेता के लिए जय-जय कार करते हुए मारे जाते हैं।