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Wednesday, May 27, 2015

अगर मोदी कह दे कि आप को गर्व होना चाहिए आप अपने पिता की संस्कार वान संतान हो तो भी वो विरोध में चिल्लाने लगेंगे मोदी ने ऐसा क्यों कहा !

हम भारतीय लोगों में अधिकांस बहुत भुलक्कड़ प्रकृति के होते हैं !
इसीलिए अंग्रेज या "एंग्लो कांग्रेस" हम पर लम्बे समय तक राज कर गए (अभी भी कर रहे हैं ) !
अब देखो न एक साल पहले तक की परिस्थितियों को हम भूल रहे हैं .... कितना आजिज आ गए थे हम कांग्रेस से !
इसी भूल में हम अभी एक साल में ही उस व्यक्ति को जिसे पिछले पंद्रह साल तक तो देखा भाला है कोई बुराई उसके द्वारा नहीं हुयी है; इतनी बुरी बुरी बातें कहने लगे लगे हैं कि शायद कोई नीच से नीच भी नहीं कहता होगा |
अंजे गंजे प्रकार के लोग जिनके बालों के साथ साथ दिमाग भी उड़नछू हो गया है वो तो जैसे किसी नाजायज (कांगी की औलाद) आवारा लफंगे की तरह बौखला बौखला कर अनाप शनाप भौंके जा रहे हैं ! लगता है जैसे पुराने ज़माने में दुश्मन की सेना में भगदड़ मचाने को अपने लोगों को भरती करवा देते थे वैसे ही कांग्रेस ने भी इन्हें शुद्ध भारतीयों के बीच में घुसा दिया है ..... शायद !
ये अपने  को देशभक्त लिखेंगे (फोटो नहीं लगायेंगे), ये अपने को स्वामी रामदेव या भाई राजीव भक्त लिखेंगे; उनकी फोटो लगायेंगे ! लेकिन विचार (संस्कार) देख कर पता लग जायेगा कि कौन हो सकते हैं,  बाकि कान्गियों से तो हमें कोई शिकवा नहीं वो तो विरोध करें तो अच्छा ही है |
ये विदेशी निवेश को मुद्दा बना रहे हैं ... क्योंकि कांग्रेस ने दुष्प्रचार कर दिया है कि भाजपा पहले विदेशी निवेश का विरोध करती थी अब स्वयं करवा रही है लेकिन क्योंकि इनके पास बुद्दी का आभाव है ये सोच तो सकते नहीं विचार करना तो दूर की बात ! पहले विदेशी निवेश केवल सामान यहाँ बेचने के लिए होता था अब जो भी निवेश होगा वो तकनिकी भी साथ लाने और कारखाने यहाँ लगाने के लिए होगा ! जिसे मेक इन इण्डिया कहा गया |
और भी अन्य विभिन्न मुदों पर चाहे हिंदुत्व पर बवाल का हो या धारा 370 का, गौहत्या का हो या राम मंदिर का, सब के सब ऐसे दुष्प्रचार के जाल में उलझे हैं जो भारतीयता विरोधी समाचार जगत बौद्धिक और राजनैतिक विरोधियों ने बना दिया है !
और हर बार यही होता है ....
कुछ भारतियों की मुर्खता के कारण सही परिस्तिथियों को न समझ पाने के कारण भारत हार जाता है और इण्डिया जीत जाता है | 
कोई भी व्यक्ति सही या गलत जैसा भी करे उसके लिए वो सरकार में होगा तभी कुछ कर पायेगा ! बाहर रह कर वो घंटी भी नहीं हिला सकता, उसके लिए वोट चाहिए.... वोटों के लिए कुछ निर्णय समयानुसार वोटरों को खुश करने के लिए करने पड़ते हैं वर्ना ये भ्रम फ़ैलाने वाले  (भारतीयता विरोधी समाचार जगत बौद्धिक और राजनैतिक विरोधि)जो गिद्धों की तरह नजर गडाए बैठे हैं !
अपने आकाओं के इशारे पर कब कि कोई ऐसा काम हो जिससे मोदी सरकार को इतना बदनाम किया जाये कि इन्हें बीच में ही भागना पड़े या अगली बार तो कमसेकम ये दोबारा न आयें | इन्हें अभी तक कोई मुद्दा ऐसा मिला नहीं है फिर भी इन्होने कोहराम मचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी !
सोचो अगर कोई ऐसा काम कर दिया ! जैसे नेहरु या गाँधी की वास्तविकता प्रधान मंत्री सामने रख दे, या उनका नाम न ले तो पूरा विश्व तो उन्हें भारत के तारनहार के रूप में देखता है होगा या नहीं bharat का नुकसान ?
और हमारे तथाकथित अपने को देशभक्त या स्वाभिमानी कहने वाले लोग उनकी ही सहयता कर रहे हैं ! वो लोकतान्त्रिक प्रणाली को नहीं समझ रहे हैं !
वो इस लोकतान्त्रिक प्रणाली में पद बने रहने के लिए किये जाने वाली तिकड़मों को नहीं समझते !
कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर बहुत लम्बी चर्चा की जा सकती है !
लेकिन जिन्हें विरोध करना होता है वो कुछ भी कर लो विरोध ही करेंगे उनके लिए तो अगर मोदी कह दे कि आप को गर्व होना चाहिए आप अपने पिता की संस्कार वान संतान हो तो भी वो विरोध में चिल्लाने लगेंगे मोदी ने ऐसा क्यों कहा ! तर्क देने लगेंगे कि क्या मोदी के कहने से कोई संस्कारवान कहलायेगा ! है न आश्चर्य |  

Monday, March 16, 2015

देखें अब कब तक लोग अपनी आँखों से टोपियां पीछे सरकाते हैं।


टोपियों का बाजार फिर से गर्म हो गया !  
घूम घूम कर दोबारा दोबारा जा रहा है !
मौसम एकदम से करवट लेता है और टोपियों के साथ मफलर आदि गर्म कपड़े जो संभाल दिए थे फिर से निकालने पड़ते हैं !
परेशान हो गए मौसम के इस अजीबोगरीब "मिजाज" से; कई बार टोपी उतार चढ़ा दी !
सर्दियों में तो चलो कोई बात नहीं गर्मियों में क्या होगा ?
वैसे ही लगातार टोपी पहनने से सर के बाल तो उड़ते ही हैं बुद्धि भी ताजा हवा मिलने से कुंठित सी हो जाती है।
और अगर टोपी कहीं थोड़ा सा आगे को सरक गयी तो ! आँखें बंद ; दुर्घटना का खतरा, भगवान बचाये टोपी से !
अब तो गर्मियों का मौसम रहा है !
अगर टोपी पहनी तो खोपड़ी गर्म पहनें तो कब मौसम बदल जाये कोई पता नहीं !
एक बात है अगर टोपी ऐसी हो जिस पर कोई चोट असर करे (हैलमेट जैसी) तो  उसके फायदे भी बहुत हैं !
प्रदर्शन आदि में लाठी चलने पर अपना सर बचता है ! और विरोध में सर से निकालो दूसरे पर दनादन पिल जाओ !
लेकिन ऐसी टोपी (कागज की) किसी काम की नहीं; जिसे जब मन करा मोड़ा माड़ा जेब में रख लिया जब मन करा पहन लिया।
तो दोस्तो ! टोपी पहनने की आदत मत पाल लेना और पाल ली तो आँखों पर मत सरकने देना और कमसेकम सोते समय तो उतार देना जिससे दिमाग को कुछ ताजा हवा लगे तो सोचना समझना कर सके।
और हाँ दूसरों को टोपी पहनाना भी गलत होता है !
1947 (वैसे 1885 में) में विदेशियों ने देशवासियों को टोपी पहना दी थी ! वो लोगों के आँखों तक सरक गयी ! जिससे बुद्धि और आँखें दोनों बंद !  बड़ी मुश्किल से सत्तर साल बाद खुलने लगीं थी कि फिर टोपियों का मौसम ........
देखें अब कब तक लोग अपनी आँखों से टोपियां पीछे सरकाते हैं।

Saturday, February 14, 2015

आखिर वो मानसिकता कौन सी है ? जो 1857 के देश भक्त सैनकों के विद्रोह को प्रथम स्वाधीनता संग्राम नहीं मानते थे ! ठीक वैसा ही घटना क्रम अब भी चल रहा है; उसी साजिश के तहत ! भ्रष्टाचार के विरुद्ध पहला आंदोलन 27 फरवरी 2011 को दिल्ली के रामलीला मैदान में ही हुआ था लेकिन उसे भुलाया जा रहा है।

क्या हम जानते हैं वो मानसिकता कौनसी है ? 
जबकि उससे भी पहले मुगलों अंग्रेजों पुर्तगालियों के विरुद्ध आंदोलन (युद्ध) हुये थे !
इनमे देशभक्त हिन्दू मुसलमान सभी शामिल रहते थे लेकिन उनका कहीं नामोनिशान नहीं !
ऐसे देशभक्तों को देश की जनता से छुपाने वाली 
वो मानसिकता कौन सी है क्या हम जानते हैं ?
1857 के बाद भी न जाने कितने क्रन्तिकारी देशभक्तों को अंग्रेजों ने तोपों गोलियों से उडाया होगा !
1885 में कांग्रेस गठन के बाद भी कांग्रेस के ही कई देशभक्त कार्यकर्त्ता और नेता (लाला लाजपतराय जैसे)शहीद हुए होंगे 
कांग्रेस के आलावा तो हजारों देशभक्त क्रांतिकारी शहीद हुए ! उनका नाम लेने में भी संकोच करने वाली 
वो मानसिकता कौन सी है ये भी नहीं जानते होंगे ! 
वो मानसिकता ! वो शक्ति ! कौन सी है ? 
जिसने मैकॉले को यहाँ की शिक्षा व्यवस्था बदलने को बोला !
जिसने मैक्समुलर को वेदों का अंग्रेजी अनुवाद अपने मन मुताबिक ऊटपटांग तरीके से करने को बोला !
जिसने भारत को गड़रियों सांप सपेरों जादू टोने और जादूगरों का देश बताया !    
इस मानसिकता या शक्ति ने दुनिया के सबसे कमजोर व्यक्ति को अपने स्वार्थ के लिए देश के साथ साथ दुनिया में भी अहिंसा का मसीहा बना दिया और उसकी आड़ में एक ऐसे व्यक्ति को इस देश का प्रथम प्रधान मंत्री बना दिया जिसे देश नहीं चाहता था । 

ठीक वैसा ही घटना क्रम अब भी चल रहा है; उसी साजिश के तहत ! 
ये मैं, कम से कम मैं तो जनता हूँ कि ये वही शक्ति वही मानसिकता है ! जो इस देश में "सांस्कृतिक राष्ट्रवाद" का उदय नहीं होने देना चाहती। 






एक एक कर तथ्य दे रहा हूँ !
भ्रष्टाचार के विरुद्ध पहला आंदोलन 27 फरवरी 2011 को दिल्ली के रामलीला मैदान में ही हुआ था लेकिन उसे भुलाया जा रहा है। 
उससे पहले पूरे देश में 650 जिलों के तहसील और हर गांव में भ्रष्टाचार के विरुद्ध हस्ताक्षर अभियान चला था उससे प्राप्त करोड़ों पपत्र राष्ट्रपति को सौपने के लिए रामलीला मैदान पहुंचाए गए थे  ! इसमें भी देश की बड़ी बड़ी हस्तियां शामिल हुईं थी , रामजेठमलानी ने तो सोनिया पर सीधे आरोप लग दिए थे। https://www.youtube.com/watch?v=wjWaZHMyngc 27-2-2011 ramlila maidan
सुबूत भी दे रहा हूँ। 
ये आंदोलन इतना व्यापक था कि देश के सभी जिला व तहसील मुख्यालयों पर आयोजित हुआ था। हमने भी अपने यहाँ किया था। 
इसी आंदोलन के दूसरे चरण में 23 मार्च 11 को शहीद दिवस के दिन फिर से सभी जिला मुख्यालयों पर ऐसा ही विरोध प्रदर्शन हुआ था; उसे भी भुलाया जा रहा है।  

 भ्रष्टाचार के विरुद्ध पहला आंदोलन स्वामी रामदेव जी का था न कि अन्ना का ! साजिश के तहत उसे भुलाया जा रहा है !
प. पू. स्वामी रामदेव जी महाराज को मैं पिछले दस साल से फॉलो कर रहा हूँ और भ्रष्टाचार के विरुद्ध जितना मुखर मैंने स्वामी रामदेव जी को देखा है 2004 से ही; उतना इस देश में कोई नहीं देखा। 
हाँ एक पार्टी पर टारगेट भारत स्वाभिमान संगठन बनने (जनवरी 2009) के बाद हुआ जब उस पार्टी ने स्वामी जी के कामों में अड़ंगा लगाना शुरू  किया। 


Tuesday, May 27, 2014

एक विषय पर विचार, चर्चा और तर्क करना चाहिए कि बेरोजगारी के लिए कौन से कारण जिम्मेदार हैं ! मेरा अपना मानना है कि बेरोजगारी के लिए केवल "नौकरों वाली मानसिकता" जिम्मेदार है।

इस स्वतंत्र प्रवृत्ति के भारत देश में निवास करने वालों की मानसिकता अंग्रेजों ने नौकरों वाली बना दी है।
इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने के लिए सरकारी और सार्वजानिक क्षेत्रों में नौकरों को विशेष सुविधायें , तनख्वाह , पेंशन दोबारा नौकरी, बच्चों को नौकरी और इस सबके बावजूद हड़ताल करने के अधिकार जैसे प्रलोभन दिए गए; इन सबसे बड़ा जो लालच है वो कोई काम न करके भी आराम से तनख्वाह मिल जाना और किसी भी बात के लिए कोई दंड निर्धारित न होना; जो आज सरकार के गले की फ़ांस बन गए हैं और पढ़े लिखे लोग इन्हीं सुविधाओं के लालच में बैठे हैं बेरोजगारों के रूप में। अब तो भ्रष्टाचरण के द्वारा अथाह धन की लालसा सबसे बड़ा कारण बन गया है।
आर्थिक दृष्टि से काम का विभाजन कर दिया गया छोटा काम ! बड़ा काम ! अगर अपना काम करने वाले मामूली लोहार की आय भी कंप्यूटर इंजिनियर के बराबर हो या एक किसान की आय भी किसी क्रिकेट खिलाडी या सरकारी अधिकारी के सामान हो या छोटी सी दुकान चलाने वाले को सरकार की तरफ से नौकरी वाली सुविधाएँ और आय मिलें तो सारी बेरोजगारी ख़त्म हो सकती है।  गांवों से पलायन रुक सकता है।  शहरों का बोझ और गंदगी काम हो सकती है।
बेरोजगारी

Thursday, May 22, 2014

इसे कहते हैं यतो धर्मस्ततो जयः !
सच में !!!! सारे कलमुहों का काला मुहं दिखना बंद हो गया। 
'बाबा राम देव 
ठग हैं ! 
व्यापारी हैं ! 
ढोंगी हैं' ! 
कहने वाले ;
अब अपने गले में पत्थर बांध कर किसी गंदे नाले में डूबने तो नहीं चले गए ? 
परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज और भारत स्वाभिमान आंदोलन एक बार फिर अपने लक्ष्य में सफल हो कर 
आज फिर से अथाह लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच गए हैं। 
और इनको बुरा भला कहने वालों को मुहं दिखाना भी मुश्किल पड़ रहा है। 

Wednesday, May 14, 2014

विकास के नाम पर चुनाव का ढिंडोरा एक साजिश के तहत पीटा गया है वर्ना इस बार का चुनाव तथाकथित देशभक्ति (सेकुलरिज्म) और वास्तविक राष्ट्रवाद का देवासुर संग्राम था इसीलिए इसे "धर्म युद्ध 2014" नाम दिया गया।

लोग हार जीत को पार्टियों की नजर से देख रहे हैं ! मतलब ऊपरी तौर पर देख रहे हैं !
 अगर वास्तव मे सही विश्लेषण किया जाएं तो ……  
तो ये हार है !
तथाकथित सेकुलरिज्म की।   
ये हार है ! खोखले विकासवाद वाद की ; जिसमे आंकड़ों का खेल ही सरकार की कामयाबी मान लिया जाता है। 
ये हार है ! खोखली देशभक्ति की ; जो सिनेमा हॉल से बाहर निकल कर भुला दी जाती  है। 
ये हार है ! भ्रष्टाचार को सदाचार मानने वालोँ की। 
ये हार है ! उन विदेशी कम्पनियों, विदेशी सरकारोँ, विदेशी सस्थाओं की जो भारत मे अपनी संस्कृति को बढ़ावा दे रहीं हैं।  

विकास के नाम पर चुनाव का ढिंडोरा एक साजिश के तहत पीटा 

गया है वर्ना इस बार का चुनाव तथाकथित देशभक्ति (सेकुलरिज्म) 

और वास्तविक राष्ट्रवाद का देवासुर संग्राम था इसीलिए इसे "धर्म 

युद्ध 2014"  नाम दिया गया।   

इस चुनाव में बहुत कुछ विशेष हुआ है ! उसका कारण मानो या ना मानो  ! भारत स्वभिमान आन्दोलन और परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का  अथक परिश्रम रहा है। उनके ही प्रयासों से मोदी जी जैसा तैयार नेतृत्व सर्व मान्यता, सर्व व्यापकता पाकर चन्द्रगुप्त की भूमिका निभाने को पूरे पराक्रम से 300 से ज्यादा सीटें जीत कर भारत को पूनः विश्व गुरु बनाने का गौरव प्राप्त करेंगे। 
प पू. स्वामीजी ये कह कर  अपने सभी अनुयायीयों को समझाते रहे हैं कि जैसा नेतृत्व देश को वर्तमान मे चाहिए उसे तैयार करने मे पचास साल लग जाएँगे जो क्षमता , जो गुण , जो दृढ़ता , जो निर्भीकता इतनी बड़े देश के प्रधान मन्त्री मे होने चाहिए वो सब अधिकांस नरेन्द्र मोदी मे हैँ। इसीलिए नरेंद्र मोदी को देव इच्छा मान कर सभी स्वाभिमानी भाई - बहन स्वामी जी आदेश को पूरा करने मे लग गये।  
   अब इन्तजार है फैसले की घड़ी का; इस उम्मीद के साथ कि कांग्रेस अपने सफाये की ओर है, और ये श्राप उसको चार जून २०११ को राम लीला मैदान में मिला था जब उसने वहाँ बर्बरता का नंगा नाच नाचा था।     
 https://www.facebook.com/sfulara

Sunday, April 27, 2014

इनके लिए तो स्वामी रामदेव जी सबसे बड़े दुश्मन हैं ! क्या करें कैसे बदला लें ! मौके की तलाश मे थे !

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बड़ी बेचैनी है स्वामी रामदेव जी के विरोधियों में ! विशेषकर कांग्रेस मे इतनी खिसियाहट है कि अपने बालों के साथ अपना चेहरा भी नौंचने लगती है ! 
कि रोक तो नहीँ पाए हम इन स्वामी जी को; लगभग पूरे चुनाव निकल गये हैं !
इन स्वामी जी ने बहुत ज्यादा नुकसान इन्हें (कांग्रेस +)पहुंचा दिया है !
इसलिए कम से कम बदला तो लिया जाये। 
इनके लिए तो स्वामी रामदेव जी सबसे बड़े दुश्मन हैं !
क्या करें कैसे बदला लें ! मौके की तलाश मे थे !
जो भी दांव फैंकते हैं उल्टा ही पड्ता है !
किंकर्तव्य विमूढ़ता की स्थिति बनी हुयी थी !
ऐसे में किसी (न्यूज ट्रेडर) पत्रकार ने स्वामी जी के शब्दों (बयान) मे से हनीमून, दलित, विवाह आदि को पकड़ कर बाल की खाल निकाल दी।
वर्ना; हम तो पिछले सात - आठ सालों से स्वामी जी को देख सुन रहे हैं ! दिल्ली के रामलीला मैदान की घटना के बाद से ही स्वामी जी के शब्दों मे
घोर कड़वाहट आई है देश के दुश्मनों के प्रति; विशेषकर कांग्रेस के प्रति लेकिन इन्हीं न्यूज चैनलों व इनके पत्रकारों ने कभी इस तरह से शब्दोँ को नहीं उछाला !
स्वामी जी अपने शिविरो मे, पत्रकार वार्ताओं मे कठोर और चुभने वाली बातें बोलते रहे हैं आज तक किसी का ध्यान नहीं गया !
हनीमून शब्द हो सकता है पहले भी प्रयोग मे आया हो क्योंकि केवल घूमने के लिये जाना, या तफ़रीह के लिये कहीँ जाना, पिकनिक मनाने के लिये जाने को भी किसी को कटाक्ष करने के लिये कह देते हैं कि 'हनीमून मना के आ रहा है क्या' ! या 'हनीमून मनाने जा रहा है क्या' ! या ' हनीमून मनाके आ गया क्या ' ! या ' वो तो मौज करने जा रहा है जैसे हनीमून मनाने जाते हैं ' ! तो हनीमून शब्द को जिस प्रकार उपयोग किया गया है उसके उलट ऊसका शाब्दिक अर्थ के रुप मे परिभाषित करने का काम पहले उस पत्रकार और न्यूज चैनल ने किया।
अब दूध के धुले कांग्रेसी और उनक़ी अंगुली पकड़ के चलने वाले दलित रक्षक कर रहे हैं !
जबकि स्वामी रामदेव जी अपने बयान के लिये खेद व्यक्त कर चुके हैं।

Wednesday, February 19, 2014

उत्तराखंड की कुमांउनी बोली में मेरी दो दिन पहले लिखी ये कुछ लाईने

हमारे उत्तराखंड की कुमांउनी बोली में मेरी दो दिन पहले लिखी ये कुछ लाईने कविता जैसी बन गयी हैं 
यहाँ मेरे "टैंशन पॉइंट" ( http://tensionpoint.blogspot.in/ ) पर काफी लोकप्रिय हो रही हैं लोग मुझसे इसकी फोटो स्टेट कापियां भी मांग कर ले जा रहे हैं। 
आजकल के पंचायती चुनावी माहौल पर लिखी ये लाइनें एक दम सटीक टिपण्णी कर रहीं हैं चुनाव लड़ने वालों पर !
सुना है किसी ने इन्हें फेसबुक https://www.facebook.com/sfulara पर भी फोटो खींच कर डाल दिया