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Friday, October 19, 2012

महिला अपराधों के प्रति खाप पंचायतें नहीं ! तथाकथित आधुनिकता वाद, पाश्चात्य संस्कृति का भोगवाद, अश्लील विज्ञापन और चलचित्र को सही ठहराने वाली मानसिकता दोषी है । जबकि माहौल खाप पंचायतों और भारतीय संस्कृति के विरुद्ध बनाया जाता है ।

संसार की पहली माँ,

जाहिर है कोई महिला ही होगी। उसे ही आदि शक्ति कहा गया,"(माँ) महिला तो
शक्ति का श्रोत है”लेकिन यह भी सच है की श्रोत ,जहाँ पर होता है वहां
पर शक्ति कम होती है , लेकिन; जब कुछ अन्य शक्तियां उससे मिलती हैं तो
वह भागीरथी गंगा की तरह प्रचंड शक्ति के साथ अपना प्रदर्शन करती
है। जिसे नियंत्रित करने के लिए महादेव को अपनी जटाओं में उलझाना पड़ा
था, कहते हैं की वरना गंगा पाताल में चली जाती।
माफ़ करना मैं महिलाओं का विरोधी नहीं हूँ, लेकिन;मुझे ये समझ
नहीं आता की “रानी लक्ष्मी बाई,चेन्नमा,रजिया सुलतान,सरोजिनी नायडू,विजय लक्ष्मी
पंडित, माता जीजा बाई,मेडम भिकाजी कामा,इंदिरा गाँधी, किरण बेदी इत्यादि को
किस सशक्तिकरण की जरुरत पड़ी थी।
हम अपने पौराणिक इतिहास को देखें तो उन
महिलाओं को आज तक जिस तरह आदर्श माना जाता है शायद आज की सशक्तिकरण

वालियों को कोई याद करना भी न चाहे। क्योंकि इनकी तथाकथित “आजाद खयाली”
को ये महिलाओं का सशक्तिकरण मानती हैं,
ये पबों में जाकर शराब पीनेको
महिलाओं की आज़ादी व अधिकार मानती हैं,लिव इन रिलेशनशिप की ये समर्थक हैं,
अल्प-वस्त्रों वाला फैशन शो इन्हें महिलाओं की आज़ादी लगता है,इन्होंने प्यार को
ऐसे परिभाषित किया की लोग माँ-बाप,भाई-बहन के प्यार को भूलने लगे हैं केवल
वैलेन्टाइन डे के दिन उछ्रंख्लता को ही प्यार मानने लगे हैं, फिल्मों में अभिनय

के नाम पर अंग-प्रदर्शन, कला के नाम पर अश्लील नृत्य ;अगर जाँच की जाए या
रिसर्च की जाए कि महिलाओं के प्रति अपराधों में कब से बढोतरी हुयी है तो शयद
पता लगेगा की जब से पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव बढ़ा है तब से ही ये अपराध
बढे हैं तब से ही पैदा होने से पहले ही बच्ची को कोख में अधिक मारा जा रहा
है । मतलब; पहले भी होता होगा लेकिन उसके बाद अधिक होने लगा।
जैसे पर्यावरण
को प्रदूषित कोई करता है हानि कोई और उठाता है,ऐसे ही ये आधुनिकाएँ भी
करती हैं। इन्हें क्या पता की घर से भागी हुयी लड़की का हस्र देख कर, उसके माता-
पिता की बदनामी देख कर दूसरे माँ-बाप लड़की पैदा करना नहीं चाहते । ये दहेज़ से
बड़ा कारण है; छेड़छाड़,गुंडागर्दी तो कानूनी मसला है।

क्या होगा आरक्षण दे कर, जब इज्जत ही न हो और इज्जत, उपरोक्त तथाकथित आधुनिक
कर्मों से तो कम से कम भारत में तो नहीं मिलेगी। केवल कानून बनाकर या आरक्षण
लागु कर समस्या का समाधान नहीं हो सकता “जन के मन” के अनुरूप माहौल बनाना
होगा। जो निन्यनाब्बे प्रतिशत हैं उनमे महिलाऐं भी हैं।
निचले स्तर पर जो आरक्षण दिया है

उसे जाकर देखो बिना पति के महिलाऐं कोई कार्य नहीं कर पा रही और पति को पॉँच साल तक
शराब पीने का अच्छा अवसर मिल जाता है । पहले शराब को बंद करवाएँ इसका सबसे अधिक
नुकशान महिलाओं को ही होता है ।
  
जो अभिनय करने में निर्वस्त्र हो सकता है उस अभिनेता/अभिनेत्री या कलाकार को पुरस्कार (गौरव), जो लेखन में नग्नता खुलेपन से लिख सकता/सकती है;उस लेखक/लेखिका को पुरस्कार, जो जितना अधिक नग्न चित्र बना सकता है; उस चित्रकार को सम्मान, जो जितना गन्दा गा सकता है उसे उतना ही अधिक सम्मान, ऐसे नर्तक-नर्तकी जो अश्लीलता से ठुमके लगा सकते हों; उन्हें सम्मान .......... और भी अन्य विधाओं में इस कलयुगी परंपरा को देखा जा सकता |
वो समाज कैसा होगा जब सभी उनकी तरह नंगे होंगे, उनकी तरह लुटेरे-हत्यारे होंगे,बलात्कारी होंगे ?
आज क्या है कि हमारी व्यवस्था ही बुराईयों को पैदा करने वाली साबित हो रही है वरना; जिस व्यवहार को हेय दृष्टि से देखा जाना चाहिए उसे समाज में सम्मानित किया जाता है। व्यवस्था इस सबको सही ठहराने के लिए कानून बना देती है । विदेशी संस्कृति के प्रभाव में सामूहिक रूप से कु संस्कृति को बढ़ावा दिया जाता है । किसी भी गलत कार्य को सही ठहराने के लिए कानून बनाने का चलन अंग्रेजों ने शुरू किया था; उसे ही लागू करने का काम आजाद होने के बाद भी यहाँ की सरकरों ने किया। व्यवस्था के रूप में नाम के लिए लोक तंत्र ( जिसमे दस विद्वान् बेकार माने जाते हैं ग्यारह मूर्खों के आगे ) ।
यहाँ तो व्यवस्था बुराईयों के लिए उकसाती है। एक जगह व्यवस्था कहती है शराब मत पीयो; ये शारीर,मन, समाज परिवार के लिए हानिकारक है, दूसरी ओर अपने आप अपने द्वारा खोली दुकानों पर बिकवाती है। एक ओर व्यवस्था हत्यारे को दण्डित करने के लिए न्यायलय की व्यवस्था करती है दूसरी ओर उसी न्यायलय के निर्णय को बड़ी न्यायलय निरस्त करती है |

इस तरह की सारी बुराईयों के लिए व्यवस्था और पाश्चात्य मानसिकता दोषी है । वर्ना हमारे भारत और भारतीय सभ्यता में संस्कारों में जितना सम्मान महिलाओं का है पूरे विश्व में आज भी नहीं है।
इसे हम चाहे अपने धर्म ग्रंथों, इतिहास और ऐतिहासिक पुस्तकों और समाज में व्याप्त चलन में देखें तो नजर आएगा । लेकिन उसके देखने लिए शुद्ध दृष्टि वाली आँखें चाहिए ।

1 comment:

  1. जो व्यक्ति अनुशासित नहीं ... वह धूल धूसरित हो जाता है।।।
    जो परिवार अनुशासित नहीं ..... वह परिवार बिखर जाता है।।।
    इसी प्रकार जो राष्ट्र अनुशासित नहीं .... वह राष्ट्र या तो गुलाम हो जाता है या फिर कई टुकड़ो में विभक्त हो जाता है।।
    सचमुच ........
    स्त्री हो या पुरुष
    स्वतंत्रता का मतलब अनुशासनहीनता, न होती है ... और न ही होनी चाहिए।।

    जय हिन्द ! शंकर जी

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