ताजा प्रविष्ठियां

Wednesday, January 14, 2009

मकर संक्रांति

“उत्तरायणी”
शुभ का आरम्भ;
त्यौहारों का आरम्भ;
उजियारे का आरम्भ;
उल्लास का आरम्भ ;
“परंपरागत पर्वों” के बारे में
“बड़े शहरों” में रहने वालों को
कम ही पता होता है।
हाँ; जो "अपने मूल से जुड़े"होते हैं;
वह इन त्यौहारों को जानते व मानते हैं।

Friday, January 9, 2009

गांधीगिरी

मजबूर(बंधुआ मजदुर) पार्टी कार्यकर्त्ता
टी वी चैनल
(कमाई के लिए मज़बूरी)
संजय दत्त की (गाँधी गिरी) जय- जय बोलेंगे ही।

फिल्म की कथा- पटकथा लिखने वाला ऐसा
नहीं लिखता तो न संजय दत्त होता न अमिताभ
बच्चन।लेखक गुमनाम ही रहा।
अब चुनाव में देखना है की आम
वोटर किस स्तर तक भोला(मुर्ख)है।

ब्लैकमेलर

“सरकारी नौकरया(ब्लैक मेलर)
बेचारे; हड़ताल (ब्लेकमेल)
करें तो क्या करें।

इनको जो मिलता है (वेतन) उसमे ये
भूखों मर रहे हैं।
कहीं और ये जा नहीं सकते
(नौकरी के लिए)।
इन्हें आराम करने की आदत पड़ गई है इसलिए।
मौका (देश को परेशान)देख कर वार
करना ही तो इनके नेताओं की योग्यता है।
यूनियन लीडर हैं।
( हराम की नहीं खाते)
वो ज़माना गया जब अपने से नीचे वाले को
देख कर संतोष करने की कहानियाँ सुनाई
जाती थी।
आज देश में १२ करोड़ लोग पूरे दिन में
केवल ८ रुपये कमाते
हैं।तो क्या ? सरकारी
नौकरों व नेताओं को भुखमरी से बचने को
हड़ताल करने का अधिकार सविंधान ने दे रखा है।

Thursday, January 8, 2009

सिबू सोरेन

हाय री सिबू सोरेन की किस्मत(कर्मों का फल)
जेल के अलावा कहीं
ठौर नहीं
जनता का निर्णय सर आखों पर

न्याय पालिका व कार्यपालिका को नेताओं द्वारा
अंगूठा दिखने को,
जनता का थप्पड़।
बड़े जागरूक वोटर हैं,
मुख्य मंत्री को हराने का इतिहास बना दिया।

जाने कितने नेताओं का खून सूख गया होगा।

घोटालेबाज

सत्यम का (असली) सत्य
(मैनेजमेंट)
"शिक्षा की सार्थकता"
येनकेन प्रकारेण सफल
(पैसा कमाने में। )
होने की शिक्षा ही तो "इन" जैसे लोगों को दी जाती
है। "उच्च शिक्षण संस्थानों"
(मैनेजमेंट)
में केवल पैसे का मैनेजमेंट ही तो सिखाया
जाता है। जो "मैनेज" करने में फेल हुआ
"घोटालेबाज" मान लिया गया। जब तक स्वयं
नहीं बताया तब तक तो "गुडमैन" था।

Tuesday, January 6, 2009

आकाशवाणी

हिंदुस्तान वालो
अब क्या भाई (पकिस्तान)
की जान ही लोगे।
इतना मत दबाओ कहीं
बिल्कुल ही बेशर्म न हो जाए।

जमाने भर में हँसी
उड़वा रहे हो,
बार-बार सबूतों को
दुनिया को दिखा रहे हो,
आख़िर कितना जलील करोगे।

क्या भूल गए ?
जब अलग हुआ था,
तो पितृपुरूष गाँधीजी(बापू) ने
उसके हिस्से का कर्ज माफ
करने के लिए अनशन तक कर दिया
था ।
एक तुम हो छोटे भाई की
गलतियों के लिए उसे दुनिया
भर में बदनाम करने पर तुले हुए हो,

क्या मिलेगा?
“जिसने कुछ पहना ही न हो उसे क्या नंगा करोगे”।
छोटा भाई है भटक गया है
ग़लत साथी (दहशतगर्द) पाल लिए हैं,
उसे समझाओ।

वैसे तो बड़ा कमजोर है,
इसीलिए बक-बक कर रहा है।
जो कमजोर होता है
वह बकवास ही कर पाता है,
डर के मारे अनाप-शनाप भी
बोलने लगता है।
उसे पता है कि बड़ा भाई बहुत
सहनशील है धमकी ही देगा
और कुछ नहीं, करेगा इज्जत से भी डरता है।
इसीलिए; ज्यादा
बक-बक कर रहा है।
साथियों (दहशतगर्दों) को कुछ

बोल नहीं सकता क्योंकि उन्हीं
का नमक खा रहा है।
और इस्लाम में नमकहरामी
सबसे बड़ा कुफ्र होता है।

कैसे करे।
सारा जोर बड़े भाई
(हिन्दुस्तान) पर चलता है।
तुम बड़प्पन दिखाओ
जैसे आज तक नजरअंदाज किया है
करते जाओ।
अपने आप तो तरक्की पर तरक्की
कर रहे हो कभी उसके बारे में भी सोचा है,

बेचारा भीख मांग कर जिन्दा है,
तुम उसकी भीख भी बंद करवा दोगे।

कैसे बड़े हो तुम?
अपने दूसरे भाई (बांग्लादेश)
का भी ध्यान रखो वह
और भी छोटा है
उसके कुछ लोग यहाँ
आ गए तो क्या
वोट तो तुम्हें ही देते हैं
हाँ मझले(पाकिस्तान) की
तरह उसकी संगत भी
ग़लत जमातों से हो गई है

उसे भी समझा दो,
पकिस्तान का हाल दिखादो
डराना मत।
“ प्यार से ही समझाना”।
छोटा है समझ जाएगा
“वरना” ये पाकिस्तान से
ज्यादा खोटा हो जाएगा।
भाइयों के साथ-साथ
पड़ोसी
(नेपाल) का भी
विशेष ध्यान रखो
नया-नया मुल्ला (माओवादी) बना है
इसलिए जोर से चिल्ला रहा है।
पर बेचारा
गरीब है बच्चो (गोरखों की बहादुरी) की कमाई
पर पल रहा है।
तुम्हारे द्वारा पोषित
रहा है। उसे भी प्यार से ही समझाना।
पर ये समझ लेनाकी प्यार से
समझाने का मतलब
ये बिल्कुल न समझो की
अपना नुकसान होता रहे
छोटे हैं
पिटाई भी कर सकते हो

Sunday, January 4, 2009

राष्ट्रीयता

राष्ट्रीयता
हॉकी की जगह क्रिकेट हो राष्ट्रीय खेल।
( पटौदी ने कहा)
"शायद तब हॉकी के दिन सुधर जायें" ।
क्योंकि हमारे सभी राष्ट्रीय प्रतीक-चिन्ह इत्यादि उपेक्षित
हैं। जैसे राष्ट्रीय वाक्य सत्यमेव जयते इसका उल्टा ही चारों
तरफ़ दिख रहा है।
(असत्यमेव जयते) नेता से लेकर अधिकारी
तक असत्य बोल कर जनता को बेवकूफ बनाते हैं।

राष्ट्रीय झण्डे का अपमान भी न्यूज चैनल वाले दिखा ही देते हैं।
राष्ट्रीय पशु-पक्षी भी लुप्त होने के कगार पर हैं।
राष्ट्रीय त्यौहार केवल औपचारिकता तक ही सीमित हैं।
राष्ट्रीय नदी गंगा के हाल पर तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर
चिंता होती है।
"सबसे बड़ी बात" राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद को या तो हँसी का विषय
बना दिया या पिछडापन और अतिवाद माना जाता है।
राष्ट्रीय चरित्र, राष्ट्र भाषा, राष्ट्र गीत , राष्ट्र कवि, और भी
बहुत कुछ जो अघोषित रूप से राष्ट्रीय है
शायद आने वाली पीढियां
भूल जायें।
इसलिए इन्हें बदल देना चाहिए। ( पटौदी साहब खुश हो
जायेंगे)

धमकी

धौनी को धमकी
"आम से खास बनने के
साईड इफेक्ट"
इस ज़माने में छुप और छुपा भी तो नहीं सकते
टी. वी.न्यूज चैनल "चिल्ला-चिल्ला" कर बताते हैं की

कौन "कितना कमा" रहा है।
(साईं इतना दीजिये;किसी की नजर ना लग जाय;
कमाई भी कम न हो; नाम भी कमाया जाय)।

Friday, January 2, 2009

सन २००८

सन २००८ (अर्थव्यस्था) में "तेजी सबसे तेज"
मंदी भी सबसे तेज ; तेजी में "महंगाई आई"
मंदी से महंगाई कम हुयी
आम आदमी के लिए तो मंदी ही अच्छी

भारत २००८

“सन २००८” …..….........(भारत में);
“भ्रष्ठाचार”
कल्पना से भी ज्यादा;
“सम्प्रदायवाद” कल्पना से भी…...;
“जातिवाद” कल्पना से ……….…… ;
“पार्टी-प्रांतवाद” कल्पना…………;
और
“आतंकवाद” तो “सबसे ज्यादा”
फ़िर भी,
भारत “बुलान्दियौं”(चाँद) को छू
रहा है
“आख़िर कुछ तो बात है”
“किसी की नजर न लगे”
या खुदा इन “बुरी नज़र "(पाक) वालों की
“नजरें फोड़ दे”