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Friday, November 27, 2009

छब्बीस ग्यारह- छब्बीस ग्यारह- छब्बीस ग्यारह

छब्बीस ग्यारह को याद तो ऐसे किया, जैसे पहले कभी ऐसा न हुआ हो, या अब ऐसा होने का डर न रहा हो। हमारे प्रधानमंत्री,गृह मंत्री,और सुरक्षा अधिकारी इस डर को देश के सामने यदा-कदा प्रकट भी करते रहते हैं।
"छब्बीस ग्यारह दो हजार आठ" कोई नई बात थी
और अभी आश्वस्त हुआ जा सकता कि ऐसा फ़िर कभी नहीं होगाजब तक मरने के लिए जांबाज तैयार रहेंगे, जब तक भ्रष्ट अधिकारी-नेता इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने वाले लोगों को अन्दर आने का रास्ता दिखाते रहेंगे इन घटनाओं से बचा नहीं जा सकता
पर
, समाचार माध्यमों के लिए तो कमाई का अवसर है इस मौके को कैसे हाथ से जाने देंथोड़ा कहा- ज्यादा समझना, इससे ज्यादा क्या कहना

1 comment:

  1. समझ लिया जी…। जूता भिगो रहे हैं अभी… मौका लगने दो… और कोई नेता समयानुकूल परिस्थिति में सामने आने दो… फ़िर देखते हैं…

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