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Saturday, July 11, 2009

सरकार, तुम कहाँ हो ?

सरकार… सरकार…..ओ सरकार… ! तुम कहाँ हो; यहाँ हम लुट रहे हैं, पिट रहे हैं खाने को रोटी नहीं पीने को पानी नहीं,सब्जियां, दालें,आटा-चावल दूध,घी-तेल,जीने के लिए जरुरी हर चीज इतनी महंगी हो गई हैं कि,दिन भर की दिहाड़ी में एक समय की सब्जी आती है ,कैसे पेट भरें । पिछले बहुत समय से तुम्हें ढूंढ़ रहे हैं,मीडिया में तुम्हारी आवाज और चेहरा तो दीखता है पर सामने कभी नही दखाई दिए।
हम तुम्हारे ही कर्मचारियों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार से लुट रहे हैं, कर्मचारी ही क्यों स्वयं तुम्हारे (नेता)द्वारा भी तो हम लुट रहे हैं पर तुम कहीं नजर नहीं आते,रास्ता चलते तुम्हारी पुलिस कब- किसे गोली से उड़ा दे पता नहीं,फ़िर हम चिल्लाते रहते हैं ,तुम नजर नहीं आते बल्कि ऐसे मामलों में तो अदृश्य रह कर अपने कर्मचारियों का बचाव भी करते हो उन्हें निलंबित कर या लाईन हाजिर कर, घर बैठे वेतन पहुंचाते हो जो उनके लिए इनाम की तरह होता है,और मरने वाले के परिवार को मुआवजे की घोषणा(अहसान) करके भूल जाते हो ,वैसे भी; मुआवजे से तसल्ली होती है तो पुलिस में भर्ती अपराधियों को गोली मार कर उनके घर वालों को मुआवजा देना चाहिए। पर हम चिल्लाते रहे तुम ने नहीं सुना। मुझे लगा, तुम हो ही नहीं ;अगर होते तो जरुर सुनते।
लेकिन जब चुनाव होते हैं तब तुम्हारे होने का अहसास होता है।
जब गाडियों के काफिले में जनता पर जाम लगा कर तुम निकलते हो, तो तुम्हारे होने का अहसास होता है । जब तुम हो तभी तो तुम्हारे आने पर , रातों-रात रोड़ बन जाती है, जिसके लिए हम सालों से चिल्लाते रहे,हैलीपैड बन जाता है,व्यवस्था चाक-चौबंद हो जाती है….तब अहसास होता है कि तुम हो। पर मेरी(आम-जनता की) नहीं सुन रहे हो ।
अब देखो न बहुत समय से हमें पीने को पानी नहीं मिल रहा ,बोतल वाला पानी हमारे लिए बहुत महंगा है, पर बोतलों को देख कर एक प्रश्न दिमाग में उठता है कि इन पानी के सौदागरों को इतना पानी कहाँ से मिल जाता है कि जितनी चाहे आपूर्ति कर दें,ये ही क्यों, शराब के सौदागर भी तो करोड़ों लीटर पानी रोज खर्च कर रहे हैं , अन्य पेय अलग हैं।इनको तो पानी बेचने को मिल जा रहा है हमें पीने को भी नहीं आख़िर क्यों ?
तुम कहाँ हो कुछ देखते क्यों नहीं ? कुछ करते क्यों नहीं ? हम तो समझते थे बड़े ताक़तवर होओगे ,करोड़ों की संख्या से चुन कर आए हो, पर जिन्होंने तुम्हें चुना ,हर-बार तुम उन्हें ही भूल जाते हो। अपना और अपने कर्मचारियों का ही भला करने में रह जाते हो, क्योंकि वे (कर्मचारी) संगठित हैं (हड़ताल कर देते हैं) इसलिए ? और तुम, खुदमुख्तार हो इसलिए ? अपने और अपनों के लिए तो एक हजार से पॉँच हजार रूपये रोज और हमारी दिहाड़ी एक सौ रूपये रोज वो भी कुछ दिन।
सौ रूपये में हम क्या खाएं चालीस रूपये किलो टमाटर, इतनी ही महँगी अन्य सब्जियां तोरी,घिया आलू इत्यादि, क्या इनके आलावा भी गरीब आदमी के खाने को कुछ है ? फलों को तो केवल सूंघ कर मन-मना ले रहे हैं ,दालें व घी- तेल खाना तो छोड़ने पड़ेंगे । दूध जो मिल भी रहा है उसका भरोसा नहीं कि बिना जहर का होगा। वैसे तो तम्हारे दिखाई न देने का फायदा तुम्हारे कर्मचारी-अधिकारी खूब उठा रहे हैं ।
अब देखो न महंगाई तो “जो है वो है” पर खाने-पीने की वस्तुओं में मिलावट क्या तुम्हारे कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना हो सकती है, अगर सुन रहे हो तो जरुर बताना ,दूध में मिलावट घी में मिलावट, हर वस्तु में मिलावट यहाँ तक कि जो स्वयं जहर है,शराब , उसमे भी जहर मिला दिया ।
सोचो ! अगर तुमने सालों पहले सुन लिया होता तो क्या अब भी ये हालात होते , इतने लोगों की जान जाती ? पर तुम अभी भी नहीं सुन रहे ,जरा बताओ तो, आजादी से पहले क्या जहरीली शराब से लोग मरते थे ,या मिलावट का धंधा इस तरह चलता था , हम तो मिठाईयों के स्वाद ही भूल गए क्योंकि मावा भी सिंथेटिक बनने लगा, आख़िर तुम अपनी शक्तियों का इस्तेमाल क्यों भूल रखे हो ,तुम्हारे नाकारेपन से अराजकता फ़ैल गई है,अपराधी केवल छुरे-बन्दूक से ही नहीं मार रहे ,सब्जियों तक में जहर के इंजेक्शन से भी मार रहे हैं।
वैसे भी खेती योग्य जमीन को तुम उद्योग और कॉलोनी बनाने को छीन लेते हो जिससे खाने की वस्तुयें कम पैदा हो रहीं हैं ,ज्यादा पैदावार को इंजेक्शन लगाने ही पड़ते हैं। नदी-नालों का पानी इतना जहरीला हो गया है कि जमीं में सब कुछ जहरीला पैदा हो रहा है। पर तुम न देख रहे हो न सुन रहे हो ।
सरकार, तुम टी.वी.और अखबार नहीं देखते क्या ,ख़ुद तो इनमें बहुत दिखाई देते हो,इनमें दिखने के साथ ही इन्हें देखा भी करो,पता तो लगे कि देश में जनता के साथ क्या हो रहा है। अपने अधिकारीयों द्वारा बनाये आंकड़ों पर तभी भरोसा करते हो शायद,जब इन्हें नहीं देखते। हुजुर, आकड़ों में तो महंगाई कम हो रही है,गरीबी कम हो रही है,भूख,बेरोजगारी कम हो रही है,अपराध कम हो रहे हैं ,जबकि ये सब बढ़ रहा है,और जो बढ़ा हुआ दिखा रहे हैं, वो सब कम हो रहा है। इसलिए टी.वी.अख़बार देखो ,शर्म से आँखें झुक जाएँगी,और शर्म आना अच्छी बात है तभी कुछ शक्तियों(कर्तव्यों) का भान होगा। जब शक्ति का भान होता है तो सरदार पटेल की तरह पुरे भारत को एक करने का जज्बा पैदा होता है। अरे, सरदार पटेल से नहीं सीखना चाहते तो अंग्रेजों से तो कुछ सीख लो , वो तो तुम्हारे निकट….. हैं।
हम तो तुम्हें कब से पुकार रहे हैं पर तुम अपने लिए मूर्तियाँ बनाने में,बंगले की सजावट में, पुलों के नामकरण में, उद्घाटनो में ,व्यस्त हो ,बस जनता की नहीं सुन रहे हो, आख़िर कब सुनोगे ?


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